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राजा ही बनिए

टी. एस. इलियट ने लिखा था कि ‘वह जीवन कहां है, जिसे जीने की कोशिश में हमने खो दिया है?’ आज जीवन में सब कुछ होते हुए भी वह नहीं है, जो इसे सहज, प्राणमय और संतुष्ट बना सके। ईश्वर ने हमें इच्छाएं दीं, जो हमारे व्यक्ितत्व को बनाती हैं। पर हमने अधिकतर इच्छाएं अपने से जोड़ लीं, अपने सुख को इष्ट बना लिया।

कई बार तो व्यक्ित यह भी नहीं जनता कि वह किसके पीछे और क्यों भाग रहा है। इसलिए वह कभी संतुष्ट नहीं हो पाता, तनावग्रस्त जरूर रहता है। संत इग्नेटस ने इस कोशिश को तुच्छ साबित करते हुए लिखा है, ‘उससे आदमी को क्या फायदा होगा, जिससे वह दुनिया को जीत लेगा, पर आत्मा को हार बैठेगा।’ सच्ची जीत के लिए व्यक्ित को अपनी इच्छाओं पर काबू रखना होगा।

दुराग्रही मन को वश में करना आ जए तो वह संतोष से भर उठता है। संतोष हमें निरंतर खुशी देता है। जब व्यक्ित संतुष्ट और प्रसन्न होता है तो अपने आसपास भी वही भाव देखना और फैलाना चाहता है, जबकि असंतुष्ट व्यक्ित औरों की खुशी से भी नाराज रहता है।

आजकल कोई भी परेशानी, वह आर्थिक हो या शारीरिक, वास्तविक हो या काल्पनिक झट से प्राण लेने या देने का बहाना बन जती है। कई बार तो स्वयं जन्मदाता माता-पिता ही अपने बच्चों को मौत के घाट उतारने में तनिक भी नहीं कांपते। एक समय था, जब हत्या से बड़ा पाप आत्महत्या को माना जता था। इस सबके मूल में असंतोष ही है।

अंजाम अपरिचित युवकों को हिंसा का शिकार बनाने वाले देशी और विदेशी दोनों ही हैं। कोई असंतोष या असुरक्षा या नाराजगी ऐसे कृत्य को क्षमा नहीं करने दे सकती। सभ्य समाज में रहने वालों को बर्बर व्यवहार की छूट नहीं होनी चाहिए। सोलहवीं सदी के एक इतालियन कवि के शब्दों में कहा जए तो, ‘मैं राज हूं, क्योंकि मैं जनता हूं कि मैं अपने को कैसे काबू कर सकता हूं।’ राज बनिए, रंक नहीं।

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