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शिक्षा के लिए सेबी जैसी संस्था होनी चाहिए

शपथ लेते ही मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल को डीम्ड विश्वविद्यालयों की समस्या से उलझना पड़ गया। फिर ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हो रहे हमले भले ही विदेश मंत्रालय का मामला था लेकिन बहुत सारे जवाब ऐसे थे, जो शिक्षा मंत्रालय को देने थे। इसके बावजूद वे अपने दूसरे एजेंडे पर भी कायम हैं। उनका कहना है वे शिक्षा में विदेशी निवेश के लिए हर मुमकिन कोशिश करेंगे। इसके अलावा शिक्षा जसे महत्वपूर्ण क्षेत्र के लिए लिए एक विनियामक संगठन बनाने का मसला भी चर्चा में है। नए मंत्रालय की व्यस्त दिनचर्या में उलझे कपिल सिब्बल से रूबरू हुई शीरीन भान।

ऑस्ट्रेलिया में जो हो रहा है क्या वह भारतीय छात्रों की जरूरतों और भारत में मौजूद शिक्षा के अवसरों में भारी फर्क को नहीं दिखाता है? क्या अब शिक्षा क्षेत्र को खोलने का वक्त नहीं आ गया है?
मैं आपकी बात से सहमत हूं। मुङो लगता है कि अगर हम अपने बच्चों को विदेश में शिक्षा दिलाने में 20 अरब डॉलर खर्च रहे हैं, तो बेहतर यह होगा कि हम इस पैसे का अपने ही देश में निवेश करें। इससे हम अपनी पूरी शिक्षा व्यवस्था को बदल सकते हैं।

आप इसे कैसे करेंगे? क्या बजट सत्र में इसके लिए कोई विधेयक आएगा?
यह हमारी प्राथमिता है? उम्मीद है कि जल्द ही यह होगा और कई दूसरी चीजें भीं। हमने इसे अपने सौ दिन के एजेंडे में भी शामिल किया है और पांच साल के एजेंडे में भी। हम चाहते हैं कि पूरी शिक्षा व्यवस्था में भारी निवेश हो और बच्चे बिना इस बात की चिंता के वहां ज सकें कि इसके लिए पैसा कहां से आएगा। इसके लिए हम शिक्षा ण की व्यवस्था को भी पुख्ता बनाएंगे।

आप शिक्षा देने की व्यवस्था को कैसे कुशल और जवाबदेह बनाएंगे?
हम यही करने ज रहे हैं। पिछले पांच साल में हमने नौ लाख अध्यापकों की नियुक्ति की है और बहुत सारे स्कूल बनाए हैं। यह काम रातों-रात नहीं हो सकता। हमें दीर्घकालिक समाधान निकालना है। कई मुद्दे हैं। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा का मुद्दा है। उच्च शिक्षा का मुद्दा है। अध्यापकों के प्रशिक्षण का मुद्दा है। शोध का मुद्दा है, क्षमता के विकास का मुद्दा है। तमाम मोचरे पर सुधार की जरूरत है। इसके लिए एक राष्ट्रीय रोडमैप बनाना होगा।

क्या बजट में शिक्षा के लिए प्रावधान बढ़ाया जाएगा?
इसके बारे में अभी कुछ नहीं कह सकता। लेकिन मैं मानता हूं कि अगर हम पूरे पैसे का सही ढंग से इस्तेमाल ही कर लें तो आधी समस्या अपने आप हल हो जाएगी।

हम शिक्षा के निजीकरण की बात करते हैं। लेकिन उच्चतम न्यायालय कह चुका है कि शिक्षा मुनाफे के लिए नहीं हो सकती। क्या अब इसे नए नजरिये से देखे जाने की जरूरत है?
हां, शिक्षा को ऐसा व्यवसाय तो बनाना ही होगा जो टिकाऊ हो और अपने संसाधनों से चलता रहे। लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि वे शिक्षा से हुई कमाई को दूसरे व्यवसायों में लगा दें। हमारी सोच यह होनी चाहिए कि संस्थान पैसा बना सकते हैं लेकिन वह कमाई वापस शिक्षा में ही लगनी चाहिए।

क्या आप यह बदलाव लाने जा रहे हैं?
हम अभी यह आकलन कर रहे हैं। मैने अभी यहां काम संभाला है और यह उम्मीद मत कीजिए। मैं यह बताऊंगा कि अगले दस दिन में मैं क्या करने वाला हूं। लेकिन हम इन सभी मसलों पर विचार कर रहे हैं।

क्या आप टॉप-डाउन के विचार से सहमत हैं? जिसमें यह माना जता है कि उच्च शिक्षा को निजी क्षेत्र के हवाले छोड़ दिया जना चाहिए और सरकार को नीचे की शिक्षा पर ही ध्यान देना चाहिए?
मैं नहीं समझता कि सरकार के सिर्फ नीचे के लोगों पर ही ध्यान देने से काम चल जएगा। इस क्षेत्र में बड़े स्तर पर उदारीकरण की जरूरत है। क्या यह हो सकता है कि सारे देश में टीचर्स ट्रेनिंग की व्यवस्था सराकर ही करे? जवाब होगा, नहीं।

हमारे देश में सरकार का नियंत्रण कुछ ज्यादा ही है। क्या नियमन के स्तर पर कुछ बदलाव होगा?
नि:संदेह होगा। स्कूल स्तर से उच्च शिक्षा स्तर तक बदलाव किया जना जरूरी है। इसके लिए अभी मैंने अंतिम रूप से कुछ सोचा नहीं है, लेकिन हम शिक्षा क्षेत्र में सेबी जसी कोई संस्था बनाना चाहते हैं। यह संस्था ही नियामक का काम करेगी। फिर हमें मान्यता देने वाली एक स्वतंत्र संस्था की भी जरूरत है, जो शुरुआत में तदर्थ प्रमाण-पत्र दे और जब संस्था बन जए तो अंतिम प्रमाण-पत्र दे, ताकि काम शुरू हो सके। हम चाहते हैं कि यह काम खुद सरकार न करे। लेकिन इसके लिए आम सहमति बनानी होगी। अभी केंद्र और राज्य सरकार के अलावा कोई विश्वविद्यालय खोल ही नहीं सकता। इसके लिए डीम्ड युनिवर्सिटी जसी व्यवस्था बनी, जो होनी ही नहीं चाहिए।

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