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उर्दू मीडिया : ओबामा फामरूले पर शक़ की नजर

‘अमेरिकी राष्ट्रपति के फार्मूले का हश्र को उजागर करते हुए ‘सहरोज दावत’ ने लिखा है कि बराक ओबामा ने जो फार्मूला पेश किया है उसके तहत मुस्लिम दुनिया को चाहिए कि वह इजराइल के वजूद को मान ले इसके बदले उसे एक फलस्तीनी स्टेट मिल जाएगा। जॉर्ज बुश ने भी दूसरी पारी के अंतिम दिनों में राष्ट्रपति रहते यह रोडमैप पेश किया था।

इस पेशकश पर विचार करना और इस पर बातचीत को आगे बढ़ाना तो बाद की बात है, पहले यह विचार करने की जरूरत है कि इसके सामने इसका व्यावहारिक रूप क्या है, क्या पहले फलस्तीनियों और मुस्लिम दुनिया को इस बात पर तैयार करना और इससे यह स्वीकार कराना चाहते हैं कि वह इजराइल के वजूद को मान ले, उसके बदले में उसे फलस्तीन के एक भाग में फलस्तीन स्टेट दिया ज सकता है।

अर्थात उन की पेशकश एक दूसरे से जुड़ी हुई है, क्या इनसे यह सवाल किया ज सकता है कि यदि इस पहल के बाद इजराइल ने फलस्तीनी स्टेट को मानने से इंकार कर दिया तो क्या अमेरिका में यह होता है कि वह इजराइल को अपना वादा निभाने के लिए मजबूर कर दे।

इस बीच अमेरिका के इजराइल समर्थक समूह की ओर से एक सुझव यह भी आया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जिसको फलस्तीनी स्टेट कहते हैं, इसको एक और रूप दिया ज सकता है, इस सुझव के अनुसार पश्चिमी किनारा तो उरदन को दे दिया जए और गाज की पट्टी मिस्र के हवाले कर दी जए यूं ‘झगड़े की जड़’ को ही खत्म कर दिया जाए। स्वयं ओबामा अपने इस भाषण में यह स्पष्ट कर चुके हैं कि इजराइल के मामले में इनके हाथ बंधे हुए हैं।

मौलाना सैयद अबुल हसन अली इंस्टीटच्यूट के बुलेटिन ‘खबरनामा’ में सीपीआईएम महासचिव प्रकाश करात के हवाले से एक लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने यह रहस्योद्घाटन किया कि हिन्दी और अंग्रेजी मीडिया के बाद उर्दू मीडिया को भी यहूदियों के हाथों में बेचा ज रहा है, क्योंकि भारतीय मुसलमान बड़ी संख्या में उर्दू अखबार पढ़ते हैं लिहाज भारत के एक बड़े कारोबारी परिवार ने यहूदी कंपनियों के सहयोग के बाद उर्दू दैनिक का प्रकाशन शुरू कर दिया है।

शुरू में इस परिवार ने एक मासिक पत्रिका शुरू की, जो आज एक बड़े दैनिक अखबार के रूप में बदल चुकी है और इस समय देश के नौ बड़े शहरों से इसका प्रकाशन हो रहा है, स्वयं उर्दू भाषा के एक टीवी चैनल ने भी यहूदियों की छत्रछाया में अपना प्रसारण शुरू कर दिया है। इसके अतिरिक्त उर्दू के कई समाचार पत्रों के मालिकों और पत्रकार अमेरिका और यहूदी संगठनों की मदद से अमेरिका का दौरा कर चुके हैं। दिल्ली और कोलकाता से प्रकाशित होने वाले एक अखबार के मालिक हर साल अमेरिका का दौरा उन्हीं संगठनों के खर्च पर करते हैं।

रांची, पटना और दिल्ली से प्रकाशित होने वाले उर्दू दैनिक ‘फारुकी तनजीम’ ने ‘सम्मानित अदालतों के असम्मानित फैसलों’ से अपने सम्पादकीय में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का उल्लेख कर बताया है कि किस तरह किसी हिन्दू जोड़े का तलाक का मामला जता है और अदालत आश्चर्यजनक फैसला देती है कि देश में समान नागरिक संहिता लागू किया जए, जबकि इस टिप्पणी का असल मामले से दूर-दूर का संबंध नहीं है।

पंजाब में सिख समुदाय द्वारा चलाए ज रहे मेडिकल कॉलेज में एक सिख लड़की के दाखिले को इसलिए निरस्त कर दिया गया कि वह भंवें बनाती है। हाईकोर्ट ने फैसले में कहा कि भंवे बनाने वाली लड़की को सिख करार नहीं दिया ज सकता। अदालतों का काम नागरिकों के अधिकारों का संरक्षण है न कि बाल, दाढ़ी और भंवें आदि के परिप्रेक्ष्य में धर्म की नई व्याख्या करें। 

 ‘टोपी और चोटी को नजरंदाज करना कांग्रेस के लिए महंगा पड़ सकता है’ इस खबर को ‘आफताबे हिन्द’ ने प्रमुखता से प्रकाशित किया है। अखबार लिखता है कि लोकसभा सदस्यों की संख्या के लिहाज से 72 लोगों को मंत्री बनाया ज सकता है, 69 को मंत्री बनाया ज चुका है।

यदि इसमें विस्तार किया जए तो ज्यादा से ज्यादा तीन लोगों को शामिल किया ज सकता है और जहिर है कि यह तीनों मुस्लिम नहीं हो सकते, जबकि केन्द्रीय मंत्रिमंडल में 11 मुसलमानों को शामिल किया जना चाहिए, वर्तमान में पांच मुस्लिम मंत्री हैं, जिसमें दो का संबंध कांग्रेस से है और अन्य तीन उसकी सहयोगी पार्टियों से हैं। इसी तरह कांग्रेस ने केवल तीन ब्राrाणों को मंत्रिमंडल में जगह दी है। दस ईसाइयों और दस दलितों को मंत्री बनाया है। इससे साफ जहिर होता है कि कांग्रेस नेतृत्व ने केन्द्रीय मंत्रिमंडल में मुसलमानों और ब्राrाणों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया।

लेखक स्तंभकार हैं।

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