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नक्सली निशाने पर

माओवादी छापामार दावा करते हैं कि उनके निशाने पर पूंजीवादी और साम्राज्यवादी व्यवस्था है और वे उसे ध्वस्त करने की लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन उनकी बारूदी सुरंगें अक्सर सुरक्षा बल के सामान्य जवानों को मार कर अपनी क्रांति का सपना पूरा करती हैं।

नतीजतन पहले से ही अत्याचार में सहायक हो रही व्यवस्था अपनी प्रतिक्रिया में और क्रूर होकर उभरती है और इस दौरान उस सामान्य जन पर ज्यादा अत्याचार होता है, जिसकी दुहाई देकर नक्सली अपना संघर्ष छेड़ते हैं। यह सही है कि नक्सली संघर्ष की शुरुआत अन्याय को मिटाने के एक नैतिक आग्रह के साथ होती है पर बाद में यह संघर्ष स्वयं अन्याय के ऐसे दुष्चक्र में फंस जता है कि उसे सामाजिक न्याय और क्रांति की विचारधारा नहीं, इंतकाम का एक दर्शन संचालित करता है।

फिर भी सवाल उठता है कि स्वप्नलोक में जीने वाले माओवादी छापामार क्यों झरखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में अपनी जड़े जमाए हुए हैं और दंडकारण्य के सघन जंगलों को प्रशिक्षण शिविर के रूप में इस्तेमाल कर पा रहे हैं। इसकी दो वजहें स्पष्ट हैं। एक तो मुख्यधारा का विकास और उसका राजनीतिक दर्शन उन गांवों और जंगलों तक नहीं पहुंचा है, जहां पर नक्सलवाद पनप रहा है।

इसीलिए पश्चिमी मिदनापुर जिले के लालगढ़ इलाके को अपने कब्जे में लेकर नक्सली वहां नहर खोदने, तालाब बनाने और स्वास्थ्य केंद्र स्थापित करने का काम कर रहे हैं। बिहार के कुछ इलाकों में नक्सलियों ने बच्चों को स्कूल भेजने के निर्देश भी जरी किए हैं। हालांकि नक्सली इस्लामी आतंकवादियों का भी समर्थन करते हैं पर सकारात्मक कामों के चलते उनकी छवि सरकार, दूसरी तरह के आतंकी और डाकुओं वगैरह से अलग बनती है और उनके प्रति लोगों के आकर्षण की यह बड़ी वजह है।

दूसरी वजह हमलों के मामले में सुरक्षा बलों के मुकाबले नक्सलियों के ज्यादा चुस्त और चौकस होने की है। इस साल के सुरक्षा बलों के अभियान में अगर 80 नक्सली मारे गए तो उनके हमलों में मारे जने वाले सुरक्षा जवानों की संख्या इसकी दोगुनी है। बुधवार को ही चाइबासा में हुए हमले के बाद सुरक्षा बलों की मदद के लिए हेलीकॉप्टर तीन घंटे बाद पहुंचा। यानी सरकार को अगर नक्सलियों से सचमुच निपटना है तो उनका राजनीति और कानून-व्यवस्था दोनों स्तरों पर पूरे मन से मुकाबला करना होगा।

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