class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

कुछ अपने लिए

घर में विचरने से जैसे धूल-मिट्टी अंदर आ ही जाती है। उसे खुराहना, साफ करना आवश्यक है, वैसे ही संसार में व्यवहार करने से राग-द्वेष, विकार-वासना, आसक्ति-विषमता ये सब दोष मन में आ जाते हैं। इन्हें प्रतिदिन सत्य के रंग से साफ करना जरूरी है। ताला एक ही चाबी से खुलता भी है और बन्द भी होता है। जीवन भी हमारा इसी चाबी की भांति है, संसार में लगाये तो बंध जता है, परमेश्वर की तरफ घुमा दें तो मुक्त हो जता है। अत: अपने जीवन कर्मो की चाबी इस प्रकार ही घुमाते रहें कि जीवन उन्मुक्त हो जाए।

 समस्या यही है कि जो जगत कभी अपना होने वाला नहीं, वही अपना सा लगता है। नित्य लगता है, तभी समस्याओं का विस्तार है। जो कण-कण में व्याप्त है, हमारे चारों ओर है। अन्दर बाहर है, वही दिखाई नहीं देता। यदि उसे ढूंढें तो समस्याएं हल हो जएगी, जिस दिन भीतर के बोध का ज्ञान होगा, बाहर की पाने बाहर नहीं जएगा। क्योकिं संतोष स्वाति की वह बूंद है, जो परमात्मा बरसाता है तो मनुष्य फकीर होते हुए भी मस्ती से जीता है। परमात्मा की यह अपार कृपा उस पर अवश्य बरसती है, जो अपनी पात्रता को बढ़ा लेता है।

प्रेम करना जीव का स्वभाव है तो प्रेम सबसे करो। यह प्रेम का विस्तार होना चाहिए। सबके प्रति ममता हो तो वह कब समता में बदल जती है, पता ही नहीं चलता और यही तो समर्पण है, सार की बात यह है कि कम से कम सुविधाओं और उपलब्धियों का उपयोग कर अधिक से अधिक आनन्द प्राप्त कर उसे बांटों यही धर्म है। प्रार्थना का बल सबसे अधिक सार्थक होता है। 

प्रार्थना शब्दों का खेल नही है। यह हृदय की प्रेम भरी पुकार है उस चेतन स्वरुप सत्ता के प्रति जिसका होना हम अनुभव करें भले हीउसकी बांह न दिखाई देती हो उस मालिक को याद करना ही उसकी प्रार्थना है। विश्वास Þाद्धा गहराई से से दर्द भरी अन्त पुकार ही प्रार्थना है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:कुछ अपने लिए