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गौं कि हैरयाली थैं लगी कैकी गाली

गौं कि हैरयाली थैं लगी कैकी गाली जगौं-जगौं ढक्या द्वार जगा जगौं ताली यानि गांव की हरियाली को किस की गाली लग गई है जगह-जगह द्वार ढंके हैं और घरों पर ताले लगे हैं। पहाड़ से पलायन के दर्द को व्यक्त करती गढ़वाली कवियत्री बीना कंडारी की यह अकेली कविता नहीं थी बल्कि कई अन्य गढ़वाली कवियों ने भी पलायन के दर्द को मार्मिक अंदाज में कविताओं में व्यक्त किया।


मौका था सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था धाद द्वारा गढ़वाली कवि ओमप्रकाश सेमवाल की पुस्तक मेरि पुफू के लोकार्पण के अवसर पर अजबपुर कलां में आयोजित गढ़वाली कवि सम्मेलन का। बीना कंडारी के बाद गढ़वाली कवि शांति प्रकाश जिज्ञासु ने इन लागणू च क्वी मेरी बोली लगाणू च रोज क्वी न बैठणौ चौफ नि छन खौफे ग्यों मि बाटे देखी किरायै कूड़ी सजणू छै तू अपणी कूड़ी भूल गे तू प्रस्तुत की। जगदंबा प्रसाद चमोला ने पलायन से उपजे पहाड़ के दर्द को बेहद मार्मिक अंदाज में स्वर देती अपनी ये कविता-एक स्योर लगद छो जौंक खालि घूड़ पर स्ये बुढल्दी आज छ यकुली चार आवास कुड़ी पर यानि जहां कभी भरे-पूरे परिवार से घर गुलजर रहता था वहां चार मकानों में अकेली बुढ़िया रहती है।


कालिका प्रसाद नवानी ने राजनीतिक व्यवस्था और मतदान की असलियत को उजगर करती अपनी यह कविता-हम सभी ना वोट दे अपणो अर वो जीत गेना अब कना घुंद फोड़ी जो जीति गेना प्रस्तुत की। यानि हम सभी ने वोट दिये तो वो लोग जीत गए। जीतने के बाद अब वह लोग आपस में सिर-फुटौव्वल कर रहे हैं। ऐसे में हमारे मतदान का क्या औचित्य रह गया है।

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