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अर्थव्यवस्था: रोजगार के नए अवसरों की चुनौती

हाल ही में नए वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में लोगों को छंटनी से
बचाना तथा रोजगार का सृजन करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। रोजगार मोर्चे पर सरकार को
कदम-कदम पर चुनौतियों का सामना करना होगा। शहरों की तुलना में गाँवों में रोजगार की चुनौतियाँ ज्यादा हैं।
इस समय चार नई रोजगार सच्चाईयां उभरकर सामने आई हैं।

एक, काम के प्रति असंवेदनशील तथा धीमी कार्यगति वाले लोगों के लिए कंपनियों में कोई जगह नहीं मानी जा रही है और ऐसे लोगों की रोजगार से छंटनी की जा रही है। दूसरे, अधिकारियों और कर्मचारियों के मोटे वेतन के दिन लद गए हैं, अब प्रदर्शन के मुताबिक ही वेतन मिलने का दौर है। तीसरे, आर्थिक सुस्ती के कारण कंपनियों, उद्योगों और व्यवसायों में नई नौकरियों की संख्या न्यूनतम हो गई है। चौथे, विदेशों में रोजगार बाजार में संरक्षण की दीवारें खड़ी करके भारतीय युवाओं के रोजगार के बढ़ते कदमों को रोका जा रहा है।


विकसित देशों की तरह भारत में भी उद्योग-व्यवसाय के द्वारा अपना अस्तित्व बचाने के लिए लागत कटौती और मितव्ययिता पर सबसे अधिक ध्यान दिया जा रहा है। कर्मचारियों से बार-बार कहा जा रहा है कि मंदी का यह चुनौतिपूर्ण दौर आराम से काम करने का नहीं है। यह समय पूरी तन्मयता और पूरी क्षमता के साथ काम करने का है। कुछ समय पहले तक आईटी क्षेत्र में ऐसा दौर था, जब आईटी पेशेवरों का वेतन दो-तीन साल में ही दोगुना हो जाया करता था पर अब ऐसी स्थिति नहीं रह गई है। कई कंपनियाँ हैं, जिन्हें पिछले तीन-चार साल के चमकते हुए दौर में कर्मचारियों को कंपनी में बनाए रखने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ती थी, लेकिन अब वे ही कंपनियाँ ऐसी कोशिशों की कोई आवश्यकता अनुभव नहीं कर रही हैं। इसके विपरीत ये कंपनियाँ कर्मचारियों के काम की गति और काम की गुणवत्ता पर हरदम निगाहें रख रही हैं। देश की अधिकांश कंपनियाँ कर्मचारियों की गुणवत्ता और कार्य परिणाम के आधार पर कर्मचारियों की रैंकिंग कर रही हैं। प्रमुख आईटी कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, इन्फोसिस टेक्नोलॉजिस और विप्रो ही नहीं देश की कई इलेक्ट्रॉनिक, इलेक्ट्रिकल तथा केमिकल आदि सभी क्षेत्रों की कंपनियाँ उम्मीद के मुताबिक काम नहीं करने वाले कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाने वाली गुलाबी पर्ची देकर दूसरे दिन से काम पर न आने का आदेश दे रही हैं।


गौरतलब है कि वर्ष 2009 की शुरुआत से अब तक कंपनियों के कार्यप्रस्तुतीकरण अध्ययन बता रहे हैं कि आर्थिक सुस्ती से देश की 75 प्रतिशत कंपनियों के मुनाफे में गिरावट आई है। तेल कंपनियों को छोड़कर अन्य क्षेत्रों की अधिकांश कंपनियाँ बिक्री में स्थिरता या गिरावट और मुनाफे पर दबाव के चलते खराब दौर से गुजर रही हैं। ऐसी कंपनियों में पहला प्रयास यही हो रहा है कि मौजूदा मानव संसाधन का अधिकतम उपयोग हो, अतिआवश्यक होने पर ही कंपनियों के द्वारा नई नियुक्तियाँ हो रही हैं। कंपनियाँ न केवल लागत कम करने को ध्यान में रख रही हैं, बल्कि नियुक्तियों के समय गुणवत्ता को लेकर भी पहले से ज्यादा कठोर हैं। पहले औसत क्षमता वाले कर्मचारी भी कंपनियाँ स्वीकार कर लेती थीं, लेकिन अब सबसे योग्य की नियुक्ति पर ही ध्यान दिया जा रहा है।


इसलिए रोजगार के नए अवसर और पुरानों को बरकरार रखने की कोशिश में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में रणनीतिक प्रयास किए जाने होंगे। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) के तहत 100 दिनों की रोजगार गारंटी काफी हद तक सफल रही है। लेकिन इसमें भ्रष्टाचार और दूसरी कई बुनियादी कमियों को दूर करने की आवश्यकता है। कृषि और ग्रामीण विकास में नए रोजगार सृजन की गति बढ़ाने की जरूरत है। ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की तरह शहरी गरीबों के लिए भी शहरी रोजगार गारंटी योजना शुरू की जानी चाहिए। शहरी क्षेत्रों में उद्योग व्यवसायों में छंटनी के प्रयासों को रोकना होगा। संगठित मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में नए रोजगार सृजन पर सरकार को विशेष ध्यान देना होगा। आईटी, टैक्सटाइल, जेम्स एंड ज्वैलरी, ऑटोमोबाइल, सहित विभिन्न उद्योगों तथा विभिन्न निर्यातोन्मुखी उद्योगों में रोजगार बढ़ाने के तेजी से उपाय करने होंगे। सर्विस सेक्टर और स्वरोजगार में नई पीढ़ी को आगे बढ़ाना होगा। नई पीढ़ी को रोजगार के नए वैश्विक बाजार के मद्देनजर अंग्रेजी, कम्प्यूटर ज्ञान एवं प्रतिस्पर्धा के मंत्रों से सुसज्जित करना होगा। गरीब अर्धशिक्षित एवं अशिक्षित युवाओं को रोजगार देने के लिए सरकार की कौशल प्रशिक्षण योजना को कारगर बनाना होगा। ऐसे प्रयासों से ही सरकार रोजगार की कठिन चुनौतियाँ का सफलतापूर्वक सामना कर सकेगी और ऐसे प्रयासों से ही रोजगार की चिंताओं से ग्रस्त देश के लाखों युवा चेहरों पर मुस्कराहट आ सकेगी।

डॉ. जयंतीलाल भंडारी
लेखक वित्त मामलों के जानकार हैं

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