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स्त्रियों का प्रतिनिधित्व : नेपाल से भी पीछे हम

संसद में महिलाओं को बराबरी का हक देने के मामले में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस या स्वीडन जसे विकसित लोकतांत्रिक देश नहीं, बल्कि मध्य अफ्रीकी कबायली देश रवांडा पूरी दुनिया के लिए आदर्श और प्रेरणा का स्रोत बनकर उभरा है। महज एक करोड़ की आबादी वाले इस देश की 80 संसदीय सीटों में से 45 पर  महिला सांसदों का कब्ा है, जो संसद सदन का 56 प्रतिशत से भी ज्यादा है।

सन 1994 की नस्ली हिंसा में आठ लाख लोगों के नरसंहार के बाद फिर से पटरी पर आए इस देश ने संसद में महिलाओं को 30 प्रतिशत आरक्षण देने के संयुक्त राष्ट्र के 2003 के प्रस्ताव को दुनिया में पहली बार उसी साल लागू कर दिया था।  रवांडा का वोटर तो और भी स्मार्ट निकला। उसने आरक्षित 24 सीटों के मुकाबले 39 महिलाओं को चुनकर सीधे संसद में भेज दिया।

इसके बाद नॉर्डिक देशों- स्वीडन, नॉव्रे, फिनलैंड, डेनमार्क और आइसलैंड का नंबर आता है, जहां संसद में महिला सांसदों की नुमाइंदगी क्रमश: 47, 36, 42, 38 और 43 प्रतिशत है। स्वीडन में राजनीतिक दलों ने अपने आप ही महिलाओं को संसद के 40 प्रतिशत टिकट का कोटा तय कर रखा है।

एशियाई देशों में नेपाल टॉप पर है, जिसका नंबर दुनिया में 17वां है। यहां संसद में 33 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं हैं। भारत इस मामले में दुनिया में 99 रैंक पर आता है, जहां हाल के आम चुनाव में केवल 11 प्रतिशत महिलाएं चुनकर आ पाई हैं। यानी महिला आरक्षण बिल पास होने पर ही वह नेपाल की बराबरी कर सकता है। इस मामले में पाकिस्तान भी हमसे काफी आगे (विश्व क्रम 47वां) है, जहां नेशनल असेंबली में कुल 23 प्रतिशत ख़वातीन चुनकर पहुंची हुई हैं।

उधर ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स में महिला सांसदों की संख्या 20 प्रतिशत से भी कम है। 2005 के पिछले चुनाव में वहां 646 सीटों में से 300 पर कोई महिला उम्मीदवार नहीं थी। महिलाओं को संसदीय न्याय देने के मामले में ओबामा के अमेरिका का हाल भी कोई खास अच्छा नहीं है। इस मामले में अमेरिका का नंबर (72) तो  यूएई (47), चीन (53), फ्रांस (66) और इजराइल (69) से भी नीचे है।

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