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जनतंत्र में राजतंत्र

अतीत का वर्तमान पर गजब का असर है। अपन को दुनिया की खबर तो नहीं है, बस भारत का थोड़ा बहुत पता है। कभी इस प्यारे मुल्क में राज, महाराज, नवाब-बादशाह जसे फन्ने खां होते थे। हमें बचपन की याद है। इन्दौर के पास एक छोटी सी रियासत थी देवास। कोई सोचे। पचास-साठ हजर की आबादी में एक नहीं, दो-दो राज थे।

एक सीनियर, एक जूनियर। चोर सीनियर में चोरी करता और देवास जूनियर में शरण लेता। तब भी चोरों के ठाठ थे, आज भी हैं। थाने के क्षेत्रीय विवाद का चोर तब भी फायदा उठाते थे, आज भी। वह तो सरदार पटेल की इनायत थी कि छोटी-बड़ी रियासतों का भारतीय जनतंत्र में विलय हो गया। आज के देवास को लोग ई. एम. फॉस्र्टर के लेखन, रजब अली खां साहब और कुमार गंधर्व की गायकी तथा स्वर्गीय नईम की कविताओं से ज्यादा जानते हैं, दो राजओं के अजूबे से कम।

भारत की खासियत है। जो बीता, वह भी यहां, पूरी तौर पर कभी नहीं बीतता। राज तो चल बसे उनके प्रजतांत्रिक उत्तराधिकारी शान शौकत-विरासत की परम्परा को जीवित रखे हैं। किसी भी सूबे के छुटके से छुटके मंत्री की जीवन-शैली बड़के से बड़के राज-महाराज से टक्कर लेती है। इन हालात में प्रांत का आला वजीर क्या करे? उसे साबित करना है कि वह सूबे का सबसे महत्वपूर्ण जनतांत्रिक हीरो नम्बर वन है, बाकी छुटभइए। लिहाज, उस का घर सुरक्षा का किला है।

बाहर निकले तो यही किला उसके साथ चलता है। सड़क रुकती है। यातायात थमता है। लाल बत्ती जगमगाती है। सायरन बजता है। कहने को वह सेवक है, जनता का। यह तो ओहदे की सज है। भुगत रहा है बेचारा! भारतीय जनतंत्र में राजतंत्र के अवशेष हमारी पहचान है। मंत्री जी का भरा-पूरा परिवार है। वह लड़के-लड़की की बराबरी के पक्षधर हैं। जनता जनती है। मंत्री तो पप्पू ही बनेगा। बड़ा जो ठहरा। उसके बाद गप्पू की बारी है।

यदि दोनों खेत रहे तब जकर बेटी, मुन्नी का नम्बर आएगा। सिद्धांतवादी हैं, नेता। राजशाही के समय-सिद्ध-सिद्धांत को कैसे नकारे? उसका मुख्यमंत्री एक कदम आगे है। वह केन्द्र सरकार का खास है। मिली-जुली सरकार उस पर निर्भर है। लोग एक से परेशान हो जते हैं, उसकी तीन पत्नियां हैं। केन्द्रीय मंत्रिमंडल के गठन से वह कोप भवन में है। मध्यस्थ उसे मना रहे हैं।

वह सहायक से पूछता है- ‘बात कहां तक पहुंची?’ सहायक डरता-सहमता बताता है- ‘सर! वह तीन पर अड़े हैं, चौथे के लिए राजी नहीं हैं।’ वह थकी-बुझी आवाज में कहता है- ‘चलो! तीनों का एक-एक तो ठिकाने लगा। लड़की का देखेंगे!’ दुनिया में भारत, राजतंत्र और प्रजतंत्र का, इकलौता समन्वित स्वरूप है।

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