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परिवार में तकरार

संघ परिवार का रास्ता गलत है और उस पर चल कर भारतीय लोकतंत्र में लंबे समय तक सफलता नहीं पाई जा सकती, यह मानने के बजाय पराजय से पस्त भारतीय जनता पार्टी के भीतर अब यह बहस चल रही है कि परिवार में एकता थी या नहीं।

चुनाव समिति के सदस्य और लोकसभा में विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी के राजनीतिक सहायक सुधींद्र कुलकर्णी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर आडवाणी को कमजोर नेता के रूप में प्रस्तुत करने का आरोप लगा कर इस बहस को सतह पर ला दिया है। हालांकि आडवाणी समेत पार्टी के कई नेता सुधींद्र के इस विश्लेषण को एकदम गलत और एक स्वतंत्र पत्रकार की राय बता रहे हैं, पर इतना बड़ा इलहाम उन्हें स्वतंत्र रूप से ही हो गया हो इस पर सहज विश्वास नहीं होता। जहिर है पार्टी में कहीं गहरी खींचतान चल रही है, जिसकी झलकियां इन रूपों में प्रकट हो रही हैं। सवाल यह भी है कि पार्टी में पहले से तकरार थी, इसलिए पार्टी हारी या हार के बाद यह सब शुरू हुआ है। यह सारी बातें महीने के अंत तक होने वाली भाजपा की चिंतन बैठक में उठेंगी और उसमें संघ के प्रतिनिधि आएंगे या नहीं, इससे पता चलेगा कि फिलहाल भाजपा और संघ के राजनीतिक रिश्ते किस प्रकार हैं। अपने को सांस्कृतिक संगठन बताने वाले संघ के चुनावी उपयोग का यह छद्म तो परिवार का स्थायी भाव है, लेकिन संचारी भाव भाजपा को संघ के वैचारिक प्रभाव से मुक्त करने का है। मूलत: संघ से संबंध न रखने वाले भाजपा के रणनीतिकारों का एक धड़ा इस कोशिश में लगा है कि पार्टी अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा बनाई गई उदार और आधुनिक राजनीतिक जमीन पर खड़ी हो। जबकि दूसरे धड़े का जोर इस बात पर है कि भाजपा मूलगामी बन कर अपनी हिंदूवादी जमीन को और उर्वर बनाए। सुधींद्र कुलकर्णी पहले वाले धड़े के प्रतिनिधि हैं और कहा जता है कि इन्होंने ही आडवाणी को धर्मनिरपेक्ष दिखाने के लिए उनकी पाकिस्तान यात्रा के दौरान जिन्ना समर्थक बयान दिला दिया था। वे संघ के असहयोग का जिक्र कर उसके बाद आडवाणी के प्रति बनी नाराजगी की भी याद दिला रहे थे। एक तरह से देखा जए तो इस समय संघ परिवार तकरीबन उसी द्वंद्व से गुजर रहा है, जिसे डॉ. राम मनोहर लोहिया हिंदू बनाम हिंदू की बहस कहते थे। पर इस द्वंद्व से निकलने के लिए जिस साहस की जरूरत होती है, क्या भाजपा वह दिखा पाएगी?

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