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उच्चशिक्षा रूपी घूरे के दिन फिरने की चुनौतीपूर्ण घड़ी

कुछ महीने पहले बंगाल के एक ख्यातनामा और सफल अखबार समूह के मालिक ने इन पंक्तियों की लेखिका से कहा, कि वे अपने यहा संपादकीय ओहदों के लिए सिर्फ ऐसे लोगों को ही चुनते हैं, जिनके पास एक अच्छी ‘फॉरेन’ डिग्री हो। अच्छे माने जाने वाले भारतीय विश्वविद्यालयों से निकले लोग भी उनकी राय में अब इस महती उत्तरदायित्व के योग्य नहीं ठहरते।

बात कड़वी होते हुए भी गौरतलब है। दुनियाभर के पढ़े-लिखे समृद्ध समाजों ने स्तरीय ज्ञानाजर्न के लिए आज जो कसौटिया स्वीकार की हुई हैं, उनमें पुस्तकीय ज्ञान और तर्कप्रवण दिमाग के अलावा परिष्कृत बोली-बानी, खासकर अंग्रेजी के इस्तेमाल की क्षमता अनिवार्यत: शामिल हैं। और हमारे यहा उच्च शिक्षा संस्थान दिनों-दिन इसमें अक्षम होते ज रहे हैं।

पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों के साथ हुई बदसलूकी और उससे पहले अमेरिका में आंध्र के लगभग एक दर्जन तकनीकी स्नातकों की हत्याओं के संदर्भ में भी यह बार-बार कहा गया, कि न जने क्यों हमारे छात्रों और उनके मा-बाप में विदेशी डिग्रियों के प्रति ऐसी ललक है। क्यों नहीं उनके अभिभावक उन्हें इससे कहीं कम खर्चे पर भारत के ही किसी निजी संस्थान में उच्चशिक्षा के लिए दाखिला देते?

गौरतलब है कि ऑस्ट्रेलिया में हमारे जो लगभग एक लाख छात्र पढ़ रहे हैं, उन सबको भी वहा की बहुत सुख्यात युनिवर्सिटीज में दाखिला नहीं मिला है, पर फिर भी ऊची फीस भर कर वे वहा पढ़ना पसंद कर रहे हैं। क्योंकि विदेशी डिग्री धारकों के लिए दाखिले तथा परीक्षा दोनों स्तरों पर एक चुस्त खोजबीन और मेहनतभरी डगर से गुजरना अनिवार्य होता है।

इसलिए उस शिक्षा की गुणवत्ता ज्यादा और वहा पाई डिग्री अधिक विश्वसनीय मानी जती है। हम इस मान्यता को पूरी तरह खारिज भी नहीं कर सकते, क्योंकि भारत में फैकल्टी चयन, विश्वविद्यालयों में दाखिला प्रक्रिया और परीक्षा प्रणाली में अवांछित राजनीतिकरण से जो व्यापक भ्रष्टाचार और भाई-भतीजवाद आ घुसा है, उसकी वजह से ऊची डिग्री प्राप्त प्रत्याशियों की क्षमता को लेकर एक तरह का संदेह बना रहता है।

ग्यारहवीं पंचसाला योजना का लक्ष्य है, कि बारहवीं के बाद ऊची शिक्षा के लिए दाखिला लेने वालों की तादाद (जो अभी कुल उत्तीर्ण छात्रों की 10 प्रतिशत है) बढ़ कर 15 प्रतिशत हो जए। लक्ष्य सुन्दर है। पर वह उच्चशिक्षा क्षेत्र में 80 लाख और छात्रों को दाखिले के लिए भेज देगा।

क्या संसाधनों की कमी, ढाचे की अपर्याप्तता और छात्रों की लगातार बढ़ रही तादाद से चरमराता हमारा उच्चशिक्षा क्षेत्र इस बाढ़ को तसल्लीबख्श तरीके से आत्मसात कर सकेगा? अब तक इस चुनौती को हमारी शिक्षा व्यवस्था ने अपने सामान्य फुर्सती ढंग से ही झेला है, और सख्त सरकारी नियंत्रण के साथ निजी क्षेत्र को शिक्षण संस्थाओं की (खासकर इंजीनिय¨रग की पढ़ाई के क्षेत्र में) स्थापना की छूट दे दी गई। पर सरकारी नियंत्रण के प्रताप से वहा भी लायसेंस, कोटा, परमिट राज अपनी तमाम भ्रष्टाचारी संभावनाओं समेत पिछवाड़े के रास्ते से प्रवेश कर गया है।

इस बार कपिल सिब्बल सरीखे अग्रगामी माने जने वाले वक्तृता कुशल मंत्री के चयनित होने से शिक्षा-हितैषियों की उम्मीदों को बल मिला है, कि अब सरकार चाहती है कि यह मंत्रालय उच्चशिक्षा के क्षेत्र को सियासी मोहरा बनाकर सिर्फ इस या उस धड़े के तुष्टीकरण या पार्टी एजेंडे को बढ़ाने का माध्यम नहीं, बल्कि सामयिक और जरूरी बदलावों का वाहक बनेगा। 

जरूरी बदलाव क्या हों? इस दम सबसे पहली और बड़ी जरूरत तो यह है कि ऊची शिक्षा के लिए लालायित छात्रों की भारी तादाद को हमारे उच्चशिक्षा केन्द्र मेरिट के आधार पर ठीक से समेट कर उनको स्तरीय शिक्षा दें। साथ ही उच्चस्तरीय शोध को प्रोत्साहन भी मिले। दोनों क्षेत्रों में आज गुणवत्ता की अंतरराष्ट्रीय तालिकाओं में चीनी विश्वविद्यालय हमारे सर्वÞोष्ठ शिक्षा संस्थानों से लगातार ऊपर दिखाई देने लगे हैं।

उदाहरण के लिए 2008 में लंदन टाइम्स की सूची में सिर्फ दो भारतीय संस्थानों (आई.आई.टी. दिल्ली तथा मुंबई) को ही 154 तथा 179 वीं पायदान पर जगह मिल पाई। पर हमारी तुलना में चीन के छ: विश्वविद्यालय 50 से लेकर 144 तक की पायदानों पर ज पहुंचे। इसकी मूल वजहें हैं : एक, चीन सरकार ने उच्चशिक्षा क्षेत्र के लिए प्रचुर धन का बंदोबस्त किया है। और दो : उसने अपने बड़े विश्वविद्यालयों का शक्षिक स्तर उठाने को अंतरराष्ट्रीय ख्याति के अकादमिकों को मुंहमांगे वेतन पर अपने परिसरों में नियुक्त किया है।

हमारे देश के शिक्षाशास्त्री और छात्र भी यदि आज किसी बात पर एकमत हैं, तो वह यह, कि अच्छी और स्तरीय शिक्षा के लिए सही फैकल्टी के चयन, दाखिलों की प्रक्रिया और प्रमोशन प्रणाली पर सरकारी जकड़बंदी खत्म होनी चाहिए। फिलवक्त भारत में इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (आई.एस.बी.) ही इकलौती ऐसी संस्था है, जिसे ऐसी आजदी है। अन्य किसी भी आई.आई.एम.   के पास अभी यह हक नहीं है। अचरज नहीं कि फाइनेंशियल टाइम्स की तालिका में अच्छे  बिजनेस स्कूलों में आई.एस.बी. को 20वा दज्र दिया गया है।

राजग सरकार के जमाने में देश के परिवर्तनकामी शीर्ष बिजनेस स्कूलों को बार-बार सर पर ठोंगा मार अहसास कराया गया कि वे सरकार पर अपने बजट के लिए आश्रित हैं, लिहाज सरकार उन्हें जरूरी फैकल्टी हो न हो, आरक्षण की तहत नए-नए कोटे में अधिक छात्र भी लाएगी। सही फैकल्टी के चयन; बाजर में मौजूद तनख्वाह के ढाचे के अनुरूप अच्छे (भले ही कम उम्र) बाहर से लाए गए शिक्षकों को खींचने की उनकी क्षमता पर भी बहुत घातक असर पड़ा है।

सरकार आश्रित बड़े विश्वविद्यालयों के भवन जजर्र हैं, अधिकतर में जरूरी स्टाफ तथा संसाधनों की भीषण तंगी है। प्रांतों के ज्यादातर विश्वविद्यालय राजनेताओं के सहारे जमे मझोले स्तर के शिक्षकों की आरामगाह बन बैठे हैं। ऊपर से अल्पसंख्यकों, बहुसंख्यकों, पिछड़ों, अतिपिछड़ों, दलितों, जनजतियों के असंख्य कोटे निभाते हुए अधिकतर कॉलेजों की फैकल्टी में हर वर्ष सिर्फ तदर्थवादी आधार पर ही बेहद सामान्य अर्हता वाले शिक्षकों को लेकर पद भरे जा रहे हैं।

खबर है कि नई सरकार जल्द ही विश्व की कुछ ख्यातनामा युनिवर्सिटीज द्वारा भेजे गए भारत में अपनी शाखाए खोलने के प्रस्तावों पर गौर करने ज रही है। इस वक्त शिक्षा जगत की जरूरतों को देखते हुए इस मुद्दे को फिर से स्वदेशी बनाम विदेशी तकरार में लथेड़ना मूर्खता होगी। (वसे भी विगत में जिन महानुभावों ने यह नूराकुश्ती लड़ी, उनमें से अधिसंख्य ने खुद अपने जिगर के टुकड़ों को विदेशों में पढ़ने को भेज है, और कई ने खुद भी वहीं पढ़ाई की है)।

कोई भी देश सिर्फ अधिकाधिक पूजी निवेश या नए उपक्रम लगाने से तरक्की नहीं करता। इसके लिए सबसे बड़ी और बुनियादी जरूरत होती है अपने देश के मानवीय संसाधनों के मानसिक परिष्कार और उनमें कौशल के स्तरीय विकास की। आज जरूरत है कि नए मानव संसाधन मंत्री टेलीकॉम नियामक ‘ट्राय’ या शेयर मार्केट नियामक सेबी सरीखी किसी एक शीर्ष स्वायत्त संस्था के गठन पर विमर्श करें, जो उच्चशिक्षा का क्षेत्र देखे।

वह नई शिक्षण संस्थाओं के गठन और मौजूद विश्वविद्यालयों के कैंपस के विस्तार को स्वस्थ सामयिक रूप दें और दीर्घकालीन दृष्टि से भी इस क्षेत्र के लिए योजनाएं गढ़े। ऑक्सफोर्ड, एम.आई.टी., या (टैगोर कालीन) शांति निकेतन, जसे संस्थानों की सुख्याति और गुणवत्ता का रहस्य यही है कि वे नीति, कार्यक्रम और संचालन तीनों के निर्धारण और निवहन का काम पूरी स्वायत्तता और समयानुकूल लचीलेपन के साथ करते रहे। उन्होंने बड़े से बड़े संपर्क सूत्रों के बावजूद अयोग्यता को कठोरतापूर्वक अपने परिसर से बाहर रखा और देशभर से गुदड़ी के लालों को यत्नपूर्वक खोज और उनकी मेधा को धर्यपूर्वक तराशा, और उन्हें शोध और अध्यापन के लिए प्रोत्साहित किया।

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