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येकेतेरिनबर्ग में नए युग की शुरुआत

रूस के शहर येकेतेरिनबर्ग में आज ब्रिक देशों का पहला शिखर सम्मेलन हो रहा है। ब्रिक की जरूरत क्यों आन पड़ी और इसका क्या मकसद है? इस विषय पर ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनेसियो लूला द सिल्वा ने एक विशेष लेख लिखा है।

यह लेख आज ब्राजील, रूस, चीन और भारत के चु¨नदा अखबारों में छापा ज रहा है। भारत में जिन दो अखबारों को इसके लिए चुना गया है, वे हैं- हिंदुस्तान और द हिंदू। रूस के शहर येकेतेरिनबर्ग में आज तथाकथित ब्रिक देशों यानी ब्राजील, रूस, भारत और चीन के नेता शिखर सम्मेलन के लिए जुटेंगे।

हमारी इस बैठक का महत्व महज इतना ही नहीं है कि यह ब्रिक का पहला शिखर सम्मेलन है। तमाम बड़े बदलावों से गुजर रही इस दुनिया में हमारी क्या भूमिका होनी चाहिए, इसे तय करने का यह एक महत्वपूर्ण मौका है। यहां हम पुरानी समस्याओं के नए समाधान ढूंढने की अपनी भूमिका तय करेंगे, साथ ही जड़ता और अनिर्णय की स्थितियों का मुकाबला करने के लिए जुझरू नेतृत्व देंगे।

आज दुनिया के सामने जो चुनौतियां हैं, उनमें काफी जटिलताएं हैं। लेकिन ये ऐसी चुनौतियां हैं, जिनका जवाब तुरंत ही दिया जना जरूरी है। हम उन खतरों के खिलाफ हैं, जो हम सब पर असर डालते हैं। जिनमें कुछ की भूमिका बहुत ज्यादा है, जबकि बाकी सब सीधे तौर पर इसके निरीह भुक्तभोगी हैं। और हां, हम उस दुनिया में रह रहे हैं, जहां पुराने सपने टूट रहे हैं और आपसी रिश्तों की संस्थाएं ढह रही हैं।

दुनिया पहले ही पर्यावरण में बदलाव की समस्या से त्रस्त है, दुनिया में खाद्यान्न और ऊज्र की किल्लत के खतरे भी सर पर मंडरा रहे हैं, ताज आर्थिक संकट ने इन परेशानियों को और बढ़ा दिया है। जहिर है कि आधुनिक समाज को उस व्यवस्था के बारे में सोचना ही होगा, जो धरती के अनंत कुदरती संसाधनों को इस कदर बर्बाद करती है। साथ ही दुनिया के करोड़ों लोगों को गरीबी और बदहाली में जीने की मजबूरी देती है।

इसीलिए 2008 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने कहा था कि ‘राजनीति करने का वक्त’ आ गया है। यह कठिन विकल्प चुनने का समय है। यह सामूहिक जिम्मेदारियों को लेने का समय है। क्या अमीर देश ऐसी कोई प्रणाली स्वीकार करने को तैयार हैं जो देशों से ऊपर उठकर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था को नियंत्रित करे। ताकि विश्वव्यापी मंदी के खतरे कम किए ज सकें।

क्या वे विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की निर्णय प्रक्रिया से अपना कब्ज खत्म करना चाहते हैं? विकासशील देशों में ऐसी नई तकनीक और वज्ञानिक प्रगति की लागत वहन करने में क्या वे सहमत हैं, जिससे विश्व पर्यावरण को किसी नुकसान से बचाया ज सके? क्या वे ढाल की तरह इस्तेमाल की ज रही उन सब्सिडी को हटाने को तैयार हैं, जिनके कारण विकासशील देशों में आधुनिक खेती घाटे का सौदा बन जाती है? जिसके चलते गरीब किसानों की किस्मत खाद्यान्न के सटोरिये और उदार दानदाता तय करते हैं।

ये कुछ सवाले हैं, जिनका ब्रिक जवाब चाहता है। इसीलिए हाल में लंदन में हुई जी-20 देशों की बैठक में हमने यह मांग की थी कि अमीर देशों को वोटिंग और बेट्रेन वुड संस्थानों के कोटा सिस्टम में सुधार करना चाहिए। इसके बाद ही विकासशील देशों की आवाज सुनी जएगी। हमने एक ऐसे साझ कोष की स्थापना के लिए भी सहमति बनाई है, जिससे अचानक ही निर्यात में कमी और नगदी के संकट में फंस गए देशों की तुरंत ही आपात मदद की ज सकेगी। और यह किसी नव उदारवादी कट्टरता से मुक्त होगा।

हम जी-20 के अगले शिखर सम्मेलन तक जो मूल नीतिगत समीक्षाएं चाहते हैं, यह उसकी दिशा में पहला कदम होगा। हम ऐसे नए प्रयासों के लिए दबाव डालेंगे, जिससे दोहा राउंड को तेजी से किसी संतुलित नतीजे पर पहुंचाया जा सके। अगर बहुपक्षीय संस्थाओं को नई सार्थकता देनी है तो संयुक्त राष्ट्र के नवीकरण की भी तत्काल ही जरूरत है।

खासकर अगर हम सुरक्षा परिषद् में सुधारों को टालते रहे तो  इससे उसके अंतरराष्ट्रीय रुतबे में ही कमी आएगी।
मैंने 2004 में भूख के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र एक्शन प्लान को प्रायोजित किया था। मुङो खुशी है कि येकेतेरिनबर्ग के एजेंडे में खाद्य सुरक्षा का मसला भी है। ये सारी पहल दिखाती हैं कि ब्रिक ऐसे बड़े देशों का एक समूह ही नहीं है, जिन्हें उनकी अर्थव्यवस्था के आकार ने एक साथ खड़ा कर दिया है, जिनके पास ढेर सारे कुदरती संसाधन हैं और जो अपने मूल्यों व हितों को सबके सामने रखना चाहते हैं।

हम सबसे अलग हैं क्योंकि हाल के वषों में हमारी अर्थव्यवस्था ने खासी तरक्की की है। 2003 से अब तक हमारे कारोबार में 500 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। इस आंकड़े से ही हम समझ सकते हैं कि आज दुनिया की 65 फीसदी तरक्की हमारे ही यहां क्यों हो रही है। इसी की वजह से आज हमें ही विश्वव्यापी मंदी से तुरंत निजत की सबसे बड़ी उम्मीद हैं।

इसलिए हमसे बहुत ज्यादा उम्मीदें बांधी ज रही हैं। यह उम्मीद कि हम चार देशों के जिम्मेदार नेतृत्व मिलकर विश्व प्रशासन की ऐसी व्यवस्था बनाएंगे, जिससे सबके लिए स्थायी विकास का रास्ता तैयार होगा। मैं मानता हूं कि यह ऐसी चुनौती है, जिसे स्वीकार करने के लिए हम सब तैयार हैं। जब मैं यूनियन का ऑर्गनाइजर हुआ करता था तब से अब तक के अपने पूरे राजनैतिक करियर में अपने अनुभव से मैंने यही एक मूल सबक सीखा है- अगर आप सचमुच असर डालना चाहते हैं तो यही काफी नहीं है कि आप सिर्फ सही हों या न्याय के साथ खड़े हों।

कमजोर आदमी के लिए कभी कोई नहीं बोलता जब तक वे खुद खड़े होकर बोलने वालों की कतार में शािमल नहीं हो जाते। हम पूरी ताकते से बोलेंगे, बातचीत करेंगे, हम अपनी प्रतिबद्धताओं पर खड़े रहेंगे और उसके पीछे अपनी पूरी राजनैतिक ताकत लगा देंगे। यह वह काम है, यही वह प्रतिबद्धता है, जिस पर  येकेतेरिनबर्ग में ब्रिक अपनी मुहर लगाएगा।

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