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बॉक्स ऑफिस के पसीने छूटे सूनी रही टिकट खिड़की

बॉक्स ऑफिस के पसीने छूटे सूनी रही टिकट खिड़की

कौन कहता है कि फिल्म निर्माताओं-वितरकों और मल्टीप्लैक्स सिनेमाघरों के बीच चल रही लड़ाई से फिल्मों की आवक रुक गई? मई के महीने में आई फिल्मों की गिनती सुनेंगे तो मारे हैरानी के मुंह खुला रह जाएगा। जहां हर माह कोई 15-16 फिल्में ही आती हैं, वहीं मई में लगभग 23-24 फिल्में रिलीज हुईं। हां, यह बात अलग है कि इन फिल्मों में से इक्का-दुक्का ही ऐसी थी, जिसे देखने की हिम्मत दर्शकों ने दिखाई, वरना ज्यादातर फिल्मों के लिए तो बिल्ली के भाग से छींका फूटने जैसी हालत ही हुई। अगर यह हड़ताल न हुई होती तो इनमें से कई फिल्में शायद ही कभी बड़े पर्दे का मुंह देख पातीं।

बहरहाल, मई की शुरुआत हुई एक साथ तीन-तीन डब फिल्मों से, जिनमें से दक्षिण से आई ‘जान’ और ‘त्रिदेव-प्यार की जंग’ को किसी ने कहीं भी कोई भाव नहीं दिया। अलबत्ता जैकी चैन की ‘न्यू पुलिस स्टोरी-5’ ने जरूर थोड़ी रंगत पैदा की। छोटे कस्बों-शहरों में फिल्म ने ठीक-ठाक कमाई की। पहले हफ्ते में प्रति सिनेमाघर 62 हजार की औसत कलैक्शन इस किस्म की फिल्म के लिए ठीक ही मानी जाती है। दूसरे सप्ताह में 36 हजार की औसत कलैक्शन भी बुरी नहीं कही जा सकती।

मई के दूसरे शुक्रवार ने छह फिल्में बाजार में उतारीं, जिनमें पांच डब थीं। इनमें से ‘एक और कयामत’, ‘वीर जांबाज की एक कथा’, ‘खूंखार जानवर’, ‘वल्र्डस खिलाड़ी नं 1’ वगैरह ऐसी नहीं रहीं कि इनका कहीं कोई जिक्र करे। इधर-उधर कहीं इन फिल्मों ने चार पैसे बटोर लिए। डैनी डेंजोंगप्पा अभिनीत ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म ‘फ्रोजन’ कुछ एक जगह रिलीज हुई। उम्दा होने के बावजूद यह उस तरह की फिल्म नहीं थी कि कोई आम दर्शक इसे देख कर एन्जॉय करता। फिर भी मुंबई के सात थिएटरों में इस फिल्म ने पहले सप्ताह में लगभग पौने चार लाख की कलैक्शन कर ही ली। ‘करो या मरो-2’ ने मुंबई में पहले हफ्ते में 44 हजार प्रति प्रिंट औसत बटोरे।

तीसरे हफ्ते में छह फिल्में आईं। इनमें से चार डब थीं और इन चारों-‘और एक टक्कर’, ‘आखिरी मंजिल’, ‘माई बॉस बजरंगबली’ व ‘शेरों का शेर’ का कहीं नाम भी सुनने में आ गया हो तो बहुत बड़ी बात है। बाकी बची दो में से तारा शर्मा वाली ‘सुनो ना-एक नन्हीं आवाज’ बेहद बचकानी किस्म की फिल्म निकली, जिसने पहले सप्ताह में महज साढ़े आठ हजार रुपए की औसत कलैक्शन हर सिनेमा से की। कुणाल खेमू व सोहा अली खान वाली ‘99’ ने जरूर सूखे में बौछार का काम किया और पहले सप्ताह में 1 लाख 42 हजार व दूसरे में 1 लाख 25 हजार की औसत कलैक्शन हर थिएटर से कर ली। खाली पड़े बाजार का फायदा इसे मिलना ही था।

चौथे हफ्ते में ‘डिटेक्टिव नानी’ आई, जिसने बच्चों की छुट्टियों को भुनाना चाहा, मगर फिल्म को वाहवाही नहीं मिली। फिर भी पहले सप्ताह में इस फिल्म ने औसतन 42 हजार रुपए जमा कर ही लिए। निर्देशक लॉरेंस डिसूजा की सैफ अली खान-पूजा भट्ट वाली ‘सनम तेरी कसम’ न जाने किस खोह से निकल कर आई और पता नहीं कहां खो गई। बाकी फिल्में-‘विघ्नहर्ता श्रीसिद्धिविनायक’, ‘ओशन ऑफ एन ओल्डमैन’, ‘मैडोना-चालबाज हसीना’, ‘माई टॉर्गेट आई़ए़एस़’, ‘द बॉस’, ‘गिरफ्तार’ आदि का कोई नामलेवा नहीं मिला।

आखिरी सप्ताह में ‘यह पल हो न हो कल’ जैसी फिल्म रिलीज हुई, जिसे आम दिनों में शायद ही कोई पूछता। इसके साथ सोनी की ‘एंजेल्स एंड डेमंस’ भी आई, जो कहीं-कहीं कुछ-कुछ सराही गई। कुल मिला कर मई में भी फिल्मों की हड़ताल ने अपना असर जमकर छोड़ा और बॉक्स-ऑफिस पर माहौल ठंडा-ठंडा कूल-कूल ही रहा।

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