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कुवैत : महिलाओं ने बनाई राजनीति में जगह

इन दिनों कुवैत में महिलाएं जश्न मना रही हैं और उनके कट्टर विरोधी चरमपंथियों के चेहरे लटके हुए हैं। कुवैत की महिलाओं ने पहली बार संसद में मौजूदगी दर्ज कराते हुए चार सीटें जीत ली हैं और इस प्रकार किसी भी खाड़ी देश की संसद में महिलाओं के प्रवेश की शुरूआत कुवैत से हुई।

दो महीने पहले मार्च में कुवैत के शासक ने संसद में ग्लोबल आर्थिक मंदी से उबरने के लिए पांच बिलयन डॉलर वाले सरकारी राहत पैकेज को लेकर प्रधानमंत्री व सांसदों के बीच पैदा हुए गतिरोध के मद्देनार संसद को भंग करने का फैसला किया और 16 मई को चुनाव करवा दिये। 50 सदस्यों वाली राष्ट्रीय असेम्बली के लिए कुल 210 उम्मीदवार मैदान में थे, जिनमें से 16 महिलाएं थी और इनमें से चार को सफलता मिली।

कुवैत में 1960 में ऐसी संसदीय प्रणाली लागू की गई, जिसमें महिलाओं को पूरी तरह से राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर रखा गया। उन्हें न तो पुरुषों के समान मत डालने का और न ही चुनाव लड़ने का अधिकार दिया गया। इस इस्लामिक देश में कट्टरपंथियों की नार में औरत को इस तरह के राजनीतिक अधिकारों से सशक्त करना गैर इस्लामिक है। और इसी मानसिकता के चलते नारीवादियों ने औरत को उसके पूर्ण राजनीतिक अधिकार दिलाने के लिए करीब चार दशकों तक संघर्ष किया।

संघर्ष को जोर पकड़ते देख 1999 में तत्कालीन अमीर शेख जबरल-अहमदल सबह ने महिलाओं को मताधिकार देने संबंधी अध्यादेश संसद में रखा लेकिन संसद में इस्लामिक चरमपंथियों ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए अध्यादेश के विरोध में मतदान कर औरतों का राजनीति से बेदखल कर दिया। लेकिन महिला अधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों ने अपनी मुहिम तेा कर दी। कई पुरुष भी इस मुहिम से जुड़ गए और 6 साल बाद 2005 में संसद में एक बिल पारित कर पहली बार कुवैत की महिलाओं को चुनाव लड़ने और मत डालने का अधिकार दिया गया।

हालांकि इस बार भी कट्टरपंथियों के तेवर तीरवे ही थे और उन्होंने औरत की इस राजनीतिक लड़ाई में साथ देने वाले पुरुषों के खिलाफ फतवा तक जारी कर दिया था, लेकिन संसद के बाहर उदारवादी खेमे की औरतों के पक्ष में उठी आवाा संसद में गूंजी और उसका असर यह हुआ कि औरतों के पक्ष में पैंतीस और विरोध में पंद्रह मत पड़े। 

कुवैत की महिलाओं के लिए संसद में बिल पर बहस के बाद इस तरह से अपने राजनीतिक अधिकार हासिल करना एक बहुत बड़ी जीत थी और कुवैत की जनता की नार में महिलाओं का लोकतांत्रिक तरीके से यह अधिकार हासिल करना राजपरिवार की तरफ से मेहरबानी की शक्ल में मिले अधिकार की तुलना में ज्यादा महत्व रखता है।

इस्लामिक कट्टरपंथियों के विरोध के बावजूद जो जीत हासिल हुई, वह एक लम्बे संघर्ष का नतीजा था और इस ने महिलाओं को देश की राजनीति में बराबर की भागीदार के रूप में पहचान दिलाई। लेकिन यह पहचान अगले ही साल उस समय संकट में दिखाई दी, जब 2006 में चुनाव हुए और 31 महिला उम्मीदवारों में से किसी एक को भी सफलता नहीं मिली। 

कट्टरपंथियों ने इन महिलाओं को यह अहसास बुरी तरह से करा दिया कि संसद से बाहर कुवैत की गलियों में उनकी ज्यादा चलती है। इसी तरह 2008 में 28 महिलाएं चुनाव मैदान में उतरी और सभी चुनाव हार गई। दो चुनाव में लगातार महिलाओं की इस हार के पीछे सांस्कृतिक व राजनीतिक कारणों ने प्रमुख भूमिका निभाई।

महिला उम्मीदवारों को वोट डालने वालों के खिलाफ फतवा जारी किया गया, महिला उम्मीदवारों पर हमले किये गए और उनकी अनुभवहीनता को मुद्दा बनाया गया। वहां महिला मतदाता तादाद में 54 फीसदी हैं उनकी राजनीतिक अहमियत को भांपते हुए पुरुष उम्मीदवारों ने लोगों पर दबाव बनाया कि उनके परिवार की महिलाएं उन्हें ही वोट दें और पुरुष उम्मीदवार इस में काफी हद तक सफल भी हुए। 

मगर नारीवादियों ने इस हार के बावजूद मैदान नहीं छोड़ा और इस बार 16 महिलाओं ने चुनाव लड़ा। इन में से चार महिलाएं पुरुषों के अभेद्य किले को भेदने में पहली बार सफल हुई हैं। उनकी इस जीत में महिला मतदाताओं के योगदान, समाज की महिला उम्मीदवार के प्रति बदलती सोच व महिला उम्मीदवारों की परिप  होती राजनीतिक समझ की महवपूर्ण भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

ये चारों महिला सांसद उच्च शिक्षा के लिए विदेश गईं और वहां से लौटकर देश में अपने-अपने कार्यक्ष़ेत्र में उन्होंने खास पहचान बनायीं। कुवैत की जनता ने पहली बार महिलाओं को संसद में भेजा है। उनकी इस सुधारवादी पहल के कई सामाजिक, लैंगिक व राजनैतिक आयाम भी हैं ।

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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