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फ्यूजन फूडःखाने का अनोखा अनुभव

फ्यूजन फूडःखाने का अनोखा अनुभव

 

फ्यूजन फूड का सिलसिला एक देश से दूसरे देश में बसने के क्रम के साथ ही शुरू हो गया था, लेकिन तब यह संगम एक आवश्यकता भर था, जबकि आज यह फ्यूजन फूड के रूप में एक नया ट्रेंड है, जिसे पूरी दुनिया में स्वीकार किया जा चुका है। दरअसल खान-पीने का शौक हो तो इंसान उसमें भी कई बार कुछ नया तलाशता है। इसी तरह होटल्स के शेफ, जिनका काम ग्राहकों को बढ़िया खाना खिलाना है, उनके लिए कुछ नया बनाने की फिराक में रहते हैं। ऐसे लोग खाने की टेबल पर नये-नये प्रयोग करने से भी नहीं चूकते, शायद इसीलिए फ्यूजन फूड धीरे-धीरे दुनिया भर में प्रसिद्घ होता गया।

 खान-पान में फ्यूजन कई प्रकार से शुरू हुआ। पहले-पहल तो प्रवासी लोगों ने नये देश के स्थानीय फूड को अपने स्वाद के अनुसार बना कर अपनाना शुरू किया। वहां के मूल निवासियों को प्रवासियों का भोजन खाने का अवसर मिला और वह उन्हें पसंद आया तो उन्होंने भी उसे कभी-कभी अपने भोजन में शामिल करना शुरू कर दिया। भोजन की आदतों के इस तालमेल ने मिली-जुली संस्कृति की तरह मिली-जुली भोजन परम्पराओं को जन्म दिया। जब किसी देश के अत्यधिक सैलानी दूसरे देश में जाने लगे तो वहां के होटलों के मेन्यू में उस देश का भोजन भी शामिल किया जाने लगा। धीरे-धीरे होटलों के मेन्यू में विभिन्न देशों का फूड शामिल हो गया और यह कॉन्टिनेटल फूड कहा जाने लगा। कॉन्टिनेंटल फूड की डिशेज में स्थानीय तत्वों और मसालों आदि के प्रयोग से नये-नये स्वाद उभरने लगे, जो अलग-अलग देशों से आये लोगों को भी आकर्षित करने लगे। इसके चलते बड़े-बड़े होटल्स के शेफ कुछ नया परोसने के उद्देश्य से विभिन्न कुकिंग स्टाइल्स को मिला कुछ नई डिश बनाने लगे। इस तरह फ्यूजन फूड को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिल गई। आगे चल कर प्रसिद्घ फूड चेन्स जब अपने देश से बाहर दूसरे देशों में आउटलेट खोलने लगीं तो वहां फ्यूजन फूड उनके मेन्यू का हिस्सा बनने लगा।

दरअसल किसी भी स्थान पर एक नये फूड आउटलेट को सफल बनाने के लिए फूड में कुछ ‘लोकल फ्लेवर’ जोड़ना आवश्यक होता है। यही फ्यूजन को जन्म देता है। उदाहरण के लिए हमारे यहां मैकडॉनल्ड ने जब ‘आलू टिक्की बर्गर’ शुरू किया तो वह एकदम सफल रहा। यह भी एक तरह का फ्यूजन फूड ही है।

 फ्यूजन फूड आज इतना प्रचलित है कि अमरीका और यूरोप के कई बड़े शहरों में फ्यूजन फूड रेस्तरां भी मौजूद हैं। अमरीका के कई हिस्सों में एशियन फ्यूजन फूड रेस्तरां हैं, जिनमें भारतीय, पूर्व एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों की डिश परोसी जाती हैं। इनके साथ ही वहां के शेफ इनकी पाक शैलियों को मिला कर नई डिश भी मेन्यू में जोड़ते रहते हैं। यूरोप में कई जगह होटलों में यूरेशियन फूड सर्व किया जाता है। यह यूरोप और एशिया के भोजन के इनग्रेडियेंन्ट्स और कुकरी स्टाइल का मेल-जोल है। एशिया के देशों में वियतनामी और थाई भोजन का फ्यूजन बहुत पसंद किया जाता है, जबकि हमारे देश में चाइनीज और इंडियन फूड का फ्यूजन काफी प्रचलित है, चाहे वह चिली फ्राइड चिकन हो या गोभी मंचूरियन। इसी तरह ‘टाको पित्जा’ इटालियन अमरीकन कुजीन का फ्यूजन है।

केलिफोर्निया के ‘अमरीकन यूरोपियन जापानी’ रेस्तरां में सैलेड विद क्रिस्प नारी टॉपिंग, लेटस एंड टॉमेटो सुशी हैंडरोल और पोच्ड टोफु आदि फ्यूजन डिश हैं। वैसे होटल और रेस्तरां उद्योग के लिए फ्यूजन फूड एक फायदे का सौदा है, लेकिन इसे बनाना सरल नही है। अलग-अलग देशों में लम्बा समय बिता चुके शेफ ही एक अच्छा फ्यूजन फूड तैयार कर सकते हैं।

 देश-विदेश की भोजन परम्पराओं के संगम की तरह क्षेत्रीय भोजन परम्पराओं का संगम ‘लोकल फ्यूजन’ को रूप देता है।कि आज इंडियन डिशेज भी ग्लोबल कुजीन पर छा रही हैं। विदेश में किसी फाइव स्टार होटल के कॉन्टिनेंटल ब्रेकफास्ट में आपको वैज समोसा खाने को मिले या बफे डिनर में ‘परोटा’ यानी परांठा नजर आ जाये तो आश्चर्य की बात नहीं है। और यह फ्यूजन फूड का ही कमाल है। वैसे भारतीय भोजन का पाश्चात्यकरण आजादी से पहले ही होने लगा था, जब ब्रिटिश और अमरीकी लोगों में इंडियन करी और तंदूरी डिशेज का क्रेज बढ़ना शुरू हुआ था। यह दूसरी बात है कि उनमें मसालों का कम प्रयोग करते हुए उनके स्वाद के अनुरूप ढाल दिया जाता था। फ्यूजन का यही स्टाइल हमारे देश में अपनाया जाता है। हमारे यहां के शेफ एशिया के अन्य देशों के अलावा यूरोप और अमरीका की पारम्परिक डिशेज को इंडियन
चटकारा देकर भारतीय स्वाद में ढाल लेते हैं। इटैलियन, मैक्सिकन और चाइनीज भोजन का भारतीयकरण बहुत से रेस्टोरेन्ट्स में देखने को मिलता है। अंतरराष्ट्रीय फूड चेन्स को तो यहां टिकने के लिए फ्यूजन को अपनाना पड़ा। मैकडॉनल्ड को अगर आलू टिक्की बर्गर लाना पड़ा तो ‘यो चाइना’ को अपनी चाइनीज डिशेज को थोड़ा भारतीय स्टाइल देना पड़ा।

खान-पान के शौकीन लोगों के लिए दुनिया भर में ‘फ्यूजन फूड’ एक नई फूड स्टेटमैंट के रूप में उभरा है। ट्रैवलिंग की जरूरत और पर्यटन का शौक बढ़ने के साथ ही संस्कृतियों का संगम होने लगा। सांस्कृतिक संगम के साथ जब खान-पान का शौक नये आयाम तलाशने लगा तो फूडी लोगों के लिए ‘फ्यूजन फूड’ का उदय हुआ। फ्यूजन फूड का अर्थ खान-पान की कुछ अलग शैलियों का संगम होता है।मॉरिशस, मलेशिया, बाली और कई देशों के भोजन में भारतीय भोजन से मिलती-जुलती डिशेज का होना इस बात का प्रमाण है। अब तो फ्यूजन फूड पर्यटकों को भी पसंद आने लगा है।

फ्यूजन फूड का सिलसिला एक देश से दूसरे देश में बसने के क्रम के साथ ही शुरू हो गया था, लेकिन तब यह संगम एक आवश्यकता भर था, जबकि आज यह फ्यूजन फूड के रूप में एक नया ट्रेंड है, जिसे पूरी दुनिया में स्वीकार किया जा चुका है। दरअसल खान-पीने का शौक हो तो इंसान उसमें भी कई बार कुछ नया तलाशता है। इसी तरह होटल्स के शेफ, जिनका काम ग्राहकों को बढ़िया खाना खिलाना है, उनके लिए कुछ नया बनाने की फिराक में रहते हैं। ऐसे लोग खाने की टेबल पर नये-नये प्रयोग करने से भी नहीं चूकते, शायद इसीलिए फ्यूजन फूड धीरे-धीरे दुनिया भर में प्रसिद्घ होता गया।

 खान-पान में फ्यूजन कई प्रकार से शुरू हुआ। पहले-पहल तो प्रवासी लोगों ने नये देश के स्थानीय फूड को अपने स्वाद के अनुसार बना कर अपनाना शुरू किया। वहां के मूल निवासियों को प्रवासियों का भोजन खाने का अवसर मिला और वह उन्हें पसंद आया तो उन्होंने भी उसे कभी-कभी अपने भोजन में शामिल करना शुरू कर दिया। भोजन की आदतों के इस तालमेल ने मिली-जुली संस्कृति की तरह मिली-जुली भोजन परम्पराओं को जन्म दिया। जब किसी देश के अत्यधिक सैलानी दूसरे देश में जाने लगे तो वहां के होटलों के मेन्यू में उस देश का भोजन भी शामिल किया जाने लगा। धीरे-धीरे होटलों के मेन्यू में विभिन्न देशों का फूड शामिल हो गया और यह कॉन्टिनेटल फूड कहा जाने लगा। कॉन्टिनेंटल फूड की डिशेज में स्थानीय तत्वों और मसालों आदि के प्रयोग से नये-नये स्वाद उभरने लगे, जो अलग-अलग देशों से आये लोगों को भी आकर्षित करने लगे। इसके चलते बड़े-बड़े होटल्स के शेफ कुछ नया परोसने के उद्देश्य से विभिन्न कुकिंग स्टाइल्स को मिला कुछ नई डिश बनाने लगे। इस तरह फ्यूजन फूड को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिल गई। आगे चल कर प्रसिद्घ फूड चेन्स जब अपने देश से बाहर दूसरे देशों में आउटलेट खोलने लगीं तो वहां फ्यूजन फूड उनके मेन्यू का हिस्सा बनने लगा।

दरअसल किसी भी स्थान पर एक नये फूड आउटलेट को सफल बनाने के लिए फूड में कुछ ‘लोकल फ्लेवर’ जोड़ना आवश्यक होता है। यही फ्यूजन को जन्म देता है। उदाहरण के लिए हमारे यहां मैकडॉनल्ड ने जब ‘आलू टिक्की बर्गर’ शुरू किया तो वह एकदम सफल रहा। यह भी एक तरह का फ्यूजन फूड ही है।

 फ्यूजन फूड आज इतना प्रचलित है कि अमरीका और यूरोप के कई बड़े शहरों में फ्यूजन फूड रेस्तरां भी मौजूद हैं। अमरीका के कई हिस्सों में एशियन फ्यूजन फूड रेस्तरां हैं, जिनमें भारतीय, पूर्व एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों की डिश परोसी जाती हैं। इनके साथ ही वहां के शेफ इनकी पाक शैलियों को मिला कर नई डिश भी मेन्यू में जोड़ते रहते हैं। यूरोप में कई जगह होटलों में यूरेशियन फूड सर्व किया जाता है। यह यूरोप और एशिया के भोजन के इनग्रेडियेंन्ट्स और कुकरी स्टाइल का मेल-जोल है। एशिया के देशों में वियतनामी और थाई भोजन का फ्यूजन बहुत पसंद किया जाता है, जबकि हमारे देश में चाइनीज और इंडियन फूड का फ्यूजन काफी प्रचलित है, चाहे वह चिली फ्राइड चिकन हो या गोभी मंचूरियन। इसी तरह ‘टाको पित्जा’ इटालियन अमरीकन कुजीन का फ्यूजन है।

केलिफोर्निया के ‘अमरीकन यूरोपियन जापानी’ रेस्तरां में सैलेड विद क्रिस्प नारी टॉपिंग, लेटस एंड टॉमेटो सुशी हैंडरोल और पोच्ड टोफु आदि फ्यूजन डिश हैं। वैसे होटल और रेस्तरां उद्योग के लिए फ्यूजन फूड एक फायदे का सौदा है, लेकिन इसे बनाना सरल नही है। अलग-अलग देशों में लम्बा समय बिता चुके शेफ ही एक अच्छा फ्यूजन फूड तैयार कर सकते हैं।

 देश-विदेश की भोजन परम्पराओं के संगम की तरह क्षेत्रीय भोजन परम्पराओं का संगम ‘लोकल फ्यूजन’ को रूप देता है।कि आज इंडियन डिशेज भी ग्लोबल कुजीन पर छा रही हैं। विदेश में किसी फाइव स्टार होटल के कॉन्टिनेंटल ब्रेकफास्ट में आपको वैज समोसा खाने को मिले या बफे डिनर में ‘परोटा’ यानी परांठा नजर आ जाये तो आश्चर्य की बात नहीं है। और यह फ्यूजन फूड का ही कमाल है। वैसे भारतीय भोजन का पाश्चात्यकरण आजादी से पहले ही होने लगा था, जब ब्रिटिश और अमरीकी लोगों में इंडियन करी और तंदूरी डिशेज का क्रेज बढ़ना शुरू हुआ था। यह दूसरी बात है कि उनमें मसालों का कम प्रयोग करते हुए उनके स्वाद के अनुरूप ढाल दिया जाता था। फ्यूजन का यही स्टाइल हमारे देश में अपनाया जाता है। हमारे यहां के शेफ एशिया के अन्य देशों के अलावा यूरोप और अमरीका की पारम्परिक डिशेज को इंडियन
चटकारा देकर भारतीय स्वाद में ढाल लेते हैं। इटैलियन, मैक्सिकन और चाइनीज भोजन का भारतीयकरण बहुत से रेस्टोरेन्ट्स में देखने को मिलता है। अंतरराष्ट्रीय फूड चेन्स को तो यहां टिकने के लिए फ्यूजन को अपनाना पड़ा। मैकडॉनल्ड को अगर आलू टिक्की बर्गर लाना पड़ा तो ‘यो चाइना’ को अपनी चाइनीज डिशेज को थोड़ा भारतीय स्टाइल देना पड़ा।

खान-पान के शौकीन लोगों के लिए दुनिया भर में ‘फ्यूजन फूड’ एक नई फूड स्टेटमैंट के रूप में उभरा है। ट्रैवलिंग की जरूरत और पर्यटन का शौक बढ़ने के साथ ही संस्कृतियों का संगम होने लगा। सांस्कृतिक संगम के साथ जब खान-पान का शौक नये आयाम तलाशने लगा तो फूडी लोगों के लिए ‘फ्यूजन फूड’ का उदय हुआ। फ्यूजन फूड का अर्थ खान-पान की कुछ अलग शैलियों का संगम होता है।मॉरिशस, मलेशिया, बाली और कई देशों के भोजन में भारतीय भोजन से मिलती-जुलती डिशेज का होना इस बात का प्रमाण है। अब तो फ्यूजन फूड पर्यटकों को भी पसंद आने लगा है।

फ्यूजन फूड का सिलसिला एक देश से दूसरे देश में बसने के क्रम के साथ ही शुरू हो गया था, लेकिन तब यह संगम एक आवश्यकता भर था, जबकि आज यह फ्यूजन फूड के रूप में एक नया ट्रेंड है, जिसे पूरी दुनिया में स्वीकार किया जा चुका है। दरअसल खान-पीने का शौक हो तो इंसान उसमें भी कई बार कुछ नया तलाशता है। इसी तरह होटल्स के शेफ, जिनका काम ग्राहकों को बढ़िया खाना खिलाना है, उनके लिए कुछ नया बनाने की फिराक में रहते हैं। ऐसे लोग खाने की टेबल पर नये-नये प्रयोग करने से भी नहीं चूकते, शायद इसीलिए फ्यूजन फूड धीरे-धीरे दुनिया भर में प्रसिद्घ होता गया।

 खान-पान में फ्यूजन कई प्रकार से शुरू हुआ। पहले-पहल तो प्रवासी लोगों ने नये देश के स्थानीय फूड को अपने स्वाद के अनुसार बना कर अपनाना शुरू किया। वहां के मूल निवासियों को प्रवासियों का भोजन खाने का अवसर मिला और वह उन्हें पसंद आया तो उन्होंने भी उसे कभी-कभी अपने भोजन में शामिल करना शुरू कर दिया। भोजन की आदतों के इस तालमेल ने मिली-जुली संस्कृति की तरह मिली-जुली भोजन परम्पराओं को जन्म दिया। जब किसी देश के अत्यधिक सैलानी दूसरे देश में जाने लगे तो वहां के होटलों के मेन्यू में उस देश का भोजन भी शामिल किया जाने लगा। धीरे-धीरे होटलों के मेन्यू में विभिन्न देशों का फूड शामिल हो गया और यह कॉन्टिनेटल फूड कहा जाने लगा। कॉन्टिनेंटल फूड की डिशेज में स्थानीय तत्वों और मसालों आदि के प्रयोग से नये-नये स्वाद उभरने लगे, जो अलग-अलग देशों से आये लोगों को भी आकर्षित करने लगे। इसके चलते बड़े-बड़े होटल्स के शेफ कुछ नया परोसने के उद्देश्य से विभिन्न कुकिंग स्टाइल्स को मिला कुछ नई डिश बनाने लगे। इस तरह फ्यूजन फूड को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिल गई। आगे चल कर प्रसिद्घ फूड चेन्स जब अपने देश से बाहर दूसरे देशों में आउटलेट खोलने लगीं तो वहां फ्यूजन फूड उनके मेन्यू का हिस्सा बनने लगा।

दरअसल किसी भी स्थान पर एक नये फूड आउटलेट को सफल बनाने के लिए फूड में कुछ ‘लोकल फ्लेवर’ जोड़ना आवश्यक होता है। यही फ्यूजन को जन्म देता है। उदाहरण के लिए हमारे यहां मैकडॉनल्ड ने जब ‘आलू टिक्की बर्गर’ शुरू किया तो वह एकदम सफल रहा। यह भी एक तरह का फ्यूजन फूड ही है।

 फ्यूजन फूड आज इतना प्रचलित है कि अमरीका और यूरोप के कई बड़े शहरों में फ्यूजन फूड रेस्तरां भी मौजूद हैं। अमरीका के कई हिस्सों में एशियन फ्यूजन फूड रेस्तरां हैं, जिनमें भारतीय, पूर्व एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों की डिश परोसी जाती हैं। इनके साथ ही वहां के शेफ इनकी पाक शैलियों को मिला कर नई डिश भी मेन्यू में जोड़ते रहते हैं। यूरोप में कई जगह होटलों में यूरेशियन फूड सर्व किया जाता है। यह यूरोप और एशिया के भोजन के इनग्रेडियेंन्ट्स और कुकरी स्टाइल का मेल-जोल है। एशिया के देशों में वियतनामी और थाई भोजन का फ्यूजन बहुत पसंद किया जाता है, जबकि हमारे देश में चाइनीज और इंडियन फूड का फ्यूजन काफी प्रचलित है, चाहे वह चिली फ्राइड चिकन हो या गोभी मंचूरियन। इसी तरह ‘टाको पित्जा’ इटालियन अमरीकन कुजीन का फ्यूजन है।

केलिफोर्निया के ‘अमरीकन यूरोपियन जापानी’ रेस्तरां में सैलेड विद क्रिस्प नारी टॉपिंग, लेटस एंड टॉमेटो सुशी हैंडरोल और पोच्ड टोफु आदि फ्यूजन डिश हैं। वैसे होटल और रेस्तरां उद्योग के लिए फ्यूजन फूड एक फायदे का सौदा है, लेकिन इसे बनाना सरल नही है। अलग-अलग देशों में लम्बा समय बिता चुके शेफ ही एक अच्छा फ्यूजन फूड तैयार कर सकते हैं।

 देश-विदेश की भोजन परम्पराओं के संगम की तरह क्षेत्रीय भोजन परम्पराओं का संगम ‘लोकल फ्यूजन’ को रूप देता है।कि आज इंडियन डिशेज भी ग्लोबल कुजीन पर छा रही हैं। विदेश में किसी फाइव स्टार होटल के कॉन्टिनेंटल ब्रेकफास्ट में आपको वैज समोसा खाने को मिले या बफे डिनर में ‘परोटा’ यानी परांठा नजर आ जाये तो आश्चर्य की बात नहीं है। और यह फ्यूजन फूड का ही कमाल है। वैसे भारतीय भोजन का पाश्चात्यकरण आजादी से पहले ही होने लगा था, जब ब्रिटिश और अमरीकी लोगों में इंडियन करी और तंदूरी डिशेज का क्रेज बढ़ना शुरू हुआ था। यह दूसरी बात है कि उनमें मसालों का कम प्रयोग करते हुए उनके स्वाद के अनुरूप ढाल दिया जाता था। फ्यूजन का यही स्टाइल हमारे देश में अपनाया जाता है। हमारे यहां के शेफ एशिया के अन्य देशों के अलावा यूरोप और अमरीका की पारम्परिक डिशेज को इंडियन
चटकारा देकर भारतीय स्वाद में ढाल लेते हैं। इटैलियन, मैक्सिकन और चाइनीज भोजन का भारतीयकरण बहुत से रेस्टोरेन्ट्स में देखने को मिलता है। अंतरराष्ट्रीय फूड चेन्स को तो यहां टिकने के लिए फ्यूजन को अपनाना पड़ा। मैकडॉनल्ड को अगर आलू टिक्की बर्गर लाना पड़ा तो ‘यो चाइना’ को अपनी चाइनीज डिशेज को थोड़ा भारतीय स्टाइल देना पड़ा।

खान-पान के शौकीन लोगों के लिए दुनिया भर में ‘फ्यूजन फूड’ एक नई फूड स्टेटमैंट के रूप में उभरा है। ट्रैवलिंग की जरूरत और पर्यटन का शौक बढ़ने के साथ ही संस्कृतियों का संगम होने लगा। सांस्कृतिक संगम के साथ जब खान-पान का शौक नये आयाम तलाशने लगा तो फूडी लोगों के लिए ‘फ्यूजन फूड’ का उदय हुआ। फ्यूजन फूड का अर्थ खान-पान की कुछ अलग शैलियों का संगम होता है।मॉरिशस, मलेशिया, बाली और कई देशों के भोजन में भारतीय भोजन से मिलती-जुलती डिशेज का होना इस बात का प्रमाण है। अब तो फ्यूजन फूड पर्यटकों को भी पसंद आने लगा है।

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