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फिर बजा आरक्षण का झुनझुना

यूं तो कांग्रेस की यूपीए सरकार ने कई इतिहास रचे, चाहे वो महिला राष्ट्रपति हों या सिख प्रधानमंत्री या फिर हाल ही में निर्वाचित लोकसभा की पहली महिला स्पीकर। इस बार जब सत्ता कांग्रेस के हाथ में काफी मजबूती के साथ आई तो कई भावी योजनाओं के साथ ही महिला आरक्षण का जिन्न भी अपनी राजनीतिक बोतल से बाहर आ गया।

ऐसा पहली बार हुआ है कि लोकसभा में महिला सदस्यों की संख्या 10 फीसदी का आंकड़ा पार कर गई है। बदलते हुए राजनीतिक परिदृश्य में संसद तथा राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण संबंधी बिल पारित होने की उम्मीद बढ़ी है। लोकसभा की मौजूदा हालत पर गौर फरमाएं तो 545 सदस्यों वाली लोकसभा में संविधान संशोधन बिल पारित कराने के लिए दो-तिहाई सदस्यों (364) का समर्थन जरूरी है। 15वीं लोकसभा में कांग्रेस के खाते में 206 सांसद आते हैं।

भाजपा 116, माकपा 16, द्रमुक 18, एनसीपी 9, फारवर्ड ब्लॉक 3, तृणमूल कांग्रेस 19, भाकपा 4, नेशनल कांफ्रेंस 3, तथा आरएसपी 2 सदस्यों के साथ आरक्षण विधेयक पर अपना समर्थन पेश कर रहे हैं जो सदस्यीय आंकड़ा 386 के पार पहुंचता है। राज्यसभा में 245 में से 16 सीटें रिक्त होने के बावजूद भी समर्थित सदस्यों का आंकड़ा 156 पर पहुंचता है। पर राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद सपा व राजद के अलावा शिवसेना व जद (यू) ने भी इसके मौजूदा स्वरूप पर आपत्ति जताई है। क्या इस बार भी महिला आरक्षण का झुनझुना सिर्फ बजकर शांत हो जएगा।
अनूप आकाश वर्मा, जमिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली

दोनों हाथ में लड्डू क्यों चाहते हैं?

समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने दो जगह से संसदीय चुनाव लड़ा और वह दोनों जगहों से चुनाव जीत गए। भाजपा के लालजी टंडन अभी लोकसभा चुनाव जीते हैं। क्या यह नहीं हो सकता कि दो जगहों से चुनाव लड़ने की परंपरा खत्म की जय। इसी तरह और भी लोग हैं, जो कई बार लोकसभा, विधानसभा के सदस्य बने हैं। इस लोभ लिप्सा से मुक्त होना संभव तो नहीं है, लेकिन जनता जगरूक है। जगरूकता का नमूना बरेली की जनता ने दिया, जहां सात बार चुनाव जीत चुके संतोष पराजित हो गए। जनता परिवर्तन की कुंजी का  क्यों न बेहतर इस्तेमाल करे।
दिलीप कुमार गुप्ता, बरेली

 

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