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गुमनाम शहादत और सरकारी उदासीनता

शकील का घुटना अब मुड़ नहीं सकेगा। वह वैसे भी बीते नौ महीनों से अस्पताल के बिस्तर पर है। तीन छोटे-छोटे बच्चों का परिवार! सामने खड़ी लंबी सी जिंदगी। वह एक प्राईवेट कंपनी में ड्राइवर था। घुटना मुड़ नहीं सकता, जाहिर है कि उसे फिर से नौकरी मिलने की गुंजाइश नहीं है।

बीते साल 13 सितंबर को दिल्ली में हुए सीरियल धमाकों की यादें शायद लोगों के दिमाग में धुंधली पड़ गई होंगी, लेकिन शकील के परिवार के लिए ये धमाके हर दिन-हर पल कोहराम मचाते हैं। नवंबर में हुए मुंबई के आतंवादी हमलों में घायल और मारे गए कई सौ लोगों के परिवारजन मुआवजा पाने के लिए दफ्तर-दर-दफ्तर भटक रहे हैं।

एक जगह से मृत्यु का प्रमाण पत्र मिलना है तो दूसरी जगह से वारिस का, तीसरी जगह से एफआईआर की कॉपी तो चौथी जगह से मुआवजे का परवाना। पांच सितारा होटलों में काम करने वाले कई पीड़ित तो किसी प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से नौकरी में थे, सो उनके नियोक्ता का ही अता-पता नहीं है। राष्ट्रवाद धीरे-धीरे हवा हो रहा है और अपनों को खोए लोगों के सामने समाज-समय की हकीकत सामने आ रही है।

आतंकवाद अब अंतरराष्ट्रीय त्रासदी है। दुनिया का कोई भी हिस्सा इससे अछूता नहीं है। लेकिन इसके लिए तैयारी के नाम पर हम कागजों से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं। ट्रॉमा सेंटर अभी दिल्ली में भी भली-भांति काम नहीं कर रहे हैं, तो अन्य राज्यों की राजधानी की परवाह कौन करे। क्या यह जरूरी नहीं है कि संवेदनशील इलाकों में सचल अस्पताल, बड़े अस्पतालों में सदैव मुस्तैद विशेषज्ञ हों।

आम सर्जन बीमारियों के लिए ऑपरेशन करने में तो योग्य होते हैं, लेकिन गोली या बम के र्छे निकालने में उनके हाथ कांपते हैं। बारूद के धुंए या धमाकों की दहशत से बेहोश हो गए लोगों को ठीक करना, डरे-सहमे बच्चों या अपने परिवार के किसी करीबी को खो देने के आतंक से घबराए लोगों को सामान्य बनाना जैसे मामलों के लिए जिस तरह के विशेषज्ञों की जरूरत होती है, उसकी चिंता तो खर किसी को है ही नहीं।

आतंकवादी घटनाओं के शिकार हुए लोगों को आर्थिक मदद और उनके जीवनयापन की स्थायी व्यवस्था या पुनर्वास का काम अभी किसी की चिंता का विषय नहीं। घटना के बाद तत्काल कई कतिपय संस्थाएं अभियान चलाती हैं, कुछ लोग भाव-विभोर हो कर दान देते हैं। पर दिल्ली या मुंबई में हुए धमाके देश पर हमला मान लिए जाते हैं तो उन पर ज्यादा आंसू, ज्यादा बयान और ज्यादा मदद की गुहार होती है।

उत्तर-पूर्वी राज्यों या बस्तर या झरखंड की घटनाएं अखबारों की सुर्खियां ही नहीं बन पाती हैं। ऐसे में वहां के पीड़ितों को आर्थिक मदद की संभावनाएं भी बेहद क्षीण होती हैं। सशस्त्र बलों या अन्य सरकारी कर्मचारियों को सरकारी कायदे-कानून के मुताबिक कुछ मिल जाता है, लेकिन आम लोग इलाज के लिए भी अपने बर्तन-जमीन बेचते दिखते हैं।

वैसे तो केंद्र में प्रधानमंत्री और राज्यों में मुख्यमंत्री राहत कोष हैं, जिनसे ऐसी ही आकस्मिक घटनाओं के शिकार लोगों की मदद हो सकती है, लेकिन लोगों का ऐसी राहत तक पहुंच पाना आसान नहीं होता। क्या अब यह जरूरी नहीं कि आतंकवादी घटनाओं के शिकार लोगों के मुआवजे, राहत, इलाज, रोजगार के लिए ‘सिंगल विंडो’ की तर्ज पर एक महकमा हो।

यहां दावे, मृत्यु प्रमाण-पत्र, सक्सेशन सर्टिफिकेट सभी काम एकसाथ हों। दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं होने पर जिस तरह पुलिस, सुरक्षा एजेंसिंया, एंबुलेंस आदि त्वरित काम पर लग जाते हैं, उसी तरह इस महकमे के लोग भी चिकित्सा व अन्य तात्कालिक मदद का आकलन व उसे मुहैया करवाने, मृत लोगों के पोस्टमार्टम, लाशों को ससम्मान संबंधित लोगों के घर तक पहुंचाने, तत्काल दवा या अन्य चिकित्सीय जरूरतों का पता लगाने, गुम हो गए लोगों की सूचना, कौन किस अस्पताल में है इसकी खबर जैसे काम इस विभाग द्वारा किए जाएं। वरना होता यह है कि किसी हादसे की हालत में अस्पतालों और सड़कों पर बदहवास सी बड़ी भीड़ उन लोगों की होती है जो किसी अपने की तलाश कर रहे होते हैं।

फिर ऐसे महकमे के लिए दान के दरवाजे सालभर खुले हों। दानदाताओं को धन्यवाद के लिए विज्ञापनों का सहारा ले कर लोगों को इस शुभ काम के लिए प्रोत्साहित भी किया ज सकता है। इससे एक तो धन राशि या राहत, जरूरतमंद तक पहुंचाने का केवल एक ही माध्यम तय होगा, जिससे लोगों को भटकना नहीं पड़ेगा। साथ ही यह संस्था आतंकवाद से पीड़ित के आÞिातों को स्थायी रोजगार दिलवाने का काम भी कर सकती है। हो सकता है कि कुछ कंपनियां या विभाग ऐसे लोगों को रोजगार के लिए कुछ आरक्षित सीटें रख दें

आतंकवाद की अराजक स्थिति में टीवी के चैनल बदल-बदल कर आंसू बहाने वालों के असली राष्ट्रप्रेम की परीक्षा यह विभाग हो सकता है। ऐसी संस्था की नि:शुल्क सेवा या संकट के समय कुछ समय देने वालों को एकत्र किया जा सकता है, यह नए महकमे के खचरें को कम करने में सहायक कदम होगा। सबसे बड़ी बात है, सरकारी सेवा करने वाले सभी लोगों को फौज व राहत अभियान का प्राथमिक प्रशिक्षण देना। लोगों को प्राथमिक उपचार, सामान्य लिखा-पढ़ी के काम भी दिए जा सकते हैं।

यदि सरकारें इस विषय में सोचती हैं तो इससे आम आदमी की देश व समाज के प्रति संवेदनशीलता तो बढ़ेगी ही, आतंकवाद के नाम पर राजनीति करने वालों की दुकानें भी बंद हो जाएंगी। जरूरी नहीं है कि वर्दी पहन कर आतंकवाद से मुकाबला करने वाला ही शहीद है, बस का इंतजार कर रहा एक आम नागरिक, इलाके का सफाईकर्मी या होटल ताज में मारे गए लोगों की मौत भी शहादत ही है।

मानवता के दुश्मनों के हाथों मारा गया प्रत्येक निदरेष उसी सम्मान, राहत और सहानुभूति का हकदार है, जितना की वर्दीधारी। ऐसी घटनाओं के शिकार प्रत्येक आम और खास को एक ही महकमे से, एक जैसा सत्कार व सहयोग मिलेगा तो लोगों को आतंकवाद के विरोध में एकजुट करना बेहद सरल होगा। आतंकवाद के विरोध में आम लोगों की एकजुटता के लिए यह भावना जरूरी है और इसके लिए एक संवेदनशील विभाग की तत्काल जरूरत है।

आज जरूरत इस बात की भी है कि देशभर के इंजीनियरों, डॉक्टरों, प्रशासनिक अधिकारियों, प्रबंधन गुरुओं और जनप्रतिनिधियों को ऐसी विषम परिस्थितियों से निबटने की हर साल बाकायदा ट्रेनिंग दी जाए। साथ ही होमगार्ड, एनसीसी, एनएसएस व स्वयंसेवी संस्थाओं को ऐसे हालात में विशेषाधिकार दे कर दूरगामी योजनाओं पर काम करने के लिए सक्षम बनाया जाए।

pankaj_chaturvedi@ hotmail. com

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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