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अवैध हथियार : पाबंदी के लिए संधि जरूरी

देश के विभिन्न हिंसक संगठनों से जब्त हथियार चिंता का विषय बन रहे हैं। पिछले दो वर्षो में केन्द्रीय अर्धसैनिक बलों द्वारा जब्त विदेशी हथियारों के आंकड़ों को देखें तो वर्ष 2008 में वर्ष 2007 की तुलना में दो गुनी वृद्धि हुई है। उड़ीसा में जब्त हथियारों में आश्चर्यजनक वृद्धि बताती है कि कई नए क्षेत्रों में भी विदेशी हथियारों की घुसपैठ बहुत तेजी से बढ़ रही है।

गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार जम्मू-कश्मीर के उग्रवादी संगठनों से वर्ष 1990-2004 के दौरान जब्त हथियारों में 36273 क्लोशिनकोव राईफल व पिस्टल, 996 युनिवर्सल मशीनगन व 774 राकेट लांचर शामिल हैं। विदेशी हथियारों का अवैध व्यापार बहुत बढ़ चुका है और कई रास्तों से हथियार भारत पहुंच रहे हैं। उत्तर-पूर्वी राज्यों में अवैध हथियारों के आकलन से पता चला कि इनके स्रोत चीन, अमेरिका, बेल्जियम, ब्रिटेन, स्लोवाकिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, थाईलैंड व कंबोडिया तक खोजे जा सकते हैं।

कहा जता है कि अफगानिस्तान व पाकिस्तान में अफीम की खेती व हेरोईन की तस्करी से हासिल धन का एक बड़ा हिस्सा हथियारों की खरीद के लिए खर्च हो रहा है। अफगानिस्तान में अफीम उत्पादन वर्ष 2003 में 3600 टन था, तो वर्ष 2007 में यह लगभग 8200 टन तक पहुंच गया। इस वर्ष विश्व की 93 प्रतिशत हेरोइन अफगानिस्तान से प्राप्त हुई। अफीम उगाने वाले अफगान किसानों की संख्या 20 लाख से आगे निकल चुकी थी।

हालांकि विश्व स्तर पर हथियार व्यापार समझोते (आर्मस ट्रेड ट्रीटी) के जो प्रयास चल रहे हैं, उनसे भी हथियारों को खतरनाक संगठनों तक पहुंचने से रोका जा सकता है। नोबल शान्ति पुरस्कार के 18 विजेताओं ने हथियार संधि का विचार पेश किया है। यह संधि हथियारों के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार पर रोक नहीं लगाती है पर उसे नियंत्रित करने की बात कहती है। इसके तहत एक प्राधिकरण बनेगा और दुनिया भर में जो भी हथियारों का व्यापार होगा वह प्राधिकरण की अनुमति से व उसकी देखरेख में ही होगा।

यह ध्यान रखा जएगा कि इन हथियारों का इस्तेमाल अन्तर्राष्ट्रीय कानून के उल्लंघन के लिए नहीं होगा, संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के उल्लंघन में नहीं होगा, मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए नहीं होगा, मानवता के विरुद्ध किसी अपराध के लिए नहीं होगा, राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने व विकास अवरुद्ध करने के लिए नहीं होगा।

पूर्व नौसेना अध्यक्ष एडमिरल एल़ रामदास ने हाल ही में कहा, ‘भारतीय नौसेना में दुनिया के अनेक भागों में सेवा करते हुए मैंने युद्ध से होने वाली मानवीय त्रासदी देखी है व अनियंत्रित हथियारों के व्यापार से उत्पन्न अस्थिरता को भी देखा है। भारत व पूरे विश्व की सुरक्षा के प्रयासों में हथियार नियंत्राण संधि की महत्वपूर्ण भूमिका है।’

वर्ष 2006 के आरंभिक प्रयासों में लगभग 150 से अधिक देशों ने इस संधि के पक्ष में मतदान किया। भारत में इस संधि के पक्ष में चल रहे अभियान को हजारों लोगों का समर्थन मिला है। भारतीय हथियार नियंत्रण प्रतिष्ठान जैसे संस्थानों ने भी इसके लिए काफी समर्थन जुटाया है।प्रतिष्ठान की समन्वयक बीनालक्ष्मी नेपराम के अनुसार इस समय हथियार उद्योग को नियंत्रित करने के जो प्रयास हो रहे हैं, वे वीडियो व म्यूजिक क्षेत्र के नियमन के प्रयासों से भी कमजोर हैं।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की डा़ अनुराधा चेनॉय के अनुसार राष्ट्रीय सुरक्षा की परिभाषा को व्यापक रूप देना चाहिए जिससे तरह-तरह की हिंसा को ङोल रहे जनसाधारण की सुरक्षा को इसमें पर्याप्त महत्व देते हुए शामिल किया जा सके।  यदि राष्ट्रीय सुरक्षा को इस व्यापक संदर्भ में देखा जाए तो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए हथियार नियंत्रण समझोता बहुत उपयोगी और महत्वपूर्ण है।कई जानकार लोगों का मानना है कि व्यापार नियंत्रण संधि/समझोते से भारत में विदेशी हथियारों की घुसपैठ को रोकने में मदद मिलेगी।

पर भारत सरकार को कुछ ङिाझक भी है। इस विवाद को सुलझने के लिए हाल ही में एक विशेषज्ञ लेफट्रीनेंट जनरल (अवकाश प्राप्त) बी़ एस़ मलिक ने कहा कि यदि इस समझोते की आवश्यकता ओर उपयोगिता को पहले स्वीकार कर लिया जाए तो फिर इससे जुड़ी किसी कठिनाई या आपत्ति का हल अलग से खोजा जा सकता है।

आग्नेयास्त्रों की हिंसा के शिकार लोगों की चिकित्सा में कार्यरत यूगांडा के डा़ ओलिव कोबूसिंगये ने हाल ही में कहा- इस कीचड़ को दूर करने के लिए केवल सफाई करना या केवल नल बंद करना पर्याप्त नहीं है- दोनों कार्य एक साथ करने होंगे। दूसरे शब्दों में हथियारों के व्यापार को भी नियंत्रित करना होगा व आम लोगों के स्तर पर शान्ति, अहिंसा, सुरक्षा का संदेश भी फैलाना होगा।

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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