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पंचायतों के फरमान

दो पंचायतों द्वारा जारी तुगलकी फरमान बर्बर युग की  याद दिलाते हैं। कुछ युवतियों को युवकों के साथ देख देवबंद के फुलासी गांव की पंचायत ने युवकों को तो पीट कर छोड़ दिया और महिलाओं को परिवार के मर्द के बिना गांव से बाहर न जाने का फैसला सुना दिया। इस आदेश के पालन के लिए समितियां बनेंगी, जिसमें जहिर है पुरुष ही हैं। मोहम्मदपुर गांव की पंचायत का फैसला तो बर्बरता की पराकाष्ठा है।

अपनी ही बिरादरी की लड़की से प्रेम होने पर जब युवक लड़की को लेकर गांव से चला गया तो पिता पर 50 हजर रुपए का जुर्माना ठोक दिया। जुर्माना न दे पाने पर पंचायत ने उसकी 11 साल की बेटी को गिरवी रखने का फरमान जरी कर दिया। भाई की गलती की सज बहन को क्यों? पंचों के ये आदिम फैसले कबिलाई संस्कृति की याद दिलाते हैं। एक समय पंचों की तुलना परमेश्वर से की जाती थी।

नीर-क्षीर विवेक से निर्णय देने के लिए प्रसिद्ध पंचों का फैसला सिर-माथे लिया जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षो में पंचों ने जिस तरह के बर्बर फैसले सुनाए हैं। उन्हें देखकर लगता है कि पंचों की नजर में नैतिक और मानवीय मूल्यों का कोई महत्व नहीं। जिन पंचों की नजर में प्रेम करना, पराये मर्द के साथ घूमना या अपनी पसंद से विवाह करना गुनाह है, उनकी नजर में किसी बच्ची को गिरवी रख उसका बलात्कार करना क्यों गुनाह नहीं?

इसकी सजा कौन और किसे देगा जबकि जातीय-सामुदायिक पंचायतें खुद ही  कभी प्रेमियों के सिर कलम करवाने, कभी बलात्कार पीड़िता को गांव से निकालने, तो कभी बलात्कार पीड़िता को ही दोषी ठहराने या महिला को निर्वस्त्र घुमाने जसे फैसले सुनाती हो।  काबिले गौर यह है कि पंचायतों के अधिकांश फैसलों में जुर्म महिला के ही सिर मढ़ा जाता है।

जो गुनाह औरत ने किया नहीं, उसकी भी उसे सजा सुनाई जाती है। जो असली गुनहगार हैं, उनके लिए बहुत हुआ तो पिटाई करके या दस जूते मारकर छोड़ देने जैसी सजा ही पर्याप्त समझी जाती है। पंचायत की ‘जातीय बहादुरी’ की शिकार ज्यादातर औरतें ही क्यों होती हैं। पंचायतों का काम पीड़ितों को न्याय दिलाना है न कि इस तरह के फरमान जारी कर उनका कष्ट बढ़ाना। ये पंचायतें लोकतांत्रिक भारत के संविधान के अनुसार बनी पंचायतों से भिन्न हैं। ऐसी पंचायतों की ताकत खत्म होने के बजाए बढ़ती दिखती है। इन पर अंकुश कब लगेगा?

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