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मैकाले पब्लिक स्कूल

हिंदी साहित्य क्या है?/ हिंदी वाले के लिए वह एक ‘पब्लिक स्कूल’ है।/ अंग्रेजी वाले के लिए वह एक अलंकार है। अंग्रेजी वाला हिंदी में अलंकृत दिखने के लिए हिंदी में आने को तरसता है। हिंदी वाला ‘पब्लिक स्कूली’ दिखने के लिए अंग्रेजी की प्रैक्टिस करता है। अंग्रेजी वाले को मालूम है कि हिंदी में लोग ‘पढ़ते’ हैं। चरचा करते हैं। इसमें बड़ा रस रहता है। वह जानता है कि हिंदी वाले का अंग्रेजी में हाथ जरा तंग रहता है। वह हिंदी अंधभक्तहोता है।

अंग्रेजीवाला हिंदी वाले को अपनी शुद्ध हिंदी से चकित करता है और एक दिन वह हिंदी में ‘योगदान’ करने के लिए मचल उठता है। एकाध सत्संग एकाध गोष्ठी के बाद ‘गुंताड़ा’ बिठा लेता है कि हिंदी को अब उसकी ‘वाकई जरूरत’ आन पड़ी है। उसके पास अंग्रेजी का ज्ञान है/ यह दर्द उसका दिल ही जानता है कि अंग्रेजी में उसकी कोई पूछ नहीं, हिंदी वाले उसे अक्लमंद मानना चाहते हैं/ कोई अचानक कह उठता है: आप हिंदी में आइए न! इतने दिन से बाहर-बाहर क्या खड़े रहते हैं, हिंदी को आपकी जरूरत है। आजकल हिंदी वाले हिंदी कहां जानते हैं? सत्यानाश करके रख दिया है।

जिस दिन ऐसा मित्र संवाद होता है, वह हिंदी के किसी रचनाकार या समस्या का उद्धार करने को मचलना शुरू कर देता है। एक बार उसने कुछ बोल दिया या लिख दिया तो हिंदी वालों के बीच वह ‘अह अह भाव’ का विषय बन जाता है। इस तरह हिंदी अंग्रेजी के लिए ‘अलंकार’ है। अंग्रेजी का गुप्त Þांृगार है। अंग्रेजी वाला ‘हिंदी सज्ज’ होकर अंग्रेजी से हिंदी में आवाजाही करने लगता है। सुबह अंग्रेजी में टहलता है। शाम को हिंदी में डकार लेता है। धीरे-धीरे उसे अपनी ‘हिंदी बेल्ट’ याद आने लगती है। जो प्राय: भोजपुरी निकलती है। भोजपुरी नहीं तो कोई और पूरबी होती ही है।

इतिहास कहता है कि हिंदी साहित्य में इस तरह के अंग्रेजी वालों का अनन्य योगदान है। सबसे पहले हिंदी की खोज अंग्रेजी ने की। अंग्रेजों ने ही की और मैकाले जैसा बंदा दिया। यहां से हिंदी में पंगे वाली बात आ रही है। यह लेखक जो लिखेगा उसे कई हिंदी वाले अंग्रेजी की गुलाम जहनियत का दुष्फल बतावेंगे। अब जो बतावें सो बतावें। अपने मन की कहने से क्या डरना?

बिंदास का दुष्ट मन इस वक्त दूर की कौड़ी लाने का दुस्साहस करने जा रहा है। हिंदी में अंग्रेजी की अंग्रेजी वालों की उक्त आवाजाही और उदारता को देखकर उसे लगता है कि हिंदी को यह सब आदरणीय लॉर्ड मैकाले का अवदान है। इसके लिए हिंदी को मैकाले का धन्यवादी होना है। उसकी निंदा करना छोड़ उसके अवदान की चरचा करनी चाहिए। मानना चाहिए कि हिंदी को आधुनिक भाषा बनाने में उसका बड़ा योगदान है।

उफ! आज बिंदास के कंप्यूटर  से यह सच कौन सा आइडिया बिना उसके चाहे निकला चला आ रहा है कि आज इतिहास के इस आपत्तिजनक सच को कह ही डाले कि हिंदी भाषा के लिए मैकॉले ने जगह बनाई और हिंदी साहित्य की शुरुआत, अंग्रेजी कल्चर को फैलाने वाले, कट्टरता हिंदीवादियों के बीच नित्य निंदित,‘धूर्ताधिराज’ लार्ड मैकाले ने की! कैसे?

इसके लिए मैकाले के मिनट्स देखने की जरूरत होगी। देखेंगे तो जानेंगे कि मैकाले ने जो शिक्षानीति बनाई, उसमें स्थानीय वर्नाकूलर्स को तरजीह देने की बात कही! वे अरबी फारसी को सरकारी संरक्षण और वजीफा देने के खिलाफ थे। मानते थे कि वे जो सिखाती हैं, उनसे एक धार्मिक कर्मकांडी बंद दिमाग आदमी बनता है।

अगर यह नीति न होती तो हिंदी साहित्य का कोई नाम लेवा न होता। अंग्रेजी वालों ने हिंदी भाषा और साहित्य की खोज की। कई नाम ऐसे हैं, जो मैकाले की गली से आए और हिंदी में बस गए। उनकी महत्ता सब मानते हैं लेकिन कई मैकाले की नीति नहीं मानते। कितनी गंदी बात है! ‘गुलगुलों’ को ‘गुड’ कहते हैं और जो ‘गुड़’ है उसे बैड कहते हैं।

ग्रियर्सन, गिलक्राइस्ट से लेकर सलमान रश्दी और विक्रम सेठ तक और अपने हिंदी साहित्य में ‘विमल बी. ए. पास’ से लगाकर अपने रामविलास शर्मा तक सारे के सारे मैकाले के अवदान हैं। इन दिनों हिंदी में अपनी एम.ए. अंग्रेजी लेकर आने-जाने वाले लोग इसी परंपरा में आते हैं। और क्यों न आएं?

ये युग ‘अंतरानुशानकिता’यानी  इंटरडिसिप्लेरिटी  का युग है। अब कोई विद्या ‘अकेली’ नहीं है। कोई भाषा अकेली नहीं, अपने आप में कोई गुप्त सुरंग नहीं। सारे ज्ञानानुशासन और भाषाएं दुकेली-चौकेली हो रही हैं। यही हिंदी का ‘मैकाले पब्लिक स्कूल’ है।

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