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वैज्ञानिकों ने खोजा मल्टीपल स्क्लैरोसिस से जुड़ा जीन

वैज्ञानिकों ने खोजा मल्टीपल स्क्लैरोसिस से जुड़ा जीन

वैज्ञानिकों ने दो ऐसे जीन खोज निकाले हैं, जो मल्टीपल स्क्लैरोसिस के उपचार में सक्षम हैं। वैज्ञानिकों का दावा है कि इससे उन्हें शरीर को कमजोर कर देने वाली बीमारी स्क्लैरोसिस के उपचार में आसानी होगी।

मूल रूप से स्क्लैरोसिस नर्वस सिस्टम से जुड़ी हुई बिमारी है जो सीधे दिमाग और रीढ़ की हड्डी पर असर करती है। इस बीमारी के कारण मरीज के दिमाग और शरीर के अन्य हिस्सों के बीच संदेशों का आदान-प्रदान अवरुद्ध हो जाता है। इस बीमारी के चलते देखने में दिक्कत का सामना करना पड़ता है, इससे मांसपेशियों में कमजोरी आती है और संतुलन में भी पेरशानी होती है। सोचने की क्षमता पर इसका असर पड़ता है और सुई के चुभने का भी खास अहसास नहीं होता।

अभी तक इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि यह बीमारी किन कारणों से होती है। इससे शरीर की प्रतिरोधी क्षमता कम हो जाती है। बीमारी के बारे में एक तथ्य स्पष्ट है कि यह पुरुषों से ज्यादा महिलाओं को अपना शिकार बनाती है। अक्सर यह बीमारी 20 से 40 की उम्र में लगती है। हालांकि बीमारी शांत प्रवृति की है लेकिन कुछ लोगों की लिखने, बोलने व चलने की क्षमता पर इसका गहरा असर पड़ता है। अभी तक इसका कोई इलाज नहीं ढूंढ़ा जा सका है। दवाएं इसकी मारक क्षमता को कर करके इसके लक्षणों को नियंत्रित कर सकती हैं। 

नेचर जेनेटिक्स के हालिया अंक में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया है कि वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय दल ने आनुवांशिक रूप से परिवर्तित ऐसे दो जीन ढूंढ़ निकाले हैं, जिनसे शरीर में मल्टीपल स्क्लैरोसिस को नियंत्रित करने में आसानी होगी।

प्रमुख शोधकर्ता और क्वींस विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मैथ्यू ब्राउन ने कहा दोनों जीनों में से एक जीन ऐसा है, जो विटामिन डी के उपापचय को नियंत्रित करता है। पहले के शोधों से यह ज्ञात है कि विटामिन डी का स्तर लोगों में मल्टीपल स्क्लैरोसिस के खतरे को प्रभावित करता है।

उन्होंने कहा कि उदाहरण के लिए भूमध्य रेखा से दूर रहने वाले लोगों को बीमारी का खतरा बढ़ता जाता है। इससे हमें संकेत मिलता है कि मल्टीपल स्क्लैरोसिस से बचाव का उपाय विटामिन डी हो सकता है।

वैज्ञानिकों ने इस पर तीन वर्ष तक शोध किया। दल के सदस्य और ग्रिफिथ विश्वविद्यालय के सिमोन ब्राडले ने कहा हमारे शोध के ताजा परिणाम बीमारी के उपचार में बेहतर तरीके से काम आएंगे। शोध का अगला कदम जीन के सही उत्परिवर्तन का अध्ययन करना होगा।

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