class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

नए भारत को चाहिए नई रक्षा नीति

भारत के लिए सबसे पहले सबसे बड़ी चुनौती यही बनी रहेगी कि वह किस तरह से आर्थिक विकास की उस दर को बहाल करे, जो पिछले कुछ साल तक उसे मजबूती देती रही। बाकी सभी चीजें प्राथमिकता की दूसरी पायदान पर हैं। चीन पिछले दो दशक से दहाई अंक की विकास दर से तरक्की कर रहा है, जबकि भारत की विकास गाथा अभी एक दशक पुरानी भी नहीं है। इसी आर्थिक विकास के पीछे ही है भारत की अपने भू-भाग और जनता को जरूरी सुरक्षा प्रदान करने की प्राथमिकता। भारतीय सेनाओं की महत्वकांक्षा लगातार बढ़ रही है और वे क्रांतिकारी बदलाव की बात करने लगी हैं। पिछले कुछ साल में भारत विश्व बाजार में हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार बन कर उभरा है। अर्थव्यवस्था की कामयाबी के बिना यह मुमकिन नहीं था। भारत ने अपने सामरिक नजरिये को नया विस्तार दिया है, इसी के चलते अब वह जमीन पर आधारित परंपरागत हथियार खरीदने के बजाए बीच हवा में ही विमान में ईंधन भरने के संयंत्र और लंबी दूरी की मिसाइलें तक खरीद रहा है। यह सिलसिला उसी सूरत में बरकरार रह सकता है, जब भारत आर्थिक क्षेत्र में लगातार मैदान मारता रहे।


लेकिन संसाधन ही अपने आप में काफी नहीं हैं। दिशा का एक अहसास भी बहुत जरूरी है, जो तभी हासिल हो सकता है कि जब इसके लिए होने वाली संस्थागत व्यवस्थाएं अपनी जगह पूरी तरह से मुस्तैद रहें। विदेश और रक्षा नीति के मामले में, नई दिल्ली में एक के बाद एक आने वाली सरकारों ने संस्थागत क्षमता बढ़ाने की नीति को थोड़ा सा बदला है। भारत लंबे दौर की सामरिक सोच तैयार करने में नाकाम रहा है तो इसका एक बड़ा कारण यह है कि हमारे पास ऐसे प्रभावी और अर्थपूर्ण संस्थान नहीं हैं, जो देश के संसाधनों को सोचे-समझे गए राजनैतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने का खाका तैयार कर सकें। एक बड़ी शक्ति के रूप में भारत का उभरना अभी भी उसकी क्षमता का मामला है। आमतौर पर यह मान लिया जाता है कि भारत के पास ऐसा संस्थागत ढांचा है जो उसकी बढ़ती आर्थिक और सैन्य ताकत को दुनिया पर पड़ने वाले असर में बदल देगा। बावजूद इसके कि नीति निर्माण के दूसरे क्षेत्रों में भारत लगातार कमजोर प्रशासनिक क्षमता का प्रदर्शन करता रहा है।


विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा जसे मुद्दों पर सरकार की कई संस्थाएं काम नहीं करती हैं, क्योंकि अक्सर सरकारें चाहती ही नहीं कि वे काम करें। इसलिए सारा दारोमदार नौकरशाही पर आ जाता है, जो सामरिक ढंग से सोचने के लिए बनी ही नहीं है। और फिर नौकरशाही अपने ही खोल में रहने की आदी है, उसकी दिलचस्पी बाकी जगहों पर मौजूद विस्तृत ज्ञान से कुछ हासिल करने में नहीं रहती। इसके अलावा यह उस संस्कृति का मामला भी है, जहां गैर सरकारी विद्वानों और थिंकटैंक को महत्व नहीं दिया जाता। भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली अभी इस मामले में कमजोर है कि वह ऐसे संसाधन मुहैया करा सके, जिससे भारत विश्व स्तर पर एक नई क्षमता के साथ उभरता दिखे। भारत के लिए असल मुद्दा यह है कि अगर सरकार के बाहर उच्च शैक्षणिक स्तर पर और मीडिया में आधुनिक संवाद नहीं होता है तो क्या सरकार के भीतर संस्थागत तंत्र बन सकता है? भारतीय विद्वानों को बाहर रखने का नतीजा ही इस सवाल के रूप में उभरा है कि सरकार उनके बिना किस तरह की संस्थाएं खड़ी कर सकती है?

संयुक्त प्रगतिशील गठजोड़ 2004 में जब सत्ता में आया तो उसने एक पेशेवर और प्रभावी संस्था के रूप में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को बनाने का वादा किया था। जबकि इसके पहले की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ की सरकार में इसकी छवि काफी परंपरावादी थी। लेकिन संप्रग इसमें नाकाम रहा। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सुरक्षा खतरों का आकलन करने और विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों में तालमेल बिठाने, उनका प्रबंधन करने का काम ही करता रहा। उसने नए और साहसिक विचारों के जरिये कोई दीर्घकालिक योजना बनाने का काम नहीं किया। अगर सचमुच कोई प्रभावी संस्थागत ढांचा काम कर रहा होता तो वह न सिर्फ चुनौतियों को पहचानता, बल्कि उनसे निपटने की एक रणनीति भी बनाता। वह नौकरशाही को भी संगठित और तैयार करता, साथ ही आम जनता को बताने और उसकी सहमति हासिल करने का काम भी करता। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद अपने आप में कोई इलाज नहीं है। अमेरिका में भी ऐसी संस्था नौकरशाही में तालमेल बिठाने में बहुत कामयाब नहीं रही है। लेकिन भारत में इसका नाकाम रहना विदेश नीति जसे नाजुक मसलों पर निर्णय प्रक्रिया के तदर्थवाद को दिखाता है। यही वजह है कि अपने अस्तित्व के छह दशक पूरे करने के बाद भी भारत ने आज तक राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का कोई दस्तावेज नहीं तैयार किया है।
सामरिक सोच नहीं होने के कारण भारत उन आंतरिक मसलों से नहीं निपट सका, जो विदेश और सुरक्षा नीति से जुड़े हैं। इस मामले में भारत का रुतबा लगातार गिर रहा है। भारत के विकास की कहानी में घुन लगाने का काम कई तरह की चुनौतियां कर रही हैं, इनमें वामपंथी उग्रवाद से लेकर दक्षिणपंथी कट्टरतावाद तक की कई तरह की ताकते हैं। भारत एक मजबूत समाज है जिसके पास कमजोर सरकार है, जो अपनी राष्ट्रीय ताकत को किसी राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने की स्थिति में नहीं है।


मीडिया और बुद्धिजीवी अक्सर भारत के उत्थान की बात करते हैं, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि उसकी सत्ता अपने ही भू-भाग पर लगातार कमजोर हो रही है। अब वह समय आ गया है जब भारतीय सत्ता को अपनी साख बचानी चाहिए। भारतीय बुद्धिजीवियों में यह अहसास बढ़ रहा है कि भारत विश्व स्तर पर महत्वपूर्ण और बड़ी ताकत बनकर उभर रहा है। लेकिन भारत की आर्थिक तरक्की ने जो अवसर पैदा किए हैं, भारत सरकार उनका फायदा उठाने में पूरी तरह से नाकाम रही है। भारत की इस नई ताकत के लिए जरूरी विदेश नीति और उसके भीतर की बहुलता के बीच द्वंद्व और तनाव होना लाजिमी ही है। जैसा कि हमें भारत और अमेरिका के बीच होने वाले परमाणु समझोते के समय दिखाई भी दिया। लोकतंत्र में नीति निर्माण एक मुश्किल काम होता है। इसमें तमाम जटिलताएं होती हैं। लेकिन पिछले पांच साल में राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले पर भारत की पूरी साख ही लकवाग्रस्त दिखाई दी। कांग्रेस के लिए यह काफी आसान था कि वह इसका सारा आरोप गठजोड़ की राजनीति के मत्थे मढ़ दे। लेकिन इस बार मतदाताओं ने उसे दूसरा मौका दिया है, अब कांग्रेस को इन चुनौतियों से निपटना ही चाहिए।
 
harsh.pant@kcl.ac.uk

लेखक किंग्स कॉलेज लंदन में प्राध्यापक हैं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:नए भारत को चाहिए नई रक्षा नीति