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अपनी मिट्टी से गहरा अनुराग था उनका

मेरि पुफू यानि मेरी बुआ कहानी संग्रह की असली प्रेरणा स्रोत तो मेरी बुआ ही हैं। उनका अपने पहाड़ की माटी से जो अनुराग था उसने ही मेरे अंतर के रचनाकार को जाग्रत किया और उसी का नतीजा है मेरि पुफू। उनका कहा यह वाक्य मैं कभी नहीं भूल सकता कि मेरी तरफ से कहीं भी बस जाओ तुम्हें लौट के अपनी जमीन में आना होगा। मैं सोचता हूं कि जितने भी लोग पहाड़ से आजीविका या चकाचौंध की तलाश में महानगर पहुंचे हैं उन्हें एक न एक दिन अपनी जमीन में लौटना ही होगा।


यह कहना है गढ़वाली कहानी संग्रह-मेरि पुफू के रचनाकार ओमप्रकाश सेमवाल का। ओमप्रकाश सेमवाल कहते हैं मेरि पुफू में 12 कहानियां हैं। मेरि पुफू मैंने अपनी पुफू को केंद्र में रखकर लिखी है। पुफू पीतांबरी देवी बाल विधवा थी। ढाई साल पहले उनका 85 साल की उम्र में निधन हो गया। मेरे लालन-पालन में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उनका कहा यह वाक्य मुझे कभी नहीं भूलता कि तुम कहीं भी रहो मुझे अपने खेत-खलिहान और गाय-भैंसों से प्यार है। वह ताउम्र अपनी जमीन-जयदाद और घर के प्रति समर्पित रहीं। मेरे अंतस में बालपन से उनकी एक मानवीय छवि बसी हुई थी जो धीरे-धीरे और प्रगाढ़ होती गई। उन्होंने गांव में एक पीपल का पेड़ लगाया था। मुङो कहती थीं इसे रोज पानी देना और सावन के महीने में इसके नीचे दीया जरूर जलाना।


उनकी कही ये बातें और उन्होंने जो संस्कार दिए वह मेरे मन को मथते रहे और मैं कहानी के बहाने उनका रेखाचित्र बनाता रहा। कब इसने एक कहानी का रूप ले लिया पता ही नहीं चला। कहानी में उनका अक्स है पर कुछ फैंटेसी भी है जिससे मैंने कहानी को सजाया है। सेमवाल पेशे से प्रवक्ता हैं। पहाड़ को करीब से देखा-भोगा है। कहते हैं मेरी कहानियों के केंद्र में पहाड़ की वह श्रमशील औरत है जो रात दिन अपने बच्चों के लिए खटती रहती है बिना किसी लालच और अपेक्षा के। कहानी संग्रह की और कहानियां हैं धर्मा, हसरु, फजितु, आस, ब्वे, भात, वबरि, नयि कुड़ि, बेटि-ब्वारि, बड़ा भैजि और गुरुजि।
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गढ़वाली भाषा को प्रतिष्ठित किया सेमवाल ने
ओमप्रकाश सेमवाल के कहानी संग्रह मेरि पुफू का विमोचन
 क्षेत्रीय भाषाएं तभी प्रतिष्ठित होंगी जब हम उन्हें आपस की बातचीत में बोलें और उन्हें साहित्य में प्रतिष्ठित करने का काम करें। दुनिया की सभी क्षेत्रीय भाषाएं ऐसे ही प्रतिष्ठित हुईं। इसका अनुपम उदाहरण हैं सोवियत रूस के साहित्यकार। रूसी को प्रतिष्ठित करने में वहां के साहित्यकारों टॉलस्टाय, मक्सिम गोर्की और चेखव ने अविस्मरणीय भूमिका निभाई। साहित्यकार ओमप्रकाश सेमवाल की यह पहल उस मुकाबले में छोटी जरूर हो सकती है पर इन्ही छोटी-छोटी पेशकदमियों से अपनी बोली भाषा साहित्य में प्रतिष्ठित होती है और दुनिया में उसका गौरव बढ़ता है।
ओमप्रकाश सेमवाल के  कहानी संग्रह का विमोचन रविवार को अजबपुर कलां स्थित एक वेडिंग प्वाइंट में मुख्य अतिथि लोनिवि प्रांतीय खंड के अधिशासी अभियंता दयानंद ने किया।

दयानंद ने कहा कि अपनी बोली-भाषा को साहित्य में प्रतिष्ठित करना हर लेखक का दायित्व है और सेमवाल ने ऐसा करके गढ़वाली भाषा की सेवा की है। इस अवसर पर आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए लेखक ओमप्रकाश सेमवाल ने कहा कि मेरे लेखक बनने के मूल में मेरी पुफू है। उनको याद करते हुए सेमवाल की आंखों में आंसू आ गए। बुआ को याद करते हुए उनका गला रुंध आया। रुंधे गले से उन्होंने इतना ही कहा कि बुआ ने अंदर के जिस रचनाकार को जगाया है उसे आगे बढ़ाता रहूंगा और पहाड़ से पलायन को रोकने के लिए साहित्य की जितनी सेवा कर सकूं उतना करता रहूंगा। उन्होंने कहानी संग्रह के प्रकाशन के लिए सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था धाद का आभार जताया। कार्यक्रम के समापन पर लोनिवि सहायक अभियंता और सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन धाद से जुड़े डीसी नौटियाल ने समारोह में आए सभी लोगों का आभार व्यक्त किया।


समारोह की अध्यक्षता धाद संगठन के केंद्रीय अध्यक्ष लोकेश नवानी ने की जबकि संचालन गढ़वाली कवियत्री बीना बेंजवाल ने किया। इस अवसर पर मैती संगठन के केंद्रीय अध्यक्ष लोकेश नवानी, सेवानिवृत्त बीएसए अव्वल सिंह रावत, सामाजिक कार्यकर्ता पीसी तिवारी, तोताराम घिल्डियाल, शांति प्रकाश जिज्ञासु, तोताराम घिल्डियाल, लक्ष्मी भट्ट, जगदंबा चमोला, दर्शन सिंह बिष्ट, संतोष खेतवाल, मणि भारती, विजयकुमार आदि उपस्थित थे।

 

 

 

 

 

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