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नुकसान पहुंचाने में गंगा सबसे अधिक विनाशकारी, सोन सबसे कम

बिहार में हर साल नदियां लील जातीं हैं तीन सौ करोड़ रुपये की परिसंपत्तियां। यह आंकड़ा वर्ष 1991 के स्थिर पर मूल्य पर आधारित है। अगर आज के मूल्य पर इस नुकसान को मापा जाय तो मामला लगभग 800 करोड़ का बनता है। इसके अलावा बाढ़ के कारण सूबे के कई इलाके अगम्य हो जाते हैं।

ये डिफिकल्ट इलाके विकास के लागत को बढ़ा देते हैं साथ ही राज्य की सर्विस प्रोवाइडर मशीनरी की पहुंच को भी सीमित कर देते हैं। बाढ़ के समय में किसानों की दुर्दशा पीड़ादायक होती है। वहां के ऋणधारी किसानों की ऋणमाफी के लिए अगले वर्ष की बजट का इंतजर भी नहीं किया ज सकता। 

इस मामले में विशेष श्रेणी का दर्जा प्राप्त करने वाले राज्यों की तुलना करें तो हिमाचल प्रदेश की तुलना में बिहार की ढाई गुनी अधिक आबादी अगम्य इलाके में रहती है। बिहार में ऐसे लोगों की जनसंख्या 1.62 करोड़ है जबकि हिमाचल प्रदेश की मात्र 66 लाख आबादी इस श्रेणी में आती है।

यहां यह बताना भी जरूरी है कि बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाके में हर साल कुछ न कुछ वृद्धि ही होती है। जबकि पहली पंचवर्षीय योजना से ही सुरक्षात्मक उपाय किये जाते रहे हैं। वर्ष 1954 में सूबे में बाढ़ प्रभावित इलके 25 लाख हेक्टेयर तक ही सीमित था।

वर्ष 1980 में इसका क्षेत्रफल बढ़कर 42.60 लाख हेक्टेयर हो गया। द्वितीय बिहार सिंचाई आयोग (1994) के अनुसार यह क्षेत्रफल 71.61 लाख हेक्टेयर हो गया है। बाढ़ से होने वाले नुकसान का आकलन करने पर पता चलता है कि गंगा की धारा सूबे में सबसे अधिक कहार बरपाती है।

यह नदी हर वर्ष लगभग 51 करोड़ का नुकसान पहुंचाती है। (वर्ष 1991 के मूल्य पर ) इस मामले में सोन नदी सबसे कम नुकसानदायक साबित होती है। इस नदी से होने वाली वार्षिक क्षति मात्र सात लाख रुपये है। कोसी नदी से होने वाली वार्षिक क्षति हालांकि गंगा से लगभग कम (44.30 करोड़) है लेकिन इसकी विनाशकारी क्षमता अधिक है।

24 घंटे में इस नदी का पानी 30 फीट की ऊंचाई तक उठ सकता है और देखते-देखते यह 15 मील की चौड़ाई में बहते समुद्र में बदल जा सकता है। बावजूद इस राज्य को केन्द्र सरकार से अपेक्षित सहायता नहीं मिलती है। राज्य की अर्थव्यवस्था और स्थाई वार्षिक व्यय पर ध्यान नहीं जता और राज्य सरकार को इससे निपटना पड़ता है।

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  • Web Title:नदियां हर साल लील जातीं 800 करोड़