class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

महामारी की वापसी

इंफ्लूएंज या फ्लू के अलग-अलग वाइरस अक्सर सारी दुनिया को चपेट में लेते रहे हैं, और इस बार 41 साल बाद कोई फ्लू वाइरस महामारी के रूप में फैला है। लेकिन यहां यह कहने की भी जरूरत है कि महामारी के नाम से आतंकित होने की जरूरत नहीं है।

डब्ल्यूएचओ ने इसे ‘पेंडेमिक’ घोषित किया है। यानी इसका अर्थ यह नहीं है कि दुनिया भर में लाखों लोग इसकी चपेट में आ गए हैं और हजरों मर रहे हैं, इसका तकनीकी अर्थ यह है कि यह रोग एक से ज्यादा महाद्वीपों में कुछ हद तक फैल चुका है। यह रोग बहुत प्राणघातक भी नहीं है और इसका इलाज भी संभव है।

वैसे भी भारत को सबसे कम प्रभावित देशों में रखा गया है। इस वक्त खास तौर पर उत्तरी भारत का गर्म मौसम वाइरस के फैलने के लिए अनुकूल नहीं है और सरकार ने भी एहतियाती इंतजम किए हैं। पिछली शताब्दी या उसके पहले कई फ्लू ‘एपिडेमिक’ दर्ज किए गए हैं जिनमें बड़े पैमाने पर लोग बीमार होते थे और काफी तादाद में मौतें भी होती थीं।

अब चिकित्सा विज्ञान के पास भी ज्यादा जानकारी और साधन हैं और संचार और संपर्क में तरक्की की वजह से भी  ऐसे रोगों पर काबू पाना संभव है। वाइरस इस सृष्टि की सबसे निचली पायदान की निवासी है, जिसके बारे में यह भी विवाद है कि वह जीवित प्राणी है भी या नहीं। मनुष्य संभवत: इस सृष्टि का सबसे ज्यादा विकसित जीव है और वाइरस अचानक उसके शरीर के अंदर और बाहर के सुरक्षा तंत्र को तहस नहस कर आक्रमण कर देता है।

कई वाइरस और उनसे होने वाली बीमारियां तो नियंत्रण में आ गई हैं लेकिन ज्यादातर वाइरस अभी भी लगभग निरंकुश हैं। वाइरस का एक बार आक्रमण हो जने के बाद अक्सर शरीर उसके प्रति प्रतिरोध क्षमता विकसित कर लेता है लेकिन वाइरस में रूप बदलने की भी अद्भुत क्षमता होती है, इसीलिए इंफ्लूएंज के वाइरस के नए-नए रूप कुछ सालों बाद विश्व विजय पर निकल पड़ते हैं।

स्वाइन फ्लू के वाइरस को एच1एन1 कहा गया है और यह मेक्िसको में शुरू हुआ है। मुद्दे की बात यह है कि हमें वाइरस के साथ जीना सीखना होता है और इसका बचाव सफाई और अच्छे पोषण, जनकारी और सूचना के आदान-प्रदान और सजगता में है, आतंक और घबराहट में नहीं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:महामारी की वापसी