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कोई भी असहाय नहीं

चित्तशक्ति पुरुष और प्रकृति ही है - परम विषयी, और अन्य सभी सत्तायें उनके विषय हैं। उनके लिए कुछ भी गोपन, अज्ञात अथवा अनदेखा नहीं रहता है। तुम उनसे छिपाकर कुछ भी नहीं कर सकते हो। यहाँ तक कि उनसे छिपाकर कुछ सोच भी नहीं सकते हो। और जैसा तुमको ज्ञात है मनुष्य की साधना अपूर्णता से हरि (नाभिक) पूर्णता की ओर गतिशील है। विश्व की प्रत्येक चीज उनके चारों ओर ठीक उसी तरह घूम रही है, जैसे कि भौतिक संरचना के नाभिकेन्द्र के चारों ओर इलेक्ट्रॉन घूमते हैं। एक बड़ा हाथी हो अथवा छोटी चींटी उनके लिए कोई अन्तर नहीं रखते। सभी उनकी प्रिय सन्तान हैं।


यह कीड़ा बहुत छोटा है, यह दीमक एक तुच्छ प्राणी है और मसक अर्थात् मच्छर भी तुच्छ प्राणी है, किन्तु परमपुरुष के मन में उसका वही अनुशक्ति, आकर्षण और महत्व है, जैसा नाग के लिए है। उनका प्रेम सब पर समान है। वही महत्व, वही प्रेम, वही अनुशक्ति समस्त त्रिभुवन के लिए है। वे सब कुछ देखते हैं। वे सब कुछ अनुभव करते हैं। कुछ भी उनसे अनदेखा नहीं रहता। तुम जो भी करते हो, जो भी सोचते हो, जो भी गन्ध लेते हो और जो भी स्वाद लेते हो सब कुछ परम पुरुष देखते हैं। जब रंगमंच पर कुछ भी नहीं होता है, अर्थात् जब न अभिनेता अभिनय करता है, न नर्तक नृत्य करता है, न गायक गीत गाता है, तब भी गुप्त प्रकाश रंगमंच की शून्यता को देखता है, वह यह भी देखता है कि रंगमंच पर कुछ हो नहीं रहा है।


इसी प्रकार जब तुम कुछ नहीं करते रहते हो, जब तुम अपने कारण शरीर में अथवा अपने सामान्य शरीर में निलम्बित हो, तब भी तुम्हारी उस स्थिति को भी परम पुरुष देखते रहते हैं। तुम कभी भी असहाय नहीं हो, कभी अकेले नहीं हो। तुम सर्वदा परम पुरुष के साथ हो, इसलिए तुम अपने में निराशावादिता को अथवा हीनमान्यता को प्रश्रय मत दो।

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