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एजुकेशन लोन पूरे होंगे पढ़ाई के सपने

रिजल्ट निकल चुके हैं और कड़कती धूप में एडमिशन के लिए मारा-मारी शुरू हो चुकी है। घर-दफ्तर, दोस्तों की महफिल या पार्टी वगैरह में लोग बात करते नजर आ रहे हैं कि फलां कॉलेज में इतनी कट ऑफ जाने की उम्मीद है तो फलां कोर्स की कितनी मार्केट वल्यू है। कुछ लोग अच्छे कोर्स या कॉलेज का जिक्र छिड़ते ही महंगाई या तंग जेब की दुहाई देने लगते हैं। लेकिन आपको निराश होने की जरूरत नहीं, पैसे संबंधी दिक्कत का समाधान करने के लिए बैंक मौजूद हैं। बैंक के मार्फत एजुकेशन लोन की मदद से आप अपने और बच्चों की उच्चशिक्षा के सपने को साकार कर सकते हैं। इस बारे में जानकारी दे रहे हैं राकेश तनेजा।

कौन ले सकता है एजुकेशन लोन
कोई भी व्यक्ित अपने, पत्नी या बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए बैंक से कुछ निर्धारित नियम एवं शर्तो पर एजुकेशन लोन ले सकता है। बैंक एजुकेशन लोन देने से पहले उसकी रिपेमेंट सुनिश्चित करता है। लोन केवल उसी को दिया जता है जिसके पास उसे वापस करने की क्षमता हो। रिपेमेंट चाहे तो लोन लेने वाले के अभिभावक करें या फिर लोन लेनेवाला पढ़ाई पूरी करने के बाद करे। ऐसे मामले में गारंटर की जरूरत पड़ती है। गारंटर लोन लेने वाले के अभिभावक और रिश्तेदार हो सकते हैं।

एजुकेशन लोन का दायरा
बैंक किसी भी कोर्स के लिए होने वाले खर्चो की पूर्ति करने के लिए वित्तीय मदद मुहैया कराते हैं। एजुकेशन लोन के दायरे में देश और विदेश में पढ़ाए जने वाले कोर्स शामिल हैं।आप चाहें तो किसी के लिए भी बैंक से लोन ले सकते हैं।

भारत में
+2 स्टेज की स्कूली शिक्षा, ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन के साथ पीएच.डी, इंजीनिय¨रग, मेडिकल, एग्रीकल्चर, वेटेरनरी, लॉ, डेंटल, मैनेजमेंट, कंप्यूटर, यूनिवर्सिटी या डीओई से मान्यता प्राप्त प्रतिष्ठित संस्थानों के कंप्यूटर कोर्स, आईसीडब्ल्यूए, सीए जसे कोर्स।

विदेश में
प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी के जॉब ओरिएंटिड प्रोफेशनल/टेक्िनकल कोर्स वाली ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन-एमसीए, एमबीए, एमएस इत्यादि।

किसके लिए मिल सकता है लोन
- स्कूल, कॉलेज और हॉस्टल की फीस
- परीक्षा, लाइब्रेरी और लेबोरेट्री की फीस
- किताबें, इक्िवपमेंट, इंस्ट्रूमेंट्स, यूनिफार्म खरीदने के लिए
- कॉशन डिपॉजिट, बिल्डिंग फंड, रिफंडेबल डिपॉजिट (इसके साथ इंस्टीट्यूट का बिल, रसीद हो)
- विदेश में पढ़ाई के लिए यात्रा खर्च, रास्ते का खर्च
- स्टडी टूर, प्रोजेक्ट वर्क, थीसिस इत्यादि।

आपकी जरूरत कितनी है
एजुकेशन लोन लेने से पहले यह अंदाज लगा लें कि आपकी जरूरत कितनी है। अलग-अलग मद में कितना खर्च होगा, पढ़ने के लिए कहां जना है, कितना समय रहना है, इस पर विचार करने के बाद ही अपना बजट तैयार करें। कितना बोझ आप खुद उठा सकते हैं।

लोन लेने से पहले ध्यान रखें
मंदी का दौर है किसी चीज की गारंटी नहीं। कंपनियां एक-एक कर बंद हो रही हैं। छंटनी का दौर है, छंटनी न सही वेतन में कटौती की संभावना हर तरफ मौजूद है। महंगाई ने विशाल रुख अपनाया हुआ है। वेतन फ्रीज हो चुके हैं। ऐसे में जन लें कि आप जो लोन लेने ज रहे हैं उसकी रिपेमेंट भी वक्त पर हो जए। इसलिए लोन उतना लिया जए जितना आप उठा सकें। नौकरी लगने के बाद रिपेमेंट के ऑप्शन पर विचार करने से पहले सभी विकल्पों और अच्छी-बुरी सभी प्रकार की संभावनाओं पर पूरी तरह विचार कर लिया जना चाहिए। बेशक बाजर की मांग और आपूर्ति का इस सेक्टर पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता लेकिन फ्लोटिंग रेट का असर जरूर पड़ता है। विशेषकर लंबी अवधि के लोन फ्लो¨टग रेट से प्रभावित होते हैं।

लोन चुकाने के ऑप्शन
अन्य लोन की ही तरह एजुकेशन लोन पर भी बैंक ब्याज वसूलता है लेकिन यह वसूली करने के लिए उसके पास मुख्य रूप से तीन विकल्प हैं। इनमें एक आकर्षक जरिया है मोरेटोरियम पीरियड जिसे रिपेमेंट हॉलीडे भी कहा जता है। इसमें विकल्प होता है कि लोन लेने वाला लोन की रिपेमेंट जिस कोर्स में एडमिशन लिया गया है उसकी समाप्ति के बाद कर सकता है।

- रिपेमेंट मोरेटोरियम : कई बैंक कोर्स की समाप्ति के एक वर्ष बाद या नौकरी लगने के 6 महीने बाद रिपेमेंट शुरू करने का विकल्प भी देते हैं।
- कोर्स के दौरान सिर्फ ब्याज का भुगतान : कोर्स पूरा होने के बाद वास्तविक ईएमआई (मूल और ब्याज) का पेमेंट करना होगा।
- लोन मिलने के तुरंत बाद ईएमआई का भुगतान कर सकते हैं, इस मामले में कई बैंक ब्याज रेट पर डिस्काउंट भी दे सकते हैं।

रिपेमेंट की शर्त हर बैंक के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है। जरूरत है कि लोन लेने से पहले आप ज्यादा से ज्यादा बैंकों से इस बारे में पड़ताल कर लें।

एजुकेशन लोन पर कितना ब्याज
आमतौर पर एजुकेशन लोन पर ब्याज की दर पर्सनल लोन के रेट से कम होती है, लेकिन होम लोन से थोड़ी ज्यादा होती है। कुछ बैंक फिक्स रेट चार्ज करते हैं तो कुछ फ्लो¨टग रेट। इन दोनों में करीब एक प्रतिशत का अंतर होता है। एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि एजुकेशन लोन की अवधि 5 से 7 वर्ष की होती है, इसलिए रिपेमेंट के लिए फिक्स रेट का सलैक्शन किया जए।

कई बैंक पूरी तरह से फिक्स रेट का ऑप्शन नहीं देते। ऐसे में जरूरत है वास्तविक फिक्स रेट की जनकारी लेने की यानी उसमें किसी प्रकार का रिसेट क्लॉज नहीं होना चाहिए। फिक्स और फ्लोटिंग का फैसला लोन लेने वाले की जोखिम उठाने की क्षमता पर भी निर्भर करता है। कई बैंक लड़कियों के लिए ब्याज की दर में डिस्काउंट का ऑप्शन भी देते हैं। इसके लिए दो-चार बैंकों के दरवाजे पहले ही खटखटा लिए जएं।

लोन पर कितनी प्रोसेसिंग फीस
कई बैंक एजुकेशन लोन के लिए प्रोसेसिंग फीस चार्ज नहीं करते। जिस बैंक से आप लोन ले रहे हैं और वह आपसे प्रोसेसिंग फीस की मांग कर रहा है तो आप नेगोशिएट कर सकते हैं। आमतौर पर सभी बैंक उस स्थिति में प्रीपेमेंट फीस चार्ज नहीं करते जब लोन लेने वाला अपने बूते लोन की प्रीपेमेंट करता है। लेकिन लोन की बकाया राशि किसी और बैंक में ट्रांसफर करने की हालत में प्रीपेमेंट फीस वसूल की जती है।


ओबामा और ऑस्ट्रेलिया फैक्टर को न भूलें
आर्थिक मंदी का जमाना है। बेहतर भविष्य का सपना देखना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन इस तरह के सपनों की जमीनी हकीकत को भी अच्छी तरह से जंच-परख लेना चाहिए। आर्थिक संकट में नौकरी मिलने या बची रहने की किसी तरह की कोई गारंटी नहीं है। वित्तीय सुनामी कब किस कंपनी या नौकरी को लील ले, इसका कोई भरोसा नहीं। साथ ही वित्तीय संकट से उपजे कुछ ग्लोबल फैक्टर हैं जिन पर विचार करना जरूरी है।

ओबामा फैक्टर : वक्त बदल चुका है। आउटसोर्सिग की बदौलत दिनरात चढ़ने वाली अमेरिकी कंपनियों की हवा निकल चुकी है। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने आउटसोर्सिग करने वाली कंपनियों को हतोत्साहित करने के लिए उन पर टैक्स का शिकंज बढ़ा दिया है। ऐसे रोजगारों को लक्षित कर की जने वाली पढ़ाई पर पैसे लोन पर उठाने से पहले अच्छी तरह से विचार कर लेना ही बेहतर रहेगा।

आस्ट्रेलिया फैक्टर : अभी महीने भर से आस्ट्रेलिया से भारतीय छात्रों पर हमले की खबरें आने लगी हैं। इस तरह के समाचार अमेरिका और ब्रिटेन से भी पहले आते रहे हैं। आर्थिक संकट की वजह से नौकरियां छिन जने के डर से और रोजगार न मिलने की हताशा में ऐसे कायराना हमले हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में विदेश में पढ़ाई के लिए लोन लेने वाले जहां सतर्क हुए हैं वहीं बैंकों का भी लोन की रिपेमेंट को लेकर सशंकित होना लाजिमी है।

सावधान!  बढ़ रहे हैं डिफॉल्टर
आंकड़े बताते हैं कि जितनी तेजी से एजुकेशन लोन लेने वाले बढ़े हैं उतने ही डिफाल्टरों की संख्या में भी इजफा हो रहा है। सरकारी आकंड़ों के मुताबिक वर्ष 2004 में भारतीय बैंकों ने जहां एजुकेशन लोन के मद में 4550 करोड़ रुपये आवंटित किए थे, वहीं 2006 में यह आंकड़ा बढ़कर 9962 करोड़ हो गया तो 2007 में बैंकों ने इस मद में 51 फीसदी की वृद्धि दर्ज करते हुए इसे 15,000 करोड़ तक पहुंचा दिया और वर्ष 2008 के आंकड़ों के मुताबिक एजुकेशन लोन की राशि 19817 करोड़ तक ज पहुंची है। एजुकेशन लोन लेने वाले छात्रों की संख्या 12 लाख तक ज पहुंची है।

दबाव में हैं बैंक
आर्थिक तंगी का दौर है। जहां इस सेक्टर के तेजी से बढ़ने के पीछे ज्यादा से ज्यादा एजुकेशन लोन देने का राजनीतिक दबाव काम कर रहा है, वहीं इस सेक्टर में डिफाल्टर बढ़ने के पीछे यही दबाव काम कर रहा है। राजनीतिक कारणों से बैंक भी वसूली करने के सख्त उपाय करने से परहेज कर रहे हैं।

क्रेडिट प्रोफाइल में निगेटिव हिस्ट्री
लेकिन लोन लेने वाले और उनके अभिभावक यह जन लें कि युवा जीवन की शुरुआत में ही लोन चुकाने में डिफाल्ट कर अपनी निगेटिव हिस्ट्री तैयार कर रहे हैं। दरअसल हर बैंक लोन के लिए आने वाले हर व्यक्ित का एक क्रेडिट प्रोफाइल तैयार करता है। यह लोन प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा होता है।

आय, शिक्षा, निवास, आयु, रोजगार, रोजगार की प्रकृति और अन्य मानदंडों पर लोन के आवेदक का प्रोफाइल बनाता है। ग्लोबल बैंकिंग और टैक्नोलॉजी के बूते बटन दबाते ही किसी भी कस्टमर की क्रेडिट हिस्ट्री कोई भी बैंक कभी भी देख सकता है। डिफाल्टर होने की स्थिति में किसी भी तरह का लोन मिलने में कठिनाई हो सकती है। यहीं नहीं, क्रेडिट कार्ड तक बनवाने में रोड़ा लग सकता है।

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