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लैंडफिल गैसें

लैंडफिल गैसें उन स्थलों से उत्सर्जित होती हैं, जहां गड्ढ़े और उबड़-खाबड़ जमीन का समतलीकरण शहरी कचरे से किया गया हो। इस कचरे में औद्योगिक कचरा भी शामिल हो तो इसमें प्रदूषण की भयानकता और बढ़ जाती है। लापरवाही से तैयार भूखंडों पर खड़ी इमारतों में चल रहे सूचना तकनीक के कारोबार में प्रयुक्त चांदी, तांबा और पीतल के कलपुर्जो की सेहत लैंडफिल गैसों के संपर्क में आकर बिगड़ जाती है। इनका हमला निर्जीव यांत्रिक उपकरणों पर ही नहीं मानव स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर डालता है।

हमारे देश की महानगर पालिकाएं और भवन निर्माता गड्ढ़े वाली भूमि के समतलीकरण का बड़ा आसान उपाय खोज लेते हैं : रोजाना घरों से निकलने वाले कचरे और इलेक्ट्रॉनिक कचरे से गड्ढ़े को मुफ्त में पाट दिया जाए, वह भी बिना किसी रासायनिक उपचार के। इस मिश्रित कचरे में मौजूद विभिन्न रसायन परस्पर संपर्क में आकर जब पांच-छह साल बाद रासायनिक क्रियाएं करते हैं, तो इसमें से जहरीली लैंडफिल गैसें पैदा होने लगती हैं। उनमें हाइड्रोजन, परऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड्स, मीथेन, कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाईऑक्साइड वगैरह होती हैं।

कचरे के सड़ने से बनने वाली इन बदबूदार गैसों को वैज्ञानिकों ने लैंडफिल गैसों के दर्जे में रखकर एक अलग ही श्रेणी बना दी है। दफन कचरे में भीतर ही भीतर जहरीला तरल पदार्थ जमीन की दरारों में भी रिसता है। यह जमीन को जीवों के लिए अनुपयुक्त बना देता है। भूगर्भ में निरंतर बहते रहने वाले जल-स्रोतों में मिलकर यह शुद्ध पानी को भी जहरीला कर देता है।

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