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ऑस्ट्रेलिया के नस्लवाद का विरोध जरूरी

ऑस्ट्रेलिया में हिन्दुस्तानी छात्रों के साथ जिस तरह का नस्लवादी अत्याचार हाल के दिनों में देखने को मिला है, वह दिल दहलाने वाला और शर्मनाक ही कहा जा सकता है। ऐसा पहली बार हो रहा हो ऐसा नहीं। अश्वेत भारतीय अहंकारी गोरों के निशाने पर दूसरी कई जगह भी रहे हैं। कुछ वर्ष पहले लंदन में सर मुंड़े मुस्टंडे गुंडों ने पाकी बैशिंग और डॉट बस्टिंग को महामारी की तरह फैलाया था। इन शब्दों का अनुवाद था दक्षिण एशियाई मूल के प्रवासियों की दर्दनाक पिटाई और बिंदी लगाने वाली महिलाओं के साथ अपमानजनक छेड़खानी। तब भारतीय यह सोच कर चुप बैठे थे कि गोरे ईसाइयों का असली बैर तो दकियानूसी कट्टरपंथी मुसलमानों से है, वह भी खासकर निचले तबके के कम पढ़े-लिखे लोगों से।

यह सच है कि अंग्रेज नाजायज तौर से घुसपैठिये हिन्दुस्तानी-पाकिस्तानियों और बांग्लादेश वासियों से खासे परेशान रहे हैं, जिन्होंने उनके देश के बड़े हिस्सों को दक्षिण एशिया सरीखी मलिन बस्तियों में तबदील कर दिया था। ब्रिकलेन और साउथ हॉल के इलाकें खालिस देशी बन गये थे। उस दौर में भी श्रीलंका वासियों और वेस्टइंडीज से पहुंचने वाले भारतीयों के वंशजों को इस तरह के नस्लवाद का शिकार कम बनना पड़ता था। इसका एक कारण शायद यह था कि वह गौरांग महाप्रभुओं के तौर-तरीकों से बेहतर परिचित थे और अपने ऐतिहासिक अनुभव के कारण पराये मुल्क में दब कर रहने के लिए तैयार थे। अमेरिका में भी हिन्दुस्तानियों को बार-बार नस्लवादी हिंसा का सामना करना पड़ा है- वह खुद को भले ही भूरा समझते हों पर गोरे उन्हें कालों से बेहतर नहीं मानते। पिछले कुछ महीनों में अनेक होनहार हिन्दुस्तानियों ने अपनी जान अमेरिका में गंवाई है और एक विचित्र संयोग यह है कि इनमें से लगभग सब के सब एक ही राज्य आंध्र प्रदेश के निवासी थे। तर्क यह दिया जा रहा है कि मेहनतकश प्रतिभाशाली हिन्दुस्तानियों को अश्वेत अमेरिकी और वंचित गोरे अपने पेट पर लात मारने वाला घुसपैठिया समझते हैं और इसीलिए आक्रोश का विस्फोट इन्हें लहूलुहान कर देता है। विडंबना तो यह है कि पारंपरिक मित्रराष्ट्र रूस में भी आज हिन्दुस्तानी छात्र निरापद नहीं। कुछ महीने पहले सेंट पीटर्सबर्ग में डॉक्टरी के कुछ छात्रों को बेरहमी से पीटा गया था और चाकू से घायल किया गया था। अमेरिका हो या रूस वहां की घटनाओं की तुलना ऑस्ट्रेलिया से नहीं की जा सकती। अमेरिकी समाज में अकारण हिंसा और व्यक्तिगत कुंठा जनित रक्तपात को एक विचित्र स्वीकृति प्राप्त है। अमेरिका के मध्यवर्ती और दक्षिणों राज्यों में नस्लवादी ज़हर बुरी तरह फैला हुआ है और इसकी चपेट में सभी अश्वेत आते रहे हैं। जहां तक विलायत की बात है, वहां के लम्पट गोरों में यह अहंकार अब तक बचा है कि उन्होंने भारत पर ही नहीं, एशिया अफ्रीका के बड़े भू-भाग पर राज किया था और सभी अश्वेत उनके लिए आज भी नौकर-चाकर ही हैं। अभी कुछ साल पहले तक अधिकांश हिन्दुस्तानियों को (उच्च मध्य वर्ग के सदस्यों समेत) विलायत और अमेरिका-केनेडा जन्नत नज़र आते थे। घर की अच्छी भली नौकरी या लाभप्रद कारोबार छोड़कर वह विदेश भागते थे। जिन अपमानजनक हालात में जिंदगी बसर कर वह पढ़ने या कमाने के लिए तैयार हो जाते थे उसने भी गोरों के मन में यह भ्रम पैदा किया कि स्वदेश में इनकी जिंदगी जानवरों जैसी होगी। एक बार दोयम दर्जे की जिंदगी कबूल करने के बाद फिर नस्लवाद के खिलाफ शिकवे-शिकायत करने की गुंजाइश कम बचती है। 
श्रेष्ठतम विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानो में काम करने वाले या बहुराष्ट्रीय कंपनियों में ऊंचे पदों पर बैठे लोग आमतौर पर अश्लील नस्लवाद से सुरक्षित रहते हैं, भले ही कांच की छत और दीवार उनका रास्ता भी रोकती है। जो लोग सब कुछ जान-सुनकर कुछ भी भोग-डोलकर अपना भविष्य गोरों के मुल्क में संवारना चाहते हैं, उनसे हमें कुछ नहीं कहना। इस वक्त हमारी चिंता उन मासूमों को लेकर है, जो ऑस्ट्रेलिया के चंगुल में फंसे हैं।


ऑस्ट्रेलिया के लिए विदेशी मुद्रा कमाने का तीसरा सबसे बड़ा साधन वहां के विश्वविद्यालय और शिक्षण संस्थान हैं। इस कमाई की कुल रकम करीब साढ़े बारह अरब डॉलर आंकी गई है। यह बात भी जगजाहिर है कि ऑस्ट्रेलिया में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों में एक तिहाई से बड़ा हिस्सा हिन्दुस्तानियों का है। इतना खर्च बर्दाश्त करने वाले निचले तबके नहीं गोरों के तौर-तरीके समझने वाले अंग्रेजी बोल सकने वाले नौजवान ही हैं। जो लोग नौकरी की तलाश में इस नर्क में पहुंचे हैं वह भी पेशेवर कौशल से संपन्न ही हैं। खुद ऑस्ट्रेलियाई गोरे दंडद्वीप में भेजे गये अभियुक्तों की ही संतान हैं और जिसे वह आज अपना मुल्क समझते हैं उन आदिवासियों की जन्मभूमि थी, जिनका नस्लवादी ढंग से वंशनाशक सफाया इनके पूर्वजों ने किया था। किसी भी तरह का साम्राज्यवादी अहंकार पालने का मौका इतिहास इन बेचारे गोरों को नहीं देता। कुछ वर्ष पहले तक तमाम ऑस्ट्रेलियाई इंडोनेशिया और चीनी खतरे को लेकर बेचैन बौखलाये रहते थे। अपनी सुरक्षा के लिए उन्हें अमेरिकी छत्रछाया अर्थात सैनिक संगठनों का कवच स्वीकार करना पड़ा। खुद को भले ही वह एक अलग महाद्वीप मानते हों, भू-राजनैतिक दृष्टि से वह एशिया का ही हिस्सा है। दिक्कत यह है कि नस्लवादी गोरे सांस्कृतिक दृष्टि से अपने को यूरोपीय- अंग्रेजों और अमरिकनों का मौसेरा भाई ही मानते हैं। इसी अंतरविरोध के कारण उनकी नीति दो विपरीत ध्रुवों के बीच झूलती रहती है।
फिर ऑस्ट्रेलिया कोई बड़ी शक्ति नहीं है जिसके सभी नखरे या तुनकमिजाजी हमें हर हालत में सर-माथे बिठाने हैं। गरज ऑस्ट्रेलिया की भारत को रिझाने की कहीं ज्यादा है। न तो उसके पास ऐसी टेक्नोलॉजी है, जिसके बिना हमारा काम नहीं चल सकता और न ही उसके साथ सामरिक संधि की अनिवार्यता है। जाने क्यों अब तक राष्ट्र कुल के तथाकथित भाईचारे के नाम पर या क्रिकेट के धूर्ततापूर्ण खिलवाड़-व्यापार के कारण हम ऑस्ट्रेलिया के साथ अपने संबंधों को खास समझते रहे हैं और गैर जरूरी अहमियत देते हैं। भारतीय राजनयिकों के लिए भले ही ऑस्ट्रेलिया में तैनात किया जाना सुखद हो, भारत का कोई संवेदनशील राष्ट्रहित ऐसा नहीं जिसकी रक्षा बिना उसके सहकार के न हो सकती हो। बहुत पुरानी बात नहीं अभी हाल जब भारत और अमेरिका के बीच परमाणविक करार हो रहा था, तब यूरेनियम सप्लाई के मामले में ऑस्ट्रेलिया ने भारत को परेशानी में डालने के लिए त्योरियां चढ़ाई थी। जब अमेरिकनों ने चाबुक फटकारा तब उन्हें अपनी औकात पता चली। ऑस्ट्रेलिया चाहे बहुलवादी संस्कृति का कितना ही पाखंड पाले उसका असली चेहरा नस्लवादी ही है। इस दोयम ताकत का गै़रजिम्मेदार आचरण स्वीकार करने की कोई विवशता भारत की नहीं होनी चाहिए।


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लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं

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