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कारखानों का आश्वासन

अप्रैल के दौरान कारखानों के उत्पादन में 1.4 फीसदी वृद्धि की खबर का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे सरकार के कई प्रोत्साहन पैकेजों और ब्याज दर कटौतियों की लाज बच गई है! वास्तव में यह खबर पहला स्पष्ट संकेत है कि दिसंबर के बाद उठाए गए इन कदमों का बाजर पर सकारात्मक असर हुआ है, वरना लगातार नेगेटिव जोन में छटपटाते औद्योगिक उत्पादन सूचकांक की दुर्गति देख एक बार तो अर्थबिरादरी इस निष्कर्ष पर पहुंचने लगी थी कि सरकारी खर्च बढ़ाने की पूरी कवायद अकारथ ही रही।

इस मायने में अप्रैल  के दौरान फ्रिज-टीवी जैसी वस्तुओं के टिकाऊ उपभोक्ता सामान उपवर्ग में दर्ज लगभग 17 फीसदी की शानदार बढ़त तो और भी हौसला बढ़ाती है क्योंकि इससे आश्वासन मिला है कि देर से ही सही लेकिन सरकारी खजनों का मुंह खोलने की आजमूदा रणनीति अपना रंग दिखाने में कामयाब रही।

उत्पादन की सिकुड़न के इस क्रम का टूटना बहुत जरूरी था क्योंकि यही आंकड़ा बाजर मांग बढ़ने का सबसे पुख्ता प्रमाण होता है और भारतीय अर्थशास्त्री कई माह से बेसब्री के साथ बाजर मांग की बहाली की खबर का इंतजर कर रहे हैं। उम्मीद की जनी चाहिए कि अब अगर बजट में यूपीए सरकार राजकोषीय घाटा बढ़ने का जोखिम उठाते हुए सरकारी खर्च में बड़े इजफे का ऐलान करती है तो वह अंधेरे में तीर मारने जसा नहीं होगा, बल्कि उसके पास मंदी को परास्त करने के कुछ प्रत्यक्ष और समयसिद्ध तर्क भी होंगे।

ताज आंकड़े को अगर मंदी की विदाई के एक नए संकेत के तौर पर देखा ज रहा है तो यह भी स्वाभाविक ही है। जिस समय मंदी के विश्व केंद्र अमेरिका/यूरोप में ही यह कहा जने लगा है कि सबसे बुरा दौर गुजर चुूका है, उस समय भारत या चीन को तो यह कहने का और भी ज्यादा अधिकार है क्योंकि वे तो मंदी से उतने प्रभावित भी नहीं रहे।

औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े पर अपनी प्रतिक्रिया में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष सुरेश तेंदुलकर ने कहा है कि इसे रिकवरी का संकेत माना ज सकता है। देश के ज्यादातर अर्थशास्त्री तेंदुलकर के बयान का समर्थन ही करेंगे। सेंसेक्स की मौजूदा मजबूती, वित्तवर्ष 2008-09 की आखिरी तिमाही में दर्ज 5.4 फीसदी की विकास दर, 0.13 फीसदी के स्तर पर ठिठकी मुद्रास्फीति और बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर ग्रोथ जसे हाल में आए दूसरे संकेत इसी आशावाद की तो पुष्टि कर रहे हैं! 

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