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भविष्य की शिक्षा

केन्द्र में नई सरकार बनने के बाद उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कई मोर्चो पर हलचल दिखाई दे रही है। जब तक अर्जुन सिंह मानव संसाधन विकास मंत्री थे, तब तक सिर्फ उच्च शिक्षा में पिछड़ों के लिए आरक्षण की बहस ही केन्द्र में रही। लेकिन अब तमाम चुनौतियां नए मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल के सामने हैं और वे इन चुनौतियों का सामना करने के लिए कितनी तेजी से कितने कदम उठाते हैं यह देखना होगा।

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती है इसके विस्तार की। अगर भारत को अपने विकास की गति तेज करनी है तो उसे बड़ी तादाद में इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक और अन्य तकनीक और ज्ञान के क्षेत्रों में कुशल नौजवान चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि अच्छे स्तर की उच्च शिक्षा बड़े पैमाने पर मिल सके।

जहिर है इतने बड़े विस्तार के लिए पूंजी चाहिए और वह सारी पूंजी सरकार नहीं मुहैया करवा सकती। सैम पित्रोदा के नेतृत्व में गठित ज्ञान आयोग ने भी निजी पूंजी निवेश और विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत प्रवेश की बात कही है और कपिल सिब्बल भी इससे सहमत दिखते हैं। लेकिन सिब्बल यह भी चाहते हैं कि इस विस्तार के साथ मुनाफाखोरी और अराजकता न आए, इसलिए वे ज्यादा कठोर नियमन के पक्षधर हैं।

‘डीम्ड’ विश्वविद्यालयों की कड़ाई से जंच के उनके इरादे के पीछे भी यही वजह है। अर्जुन सिंह के जमाने में विश्वविद्यालयों को ‘डीम्ड’ दर्जा देने में काफी उदारता दिखाई गई, और प्रवेश और फीस को लेकर इन संस्थाओं ने काफी मनमानी की। भारी पैसा लेकर मेडिकल कॉलेज की सीटें देने को लेकर दक्षिण भारत की दो संस्थाओं का मामला भी अभी सामने आया है।

जहिर है कि निजी या विदेशी संस्थानों की स्वीकार्यता को लेकर ज्यादा विवाद अब बचा नहीं है लेकिन ये संस्थान गुणवत्ता के नियमों का पालन करें, भारतीय समाज की जरूरतों को समङों और शिक्षा को सिर्फ अनाप- शनाप पैसा कमाने का जरिया न बना दें, यह देखा जाना चाहिए।

दूसरे उच्च शिक्षा सिर्फ पैसे वालों के लिए न हो, कमजोर आर्थिक क्षमता वाले प्रतिभाशाली नौजवान इससे वंचित न हों, यह भी देखना होगा। इसके अलावा मौजूदा संस्थानों की गुणवत्ता और सुविधाओं को बढ़ाने की एक बड़ी जिम्मेदारी है, ताकि शिक्षा और शोध का स्तर कुछ बेहतर हो। काफी समय हमने गंवा दिया है, इसलिए इन तमाम मामलों में अब और देरी नहीं होनी चाहिए।

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