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राम भरोसे चल रहे हैं इंजीनियरिंग कॉलेज

इंजीनियरिंग के क्षेत्र में देश और दुनिया में जहां हाई-प्रोफाइल टेक्नोलॉजी और तरह-तरह के ज्ञान का समावेश हो रहा है वहीं बिहार के इंजीनियरिंग कालेजों में जुगाड़ टेक्नोलॉजी से काम चलाते हुए कालिदास की फौज तैयार की जा रही है। फिलहाल स्थिति यह है कि प्राय: सभी इंजीनियरिंग कालेजों में शिक्षकों एवं गैर शिक्षकों की  80 से 90 प्रतिशत सीटें खाली हैं।


फैकेल्टी के अभाव में  इन कालेजों में पढ़ाई की केवल औपचारिकताएं पूरी हो रही है। भागलपुर कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में शिक्षकों के 75 पद स्वीकृत हैं जबकि उसके विरुद्ध कार्यरत हैं मात्र 19 जबकि  एमआईटी मुजफ्फरपुर में शिक्षक के 111 स्वीकृत पदो पर मात्र 36 से काम चलाया जा रहा है। पुरातन काल से शिक्षा का केन्द्र रहा नालंदा भले ही मौजूदा हुकूमत के भी फोकस में हो किंतु नालंदा के इंजीनियरिंग कालेज में स्वीकृत 64 शिक्षकों में से मात्र 10 ही कार्यरत हैं। उनमें भी तीन डिप्लोमा स्तर के शिक्षकों से  प्रतिनियुक्ति के आधार पर काम लिया जा रहा है।

मोतिहारी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में स्वीकृत 16 में चार स्थायी शिक्षक कार्य कर रहे हैं और तीन डिप्लोमा स्तर के शिक्षकों को प्रतिनियुक्ति पर रखा गया है। गया में 16 के विरुद्ध पांच स्थायी और तीन प्रतिनियुक्त डिप्लोमा और दरभंगा में 16 के विरुद्ध आठ में पांच रेगुलर और तीन डिप्लोमा शिक्षक प्रतिनियुक्ति  पर हैं। राज्य के पॉलिटेकनिक संस्थानों का और भी बुरा हाल है। यहां तो शिक्षकों का अकाल पहले से ही था और  जो बचे-खुचे रह गए थे वे भी प्रतिनियुक्ति पर इंजीनियरिंग कालेजों की शोभा बढ़ा रहे हैं।


राज्य सरकार के विज्ञान एवं प्रावधिकी मंत्री शाहिद अली खान के अनुसार शिक्षकों के खाली पदों की नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही है। बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा रिक्तियां विज्ञापित की जा चुकी हैं और केवल इंटरव्यू के आधार पर ये सारी नियुक्तियां जल्द ही हो जाएंगी। राज्य के इंजीनियरिंग कालेजों का स्तर राष्ट्रीय मानक के अनुरूप हो और शैक्षणिक गुणवत्ता सर्वश्रेष्ठ बने इसके लिए एक कार्ययोजना तैयार की गयी है।

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