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तमिलनाडु : एक कुनबे की कहानी

तमिलनाडु में एम. के. स्टॉलिन को जिस तरह तरक्की देकर उप मुख्यमंत्री बनाया गया, उसने यह तो साबित कर ही दिया कि उनके पिता और द्रमुक राजनीति के बुजुर्ग नेता मुख्यमंत्री करुणानिधि के  भीतर का नाटककार अभी खत्म नहीं हुआ है।भले ही उन्होंने काफी अर्से पहले ही फिल्मों की पटकथा लिखना बंद कर दिया था।

वसे तो यह देर-सवेर होना ही था, लेकिन जिस ढंग से यह किया गया उससे करुणानिधि के मंत्रिमंडल के उनके नजदीकी सहयोगी भी हैरत में पड़ गए। लेकिन पिछले कुछ समय से रीढ़ की समस्या से परेशान इस वयोवृद्ध नेता ने यह घोषणा की तो तमिलनाडु की राजनीति पर पैनी नजर रखने वालों ने भी माना कि घोषणा के लिए इससे उपयुक्त मौका कोई और नहीं हो सकता था। नई दिल्ली में बड़े बेटे एम. के. अझगिरी के केंद्रीय मंत्री पद की शपथ लेने के चौबीस घंटे के भीतर ही उन्होंने यह काम कर दिया।

करुणानिधि ने अपनी यह उत्तराधिकार योजना बहुत सोच समझ कर तैयार की थी। अब राज्य में पार्टी और सरकार की बागडोर स्टालिन संभालेंगे और नई दिल्ली में पार्टी की आंख और कान का काम अझगिरी व दयानिधि मारन करेंगे। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि उनकी कवियत्री बेटी कनीमोझी को क्या भूमिका दी जाएगी। कनीमोझी इस समय राज्यसभा सदस्या हैं। यह तो पहले से ही जगजहिर था कि स्टॉलिन अपने पिता की आंख के तारे हैं। मुथुवेल करुणानिधि ने 14 साल की उम्र से ही अपने इस बेटे को इसके लिए तैयार करना शुरू कर दिया था।

1967 के लोकसभा चुनाव में स्टॉलिन अपने चाचा मुरासोली मारन के चुनाव प्रचार में उतरे थे। उसी साल पार्टी जब राज्य में सत्ता में वापस लौटी तो उसमें एक छोटी भूमिका स्टॉलिन की भी थी। दस साल बाद वे और भी परिपक्व हो गए, जब देश में आपातकाल लगा और उन्हें जेल जना पड़ा। तब उन्हें पार्टी की युवा शाखा का अध्यक्ष बनाया गया था। वे आज भी इस पद पर हैं।

शायद वे देश के अकेले ऐसे राजनीतिज्ञ हैं, जो पूरे तीस साल से किसी पार्टी की युवा शाखा संभाल रहे हैं। 1989 जयाललिता के शासन के बाद पार्टी जब सत्ता में लौटी तो इस वापसी में स्टालिन ने भी भूमिका निभाई थी। उस समय करुणानिधि ने एक कविता का हवाला दिया था, जिसमें कहा गया था कि ‘वे कितने खुशकिस्मत पिता हैं, जिन्हें इस तरह का बेटा मिला है’।

दिसंबर 2007 में जब स्टॉलिन ने थिरुनेलवेल्ली में एक विशाल युवा रैली का आयेाजन करके अपनी संगठनात्मक क्षमता का परिचय भी दे दिया था। इसी रैली में यह मांग की गई थी कि स्टॉलिन को पार्टी और सरकार में ज्यादा बड़ी भूमिका दी जए। तब करुणानिधि ने कहा था कि यह काम सही समय पर किया जएगा। स्टॉलिन को इस तरह से शह दिए जने से विवाद भी खड़ा हुआ है और इसके चलते करुणानिधि पर परिवारवाद का आरोप भी लगता रहा है।

पिछले सात दशक के द्रविड़ आंदोलन का अध्ययन करने वालों का कहना है कि पार्टी के संस्थापक अन्नदुरई ने कार्यकर्ताओं से कहा था कि वे पार्टी को ही अपना परिवार माने। करुणानिधि ने इसका अपने तरह से अनुसरण किया और पार्टी के पद सिर्फ अपने परिवार के सदस्यों के बीच ही बांटें। दूसरी तरफ कुछ लोगों का कहना है कि यह सब चीजें तत्काल असर की हैं। जब करुणानिधि परिवार की समस्याओं को सुलझने के लिए उपलब्ध नहीं होंगे तो यह सब कुछ बिखर जएगा। करुणानिधि ही हैं, जो पिछले दो दशक से केंद्र और राज्य में पार्टी की धुरी बने हुए हैं।

दूसरी तरफ जब मुख्यमंत्री अपने बच्चों में पद बांटते हैं तो आम आदमी को इसमें कुछ भी असामान्य नहीं लगता। आम लोग आमतौर पर मानते हैं कि राजनीति में परिवारवाद एक देशव्यापी चीज है और कोई भी पार्टी इससे बच नहीं सकी है। ऐसे मौके पर लोग हमेशा ही सवाल पूछते हैं कि एक भी पार्टी ऐसी बताइये, जिसमें परिवार के सदस्यों को आगे नहीं बढ़ाया जता। इस देश का सबसे पुराना राजनैतिक दल कांग्रेस है। पिछले चार दशकों से यह दल एक ही परिवार के सदस्यों के नेतृत्व में चला ज रहा है।

और इसके बाद बनने वाले सभी दलों- समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, कर्नाटक का जनता दल (यू) और आंध्र प्रदेश की तेलुगू देशम पार्टी सभी में एक परिवार के सदस्यों का ही बोलबाला रहा है। ऐसे वरिष्ठ राजनेता जो अपने बेटे या बेटी को राजनीति में लाए हैं, उनकी संख्या तो काफी ज्यादा है। और वे पूरे देश में फैले हुए हैं। तो फिर तमिलनाडु की द्रमुक और उसके मुख्यमंत्री पर ही उंगली क्यों उठाई जए? बात में दम है। लेकिन क्या यह हमारे लोकतंत्र की सेहत के लिए अच्छा है?

radhaviswanath73 @yahoo. com

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

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