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घाटी में चूक

हुर्रियत कांफ्रेंस के हड़ताल का आह्वान वापस लेने के बाद कश्मीर घाटी में जनजीवन सामान्य हो गया है, लेकिन लोगों में नाराजगी तो है ही। जब तक लोगों में नाराजगी और प्रशासन के प्रति अविश्वास रहेगा, तब तक कश्मीर में कभी भी स्थिति उग्र और बेकाबू हो सकती है।

इस घटना का सबसे बड़ा सबक युवा मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के लिए यही हो सकता है कि वे खुद अपने प्रशासन पर ज्यादा निर्भर न करें और संवेदनशील मामलों में कार्रवाई करने में देरी न करें। यह मामला इतनी तूल इसीलिए पकड़ गया कि दो महिलाओं के साथ बलात्कार और हत्या जसे गंभीर अपराध के मामले में स्थानीय पुलिस ने लापरवाही बरती और इन्हें दुर्घटना में हुई मौतें बताई। जब जनता भड़क गई और अलगाववादियों ने जनता के असंतोष का फायदा उठाकर उग्र आंदोलन छेड़ दिया, तब राज्य और केन्द्र सरकार हरकत में आई। पोस्टमार्टम में बलात्कार और हत्या की तसदीक होने के बाद आंदोलन और उग्र हो गया। कश्मीर में जब-जब हालात सामान्य होते दिखते हैं, तभी कुछ ऐसा होता है जिससे अलगाववादियों को सरकार विरोधी आंदोलन के लिए कारण मिल जता है। पिछले साल अमरनाथ यात्रा को लेकर विवाद भी इसीलिए पैदा हुआ था कि सरकार ने इस मामले की संवेदनशीलता को नहीं समझ था। शोपियान की बलात्कार और हत्या जसी घटना देश के किसी भी इलाके में हो तो जनता का भड़कना स्वाभाविक है और कश्मीर जसे इलाके में तो इससे अलगावादी तत्वों को ताकत मिल जती है। 

यहां यह भी कहना होगा कि स्थानीय प्रशासन और पुलिस का रवैया भी इस मामले में वैसा ही है, जैसा भारतीय पुलिस का आम तौर पर होता है और इसे बदलने की सख्त जरूरत है। मुख्यमंत्री अब्दुल्ला के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त और संवेदनशील बनाने की है, जो आतंकवाद के वर्षो में निहायत नाकारा और भ्रष्ट हो गया है। अगर ऐसा नहीं किया गया तो कश्मीर में शांति बहाली के उपाय नाकाम हो जाएंगे क्योंकि कभी भी ऐसे मामले उभर सकते हैं, जो जनता को सड़कों पर सरकार के खिलाफ ला दें। सरकार को चाहिए कि वह दोषियों को पकड़ने में चुस्ती और गंभीरता दिखाए और जनता में अपने प्रति विश्वास पैदा करे, ताकि स्थायी शांति का रास्ता आसान हो सके।

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