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समर्थ गुरु रामदास

समर्थ गुरु रामदास आज इसलिए भी स्मरण किए जाते हैं, क्योंकि वह छत्रपति शिवाजी महाराज के आध्यात्मिक गुरु थे। उन्होंने अपनी साधना, भक्ति और चिंतन के द्वारा महाराष्ट्र में आध्यात्मिकता का निर्गुण ब्रह्म और सगुण ब्रह्म के समन्वय की चेतना का जो समन्वय किया, वह अभूतपूर्व था। महाराष्ट्र में उन्हें हनुमान का अवतार मानकर पूज गया।

समर्थ गुरु रामदास ने अपने संदेशों द्वारा संत सम्मत शासन-परम्परा का शुद्ध तथा परम निर्मल स्वरूप समझकर प्राणिमात्र को परमात्मा की ओर उन्मुख किया। समर्थ रामदास राम के भक्त थे। जिन दिनों छत्रपति शिवाजी महाराज महाराष्ट्र में स्वराज स्थापित कर रहे थे, समर्थ रामदास ने जन-जन के बीच भागवत दूत के रूप में, सर्वत्र रामराज्य की स्थापना का संदेश दिया।

वह कहते थे- ‘जब धर्म का अंत हो जए तब जीने की अपेक्षा मर जना अच्छा है।’ उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज से कहा- ‘मराठों को एकत्र कीजिए। धर्म को फिर जीवित कीजिए।’ उन्होंने समाज में फैलाई ज रही वमनस्यता का विरोध किया। राजसत्ता द्वारा उत्पन्न की ज रही सामाजिक-आध्यात्मिक दूरियों को पैदा होने से रोका।

एक धर्मपरायण और भागवत प्रेमी परिवार में, हैदराबाद के औरंगाबाद जनपद के आबन्द नामक मंडल के जम्ब गांव में सूर्याजी पन्त के पुत्र के रूप में उनका जन्म हुआ था। बचपन से ही हनुमान जी के प्रति उनके मन में सहज भक्ित भाव था। कहते हैं हनुमान जी ने उनकी भक्ित और निष्ठा से प्रसन्न होकर दर्शन दिया और स्वयं राम जी ने वरदान देकर कहा- ‘धर्म का प्रचार करो। लोक कल्याण करो।’ इसी से उनके बचपन का नाम ‘नारायण’से बदल कर ‘रामदास’ हो गया।

समर्थ रामदास युवावस्था में, ववाहिक बंधन तोड़ कर गोदावरी के जल में स्नान कर साधना में लीन हो गए। तीन साल तक ‘Þाीराम जय राम जय जय राम’ का जप सहित कठोर तप एक गुफा में किया। वह कहते थे- ‘राम राघव का रूप आकाश के समान है। उनके रूप का चिंतन करते रहने से भव का जड़ोन्मूलन हो जता है, संसार का अस्तित्व समाप्त हो जता है। देह भाव मिट जाता है।’

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