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खबरों में पर्यावरण की जगह

विश्व पर्यावरण दिवस भी अब एक रस्म बन गया है, जिसे संभवत: विश्वभर में कुछ इस तरह मनाया जाता है कि अगले दिन सभी अखबारों में आधे से लेकर एक पन्ने में विभिन्न जगहों पर पर्यावरण दिवस मनाने की खबर होती हैं। कहीं रैलिया निकाली जाती हैं तो कहीं भाषण दिए जाते हैं और यदि इन सबका कवरेज अच्छा हो जाए तो माना जाएगा कि संस्थाओं और मीडिया ने पर्यावरण के प्रति अपने दायित्व का सही ढंग से निर्वाह कर दिया है।

इस बार मुझे पर्यावरण संरक्षण में पत्रकारिता की भूमिका पर टिहरी गढ़वाल में आयोजित गोष्ठी में शामिल होने का अवसर मिला। हेमवतीनंदन बहुगुणा राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के टिहरी परिसर में उत्तराखंड के एक मंत्री, नेता प्रतिपक्ष और अनेक बुद्धिजीवियों की इस गोष्ठी में वृक्ष मानव सकलानीजी को सम्मानित किया गया। 88 वर्षीय सकलानीजी बहुत देर तक वृक्ष की पीड़ा को गीत में व्यक्त करते रहे।

सामने बैठी कुछ महिलाओं के आखों में आसू साफ  देखे जा सकते थे। इसी समारोह में अकेले अपने दम पर पाच वन विकसित करने वाले पोखरियाल जी का भी अभिनंदन हुआ। लेकिन अगले दिन समाचार पत्रों की हेडलाइन में केवल नेता प्रतिपक्ष या युवा कल्याण राज्यमंत्री की पर्यावरण के प्रति चिंता ही व्यक्त हो पाई। हा, समाचार में कहीं सकलानीजी का भीड का जिक्र हुआ जरूर था।

ऋषिकेश पहुचते ही मैंने हिन्दी के समाचार पत्र ख़रीद लिए थे, ताकि कुछ ताजे उदाहरण मिल जाए, और वह मिले भी। एक अखबार की परिशिष्ट पत्रिका में पर्यावरण के क्षेत्र में दखल रखने वाली कुछ अग्रणी महिलाओं पर सामग्री देकर यह मान लिया गया था कि दायित्व पूरा हुआ।

एक अन्य अखबार ने बीच के दोनों पन्नों पर (संेटर स्प्रेड) ढेर सारी सामग्री दी थी, जिसमें उर्जा संरक्षण की आवश्यकता पर ख्याति प्राप्त पर्यावरणविद डॉ. आर. के. पचौरी का साक्षात्कार भी था। यह मीडिया के हस्तक्षेप का वाकई एक अच्छा उदाहरण है। पर क्या ष्ठ पत्रकारिता के मानदंडों में एक कमी यह नहीं कि विशेष दिवसों पर बाज़ार की माग समझते हुए हम विशेष सामग्री दे देते हैं।

ऐसा क्यों है कि हमारे समाचार पत्रों में अर्थ, वाणिज्य, विदेश जैसे दैनिक पृष्ठों की तरह ही विज्ञापन, प्रौद्योगिकी और पर्यावरण को जगह नहीं मिलती? क्या दुनिया के बदलते मौसम पर इसी महीने बान में हुई गोष्ठी और दिसम्बर में होने वाले कोपेनहेगेन सम्मेलन के विस्तृत समाचार हमारे समाचार पत्रों और टीवी समाचार चैनलों में दिखाए जाएगे? जब खेल के पन्नों में गावस्कर जैसे विशेषज्ञों के लेख छप सकते हैं तो पर्यावरण या विश्वान पर विशिष्ट लेख छापने के लिए केवल संपादकीय पन्ने में ही जगह क्यों निकालनी पड़ती है?

हिन्दी में जब भी भूमिका, दायित्व, आदि की बात होती है तो संदर्भ हमेशा पत्रकारिता का होता है। जिस तरह अंग्रेजी में प्रेस शब्द आज उतना प्रासंगिक नहीं रह गया है जितना मीडिया उसी प्रकार हिन्दी को भी एक नया शब्द चाहिए।

पिछले वर्ष जून के ब्रांड रिपोर्टर के आकड़ों पर भरोसा किया जाए तो देश में इस समय 477 टीवी चैनल हैं, जिनमें से समाचार के महज 67 चैनल हैं। ऐसे में पत्रकारिता शब्द पर विचार करना इसलिए भी आवश्यक है कि इस शब्द का आशय कहीं केवल समाचार पत्रों या बहुत हुआ तो समाचार चैनलों तक तो सीमित नहीं।

भारतीय संचार माध्यमों में रस्म निबाही के अलावा जैव विविधता, भूजल संसाधनों की कमी, बरखा के पानी का संरक्षण, उर्जा संसाधनों पर दबाव और गैर पारंपरिक उर्जा साधनों एवं उर्जा संरक्षण, ओज़ोन सतह, आदि विषयों पर जानकारी नहीं के बराबर होती है।

हिन्दी और अन्य भाषाओं में अगर डिस्कवरी, नेशनल जियोग्राफि़क, एनिमल प्लेनेट जैसे चैनल हम न भी चला पाए तो भी हम अपने 24 घंटे के  समाचार और मनोरंजन के चैनलों पर काफी सारी सामग्री तो दे ही सकते हैं। दरअसल आज जनसंचार माध्यमों का सबसे बड़ा संकट सुरुचिपूर्ण ढंग से जन चेतना संबंधी जानकारिया न दे पाने का है, जिसे हम पाठकों और दर्शकों की इन विषयों में दिलचस्पी न होने की बात कह कर टाल देते हैं।

लोकतंत्र हो या पर्यावरण केवल विज्ञापनों से काम चलने वाला नहीं है। लोगों को पप्पू न बनने की सीख देने वाले विज्ञापन वोट देने की आवश्यकता तो जतला सकते हैं, एक जागरूक लोकतंत्र बनाने में मदद नहीं कर सकते। उसी प्रकार कुछेक विज्ञापन, पर्यावरण की चंद बातें और संरक्षण की चिंता में जुटे कुछ नामों के उल्लेख से मीडिया अपना दायित्व पूरा नहीं कर पाएगा।

आवश्यकता है परंपरागत माध्यम से लेकर इंटरनेट तक लोगों में उनके भविष्य को निर्धारित करने वाली नीतियों और परिस्थितियों की विस्तार से चर्चा की संभावना बने। लोगों को केवल भौतिक भागीदारी के लिए ही नहीं वैचारिक भागीदारी के लिए भी प्रेरित किया जाए। इसका भी एक बड़ा बाजर है, अगर हम खोज पाए तो।

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