class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

महिला आरक्षण: कब थमेगा बवाल

महिला वर्ग को एक तिहाई आरक्षण का मुद्दा पिछले 14 वर्षो से हिचकोले खा रहा है। नई संसद में शरद यादव, मुलायम सिंह व लालू प्रसाद जैसे मंडल राजनीति के धुरंधरों के विरोध से मनमोहन सरकार एकाएक बचाव की मुद्रा में आ गई।

शीतकालीन सत्र तक भले ही महिला आरक्षण का मुद्दा लटक गया है लेकिन इस ज्वलंत सवाल पर राजनीतिक उठापठक तब तक नहीं खत्म नहीं होने वाली जब तक सरकार महिला आरक्षण पर संसद में आम सहमति बनाने में सफल नहीं होगी। विवादों में उबलते महिला आरक्षण के सवाल को खंगाल रहे हैं हमारे ब्यूरो प्रमुख उमाकांत लखेड़ा

संसद व विधान मंडलों में महिला वर्ग को एक तिहाई आरक्षण का मुद्दा पिछले 14 वर्षो से हिचकोले खा रहा है। नई संसद में तीनों अहम खेमे - कांग्रेस, भाजपा और वाम पार्टियों में महिला विधेयक मूल रूप में संसद में पारित करा लेने में कोई बड़ी समस्या नहीं दिख रही है, लेकिन शरद यादव, मुलायम सिंह व लालू प्रसाद जसे मंडल राजनीति के धुरंधरों के विरोध से मनमोहन सरकार एकाएक बचाव की मुद्रा में खड़ी दिखाई दे रही है।

राष्ट्रपति के अभिभाषण में सरकार ने जिन 25 बिंदुओं को अपनी प्राथमिकता में गिनाया है उसमें सबसे ऊपर महिला आरक्षण सुनिश्चित करने का वादा है। संसद में इस मुद्दे पर जो बहस हुई और विशेषज्ञों व समाजशास्त्रियों की जो राय उभर रही है उससे ऐसे संकेत मिले हैं कि सरकार बीच का रास्ता निकालने के विकल्पों को खुला रखे हुए है।

शरद यादव, मुलायम व लालू प्रसाद 33 फीसदी कोटे में दलित, पिछड़ी व अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान चाहते हैं। उन्हें डर है कि मौजूदा स्वरूप में बिल पास हुआ तो इससे पिछड़ी जतियों की महिलाओं के हाथ कुछ नहीं लगेगा और उच्च वर्ग और लिख-पढ़ी शहरी महिलाएं सारे कोटे पर काबिज हो जएंगी।

महिलाओं के आरक्षण पर डॉ. नलचिनपन की अध्यक्षता वाली संसद की स्थाई समिति ने इन्हीं अंत:विरोधों के चलते इस बात पर गंभीरता से सोचा था कि देश की उन ऐसी सीटों की पहचान की जनी चाहिए जहां महिलाओं की आबादी का औसत ज्यादा है ताकि उसी में से एकतिहाई सीटें दोहरी निर्वाचन प्रणाली के आधार पर छांट ली जएं।

इस फामरूले का साफ आशय यही था कि लोकसभा व विधानमंडलों के मौजूदा स्वरूप में बदलाव किए बिना महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया ज सकता है। लेकिन यह फामरूला भी केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित हो गया। जनेमाने मानवाधिकार कार्यकर्ता व दिल्ली हाइकोर्ट के पूर्व जज राजेंद्र सच्चर मानते हैं कि महिला संगठनों को दोहरी सदस्यता के विकल्प पर विचार करना चाहिए वर्ना उनके प्रतिनिधित्व का सपना पूरा होने में बेवजह लंबा वक्त खिंचेगा और महिलाएं अपने हक से वंचित रहेंगी।

इस मामले में यह सुझव भी 13वीं लोकसभा में प्रमुखता से चर्चा में आया कि राजनीतिक पार्टियों के लिए संवधानिक तौर पर अनिवार्य कर दिया जए कि वे कम से कम 20 फीसदी सीटें महिलाओं को आबंटित करें लेकिन यह सुझव कई पार्टियों व महिला संगठनों ने खारिज किया क्योंकि उनका मानना था कि इसमें महिला आरक्षण विरोधी पार्टियों को बच निकलने का यह रास्ता मिल जायेगा। जिन सीटों पर उनका जनाधार नहीं हो या हारने वाली सीटें हों वहां पर महिलाएं ढू्ंढ़कर खड़ी कर दी जाएंगी। 

यूपीए सरकार की मुश्किल यह है कि पार्टियों के भीतर आम सहमति कायम कराना उसकी खुद की जिम्मेदारी बन गई है। चूंकि कांग्रेस को पिछली बार से ज्यादा बहुमत में है और विपक्ष का पूरा समर्थन का वादा है, ऐसी दशा में बिल पास न करा पाना उसकी खुद की नाकामी बन सकती है।

संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल ने दोहराया है कि सरकार विधेयक के मूल स्वरूप में बदलाव का इरादा नहीं रखती लेकिन कांग्रेस इन विडंबनाओं से घिरी हुई है कि यदि उसने बहुमत के बूते इस अति संवेदनशील मसले के बहाने आरक्षण बिल विरोधियों के हाथ में मुद्दा पकड़ा दिया तो इससे जतीय उबाल की बेवजह की फितरत उभरेगी। 

दरअसल बिहार में नीतीश कुमार ने शहरी निकायों व पंचायतों में 50 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर रखी हैं। इस कोटे में उन्होंने जति आधारित आरक्षण का जो फामरूला पेश किया है उससे बिहार में जमीनी स्तर पर विकास से वंचित जतियां जिनमें अनुसूचित जतियां-जनजतियां, अति पिछड़ी जतियां शामिल हैं में नई उम्मीदें जगी हैं।

शरद यादव ने बिहार मॉडल को ही देश में महिला आरक्षण का मानदंड बनाने की मांग की है। हालांकि ऐसा सोचने वालों की कमी नहीं है जो मानते हैं कि महिलाओं को पंचायतों में आरक्षण की तुलना संसद के आरक्षण से नहीं की जानी चाहिए। पंचायतों का काम रोजमर्रा की समस्याओं को सुलझना है जबकि संसद का काम नीतियां और कानूनों को बनाना या संशोधित करना होता है। शीतकालीन सत्र तक भले ही यह मुद्दा लटक गया है पर इस ज्वलंत सवाल पर उठापठक तब तक नहीं खत्म नहीं होगी जब तक सरकार महिला आरक्षण पर संसद में आम सहमति न बना ले।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:महिला आरक्षण: कब थमेगा बवाल