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औरतों की अगुवाई से बदलते हालात

पन्द्रहवीं लोकसभा में इस बार महिला सांसदों की संख्या पिछली बार से ज्यादा है। जीतकर आई 59 महिला सांसदों में से एक है हरियाणा के भिवानी-महेन्द्रगढ़ की श्रुति चौधरी। उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्र के छोटे शहर नारनौल की यात्रा करनी चाहिए और गंदी बस्ती वाले इलाके नई बस्ती में जाना चाहिए।

वहां जाकर उन्हें नई बस्ती की महिलाओं से बात करनी चाहिए। अगर वह उनसे उनकी प्राथमिकताओं के बारे में पूछेंगी तो वे बिना किसी हिचकिचाहट के चिल्ला कर कहेंगी पानी और सफाई। जहां सरकार विभागों को लेकर जद्दोजहद में है और मीडिया राजनीतिक समीकरणों पर अंतहीन अटकलें लगाने में व्यस्त है, वहां भारत में दूसरे वर्ष भी लाखों लोग पर्याप्त पानी के बिना जी रहे हैं।

भोपाल में पानी के लिए दंगे हो चुके हैं। गुजरात में कई ऐसे कस्बे हैं, जहां सप्ताह में एक घंटे के लिए पानी आता है। गíमयों में शहरी भारत के लाखों लोग पूरी तरह से टैंकरों द्वारा पानी की आपूर्ति पर निर्भर रहते हैं। और गांवों में कुएं सूख रहे हैं, क्योंकि पानी की आपूर्ति प्यासे कस्बों व शहरों या उद्योगों को की जा रही है।

कांग्रेस पार्टी को विश्वास है कि इन चुनावों में शासन और विकास ये दो मंत्र ही उसे सत्ता में वापस लाए हैं। लेकिन अपने दूसरे शासनकाल में क्या वह इन दो महत्वपूर्ण कारकों को, जो एक दूसरे के बिना अधूरे हैं, जरी रख पाएगी? शासन की कोई पद्धिति न होने से अच्छी से अच्छी योजनाएं भी विफल हो जती हैं। और जहां शासन में व्यवस्था हो वहां भी पानी और सफाई जसी मूलभूत सेवाओं में निवेश न करने से कुछ भी नहीं बदलता।

नारनौल इसका एक अच्छा उदाहरण है। दिल्ली और जयपुर हाईवे से थोड़ी दूर बसे नारनौल की आबादी 60,000 है। इसकी 18 प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या मलिन बस्तियों में रहती है। आम चुनाव की संभावना से पहले मैंने एक सुबह नई बस्ती की महिलाओं के साथ बिताई। एक घर के बरामदे में हर उम्र की महिलाएं बैठ गईं। उनके सिर चटक रंग के दुपट्टों से ढके हुए थे। उन्होंने खुलकर शासन और विकास पर अपने विचार व्यक्त किए।

उनकी सबसे प्रमुख समस्या पानी की थी। उन्होंने मुझे जमीन से झंक रहे पानी के पाइप दिखाए, जो इस बात के प्रमाण हैं कि वहां कभी पाइप से पानी की आपूर्ति करने की योजना बनी थी। लेकिन वह योजना एक सपना बनकर रह गई। पानी कभी नहीं आया, पाइप सूख गए और पानी के बिना नल से पाइप जोड़ने का कोई अर्थ नहीं था। महिलाएं इस उम्मीद में जी रही हैं कि एक दिन उनका सपना पूरा होगा। चूंकि कागजों में उन्हें पाइप से पानी मिल रहा है, इसलिए हकीकत में कभी न मिलने वाले पानी के लिए वे हर महीने 50 रुपए की कीमत चुका रही हैं। कागजी कार्यवाही की इतनी बड़ी कीमत।

उनमें से एक महिला ने कहा- ‘‘दो साल पहले पानी के लिए हमने धरने दिए। हमने रास्ते रोके, जिलाधीश के कार्यालय गए और तीन घंटे तक बैठे रहे। सभी आए। इसके बाद दो दिन तक पानी आया और फिर बंद हो गया। पहली बार मैंने सुना कि महिलाओं की आवाज का असर हो सकता है।’’ इसके बावजूद नाममात्र का ही सुधार हुआ। उन्हें पानी कैसे मिलता है? नई बस्ती से कुछ दूर नगरपालिका टैंक भर कर पानी की आपूर्ति करती है।

कागजी कार्यवाही के अनुसार सप्ताह में तीन बार पानी दिया जना चाहिए, लेकिन  वास्तव में पानी सप्ताह में केवल एक ही दिन आता है। महिलाएं अपनी बारी का इंतजर करती हैं और जितना उठा सकती हैं उतना पानी भर लेती हैं। बाकी कमी कुछ हैंडपंप से पूरी करती हैं, लेकिन उनसे भी जितना पानी मिलता है उससे उनकी जरूरत पूरी नहीं होती। कभी निगम पार्षद रही बिरना देवी ने कहा-‘‘पुरुष काम पर ज सकते हैं। सारी मुसीबतों का सामना औरतों को करना पड़ता है। महिलाओं को सब सहना पड़ता है, इसलिए वे शक्ितशाली हैं।’’

नई बस्ती की महिलाओं को काम करते हुए देखने पर पता चलता है कि वे किस तरह पानी का इस्तेमाल करती हैं और पानी बचाती हैं। वे पानी की हर बूंद बचाकर उसका कई तरह के कामों में प्रयोग करती हैं। उदाहरण के लिए कपड़े धोने पर बचे साबुन के पानी से बरतन धोती हैं। और जब पानी फिर से इस्तेमाल के लायक नहीं रह जता तो उसे घर के बाहर नाली साफ करने के काम में लाती हैं। बहते पानी के अभाव में नई बस्ती में मल निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है। लेकिन इन महिलाओं के प्रयास से यह क्षेत्र आश्चर्यजनक रूप से साफ रहता है।

इसलिए हमारी नवनिर्वाचित संसद को ये महिलाएं शासन का जो पहला पाठ पढ़ा सकती हैं, वह है महिलाओं से बात करो, उनकी सुनो, उनकी मूलभूत समस्याओं को जनो और उन्होंने जिस तरह से समस्याओं का हल ढूंढा है उससे सीखो। हर कोई ऐसी सलाह पर ध्यान नहीं देता। और यह तो नियम है कि अगर महिलाओं की आवाज सुनी जती है तो उस पर ध्यान नहीं दिया जता। गंदी बस्ती धारावी किसी न किसी कारण से खबरों में रहती है। इसकी समस्याओं को हल करने के लिए महिलाओं के सुझवों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता।

धारावी धीरे-धीरे बदल रही है। अगर इसके पुर्नविकास की सरकारी योजना में खामी रह गई तो अगले दशक में यह पहचानने लायक नहीं रहेगी। अभी यह पुरानी और अव्यवस्थित चाल है और सात मंजिल की 80 बिल्डिंग चालू गंदी बस्ती पुर्नविकास कार्यक्रम का हिस्सा हैं। इनमें से ज्यादातर बिल्डिंग का डिजइन और निर्माण भवन निर्माताओं ने किया है। उनकी दिलचस्पी बस्ती के निवासियों में कम और जमीन से ज्यादा से ज्यादा कीमत वसूलने में थी। लेकिन कुछ बिल्डिंग समुदाय के लोगों से गहन परामर्श के बाद बनाई गइर्ं, जो बसाई जनी हैं।

बाद में भी कई बार महिलाओं के विचारों की अनदेखी की गई या उन्हें रद्द कर दिया गया। उदाहरण के लिए ऐसी एक बिलिडंग में महिलाओं के सुझव पर कामन जगह के लिए छत बनाई गई। उनका सुझव था कि इस जगह का इस्तेमाल मसाले आदि सुखाने और कुछ घरेलू काम के लिए किया ज सकता है। छोटे बच्चों के खेलने और बुजुर्गो के घूमने के लिए यह सुरक्षित जगह होगी।

पुरुष प्रधान समुदाय ने महिलाओं के सुझव को रद्द कर निर्णय लिया कि छत का इस्तेमाल करना ‘जोखिम भरा’ है। इसलिए चीनी मोजक फर्श से बनी इस जगह को ‘सुरक्षित’ कर ताला लगा दिया गया। लोग क्या चाहते हैं, यह सुनने और समझने की हमारे विधायकों की योग्यता ही अच्छे शासन की पहचान है। औरतें क्या चाहती हैं, अगर वे यह सुनें और समझे तो और अच्छा है। 

kalpu.sharma @gmail. com

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं

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