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फिर भी क्यों पिछड़ जाती हैं लड़कियां

यदि भारतीय समाज में बढ़ती हुई लड़कियों के आम अनुभव का एक खाका तैयार करें तो हम देखेंगे कि छोटी बच्चियों में शारीरिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक हताशा की छाया साफ तौर पर दिखाई पड़ती है। अगर बेटे का जन्म हो तो जश्न मनाया जाता है और बेटी का जन्म हो तो उसे मात्र बर्दाश्त कर लिया जाता है।

भारतीय मा-बाप बेटिया नहीं चाहते, यह बात किसी से छिपी नहीं है। जीवन-भर की निर्भरता और असुरक्षा की भावना उनकी शादी में ही प्रतिबिंबित हो जाती है और लगता है कि सिर्फ मा बनना ही स्त्रियों के जीवन का एकमात्र लक्ष्य होता है। मायके में उसे अस्थायी रूप में ही रहना है और विवाह के बाद उसे पराये घर में अपने-आपको समायोजित करना है।

यह सीख और इसकी चिंता लड़की को जन्म से ही घुट्टी में पिला दी जाती है। रजस्वला होने के कारण अपवित्र होने जैसी गहरी धारणाए लड़कियों के मन में कहीं गहरे में रच-बस जाती हैं और वे इस पितृसत्तात्मक समाज में अपने-आपको निचले दर्जे का इंसान मानने लगती हैं।

लड़कियों के पालन-पोषण में उनके मनोवैज्ञानिक विकास पर इन नकारात्मक पहलुओं का क्या प्रभाव पड़ता है, इस पर शैक्षिक अनुसंधान और शिक्षकों के प्रशिक्षण में बहुत ही कम ध्यान दिया गया है। शिक्षा-नीति में इस बात का समर्थन किया गया है कि बाल-केंद्रिक शैक्षिक प्रणाली के अंतर्गत बच्चों को अपने-आपको अभिव्यक्त करने के अवसर दिए जाने चाहिए, ताकि वे अपने-आप को खोजने का प्रयास कर सकें । शिक्षा के बाल-केंद्रिक दर्शन में आत्म-सम्मान की भावना को विकसित करने की प्रक्रिया को एक महत्वपूर्ण मूल्य के रूप में रखा गया है, क्योंकि इससे बच्चों को सीखने की प्रेरणा मिलती है और उनमें आत्मविश्वास भी बढ़ता है।

कुछ प्रथाए तो ऐसी हैं, जिनसे साफ तौर पर भेदभाव की भावना प्रकट होती है। मा-बाप का बालक-शिशु के प्रति आचरण सकारात्मक रहता है, और बालिका-शिशु के प्रति उनका आचरण नकारात्मक रहता है। भेदभावभरे इस आचरण के अलावा भी रोजमर्रा के जीवन में उन्हें यह जताया जाता है कि लड़कियों का शरीर नाजुक होता है और दिमाग भी कमजोर।

यही कारण है कि लड़कियों का दिमाग विज्ञान और गणित जैसे विषय पढ़ने के लिए उपयुक्त नहीं होता। स्कूली शिक्षा में यह मनोवृत्ति बहुत बड़ी चुनौती बनकर सामने आती है। इस बात के भी बहुत कम प्रमाण मिलते हैं कि अध्यापक इस चुनौती को स्वीकार करते हैं और इसके आकार और स्वरूप को समझते हैं।

वे भी लड़कियों के प्रति पितृसत्तात्मक समाज की पक्षपातपूर्ण मनोवृत्ति से ग्रस्त रहते हैं और इस मामले में पुरुष अध्यापकों और महिला अध्यापकों की मनोवृत्ति में कोई खास अंतर नहीं होता। अध्यापकों की शिक्षा में आत्मचिंतन और अपने-आपसे सवाल पूछने की आदत शायद ही कभी विकसित हो पाती हो। अध्यापकों को विषय पढ़ाने का प्रशिक्षण ही दिया जाता है और वे मुख्य रूप में अपने विद्यार्थियों के दिलो-दिमाग की सामाजिक संरचना की परवाह किए बगैर ही अपना विषय पढ़ाने का काम करते हैं।         

बहुत कम लोग जानते हैं कि देश के अनेक भागों में जब कन्याओं की भ्रूणहत्या की घटनाए बढ़ने लगती हैं तो स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियों के मन पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है और वे हिंदू राजनीतिक कार्यकर्ताओं के उस आक्रामक व्यवहार की व्याख्या कैसे करती हैं, जिसके कारण युवतिया हिंसा की शिकार होती हैं। एक अध्यापक के रूप में मेरा अनुभव यही है कि ये लड़किया भारतीय समाज की मान्यताओं में अंतर्निहित स्त्रियों के प्रति घृणा की मनोवृत्ति को बखूबी समझती हैं।

उनमें से बहुत-सी लड़किया तो यह भी मानती हैं कि स्त्रीविरोधी सामाजिक परिवेश से लड़ने के लिए शिक्षा एक ऐसा साधन है, जो उन्हें अधिक सशक्त बना सकता है। वे उम्मीद करती हैं कि स्कूल और कॉलेज से उन्हें एक विशेष प्रकार की सकारात्मक सोच और संस्कार मिलेंगे और कई संस्थाए तो विद्यार्थियों में इस प्रकार की सोच और संस्कार को विकसित करने के लिए गंभीर प्रयास भी कर रही हैं।

दुर्भाग्यवश ऐसी संस्थाओं की संख्या नगण्य है और दूसरी संस्थाओं पर इसका कोई खास प्रभाव भी दिखाई नहीं देता। लड़कियों के साथ भेदभाव का व्यापक प्रभाव भारत में सभी स्तरों की शैक्षणिक संस्थाओं की कक्षाओं और कैम्पस के जीवन पर भी पड़ता है।

यह भेदभाव कुछ तो पाठच्यक्रम और संस्थाओं की नीतियों में भी दिखाई देता है। राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद (एनसीआरटी) ने इस दिशा में व्यापक प्रयास किए हैं, लेकिन राज्य सरकारों और निजी प्रकाशकों द्वारा अपनाई जाने वाली पाठच्यक्रमों की निर्माण-प्रक्रिया पर इसका असर होना अभी बाकी है। एनसीआरटी के नए पाठच्यक्रमों और पाठच्यपुस्तकों में लैंगिक असमानता के प्रति सुधारपरक ष्टिकोण अपनाने के बजाय सक्रिय और विश्लेषणपरक ष्टिकोण अपनाया गया है।

इनमें सामाजिक और आर्थिक संबंधों को फिर से इस प्रकार परिभाषित किया गया है कि इससे अध्यापक और विद्यार्थी दोनों ही आज के सामाजिक परिश्य में स्त्री की उपस्थिति को महसूस कर सकें, जबकि पुरुष-प्रधान समाज की प्रतीकात्मक शक्ति ने उसे अश्य बनाकर छोड़ दिया था।

इसके लिए शिक्षकों की शिक्षा के बीच और दूसरी ओर समाज विज्ञान, मानविकी और गणित से संबंधित विभागों के बीच पुल बनाए जाने की आवश्यकता है। अध्ययन और प्रशिक्षण की अंत:विषयपरक संरचना से ही कहीं गहरे में बसी लैंगिक असमानता को वैचारिक केंद्र में लाया जा सकता है। छुट-पुट और अलग-थलग रणनीतिया बनाकर उस गहन स्तर को छुआ नहीं जा सकता, जिस पर पितृसत्तात्मक मनोवृत्ति का सांस्कृतिक ढाचा ज्ञानपरक ढाचे पर हावी रहता है।

हाल ही में लैंगिक समानता के संदर्भ में की गई प्रगति प्राथमिक शिक्षा के शुरूआती वषों में नामांकन के क्षेत्र में स्पष्ट रूप में दिखाई देती है। यद्यपि अब अधिक से अधिक लड़किया प्राथमिक स्कूलों में शिक्षा पाने के लिए जा रही हैं और देश के कई भागों में तो उनकी संख्या भी लड़कों के बराबर ही है, लेकिन इन दोनों के संदर्भ में घर में पहले से ही की गई पढ़ाई में जबर्दस्त अंतर है। इसलिए ज्ञान और कौशल के स्तर पर उनके क्षेत्र बिल्कुल अलग हो जाते हैं और भारत की विकासमान और प्रतिस्पर्धी राजनीतिक अर्थव्यवस्था में लड़कों को अधिक उपयुक्त माना जाता है।

इस विषमता का एक प्रमाण तो भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) में प्रवेश के आकड़ों के विभाजन से ही पता चल जाता है। इस वर्ष की संयुक्त प्रवेश परीक्षा में सफल प्रत्याशियों में लड़कियों का प्रतिशत मात्र 10 प्रतिशत ही है। लड़कों और लड़कियों के परिणामों के बीच की यह तीव्र विषमता बहु-आयामी भेदभावपूर्ण-व्यवस्था को दर्शाती है। आज की शिक्षा-प्रणाली इसे दूर करने में विफल रही है।

लेखक एनसीआरटी के निदेशक हैं

युनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया के ‘सेंटर फॉर द एडवांस्ड स्टडी ऑफ इंडिया’ के सहयोग से प्रकाशित।

इस लेख को मूलरूप से अंग्रेजी में आप इस साइट पर पढ़ सकते हैं  http : //casi. ssc.upenn. edu

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