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जिज्ञासा

आज हर सवाल का जवाब इंटरनेट पर है। अणु, परमाणु, खगोल, ग्रह, आत्मा, ईश्वर, ज्योतिष, वास्तु, ओबामा, एंजलिना जोली, धोनी, अमिताभ बच्चन, स्लमडॉग- जिसके बारे में पूछो, पलक झपकते कंप्यूटर और मोबाइल स्क्रीनपर जवाब आ जाता है। हम संतुष्ट हो जाते हैं। बच्चे भी अब मां-बाप से कुछ जानने की कोशिश नहीं करते।

मां-बाप भी खुश हैं कि पहले की तरह बच्चे अब सवालों की झड़ी लगाकर तंग नहीं करते। बाकी बची-खुची कसर टीवी ने पूरी कर दी। पहले घरों में जिज्ञासा का माहौल होता था। हर कोई एक-दूसरे से कुछ न कुछ जानने की कोशिश करता था, सवालों के जवाब खोजे जाते थे। कभी अकेले-अकेले तो कभी सामूहिक। उसमें सबके अपने-अपने अनुभव होते थे।

जब भी किसी को कोई किताब या कहानी पसंद आती तो उस पर चर्चा होती और बहस भी। कहानी हर किसी को दृश्यों की कल्पना करने के लिए विवश करती थी। इससे दिमाग हर समय क्रियेटिव बना रहता था। एक दिन एक दार्शनिक संत युवाचार्य महाÞामण ने मजाक-मजाक में एक नौजवान से पूछ दिया कि तुम तो दुनिया के बारे में बहुत कुछ जानते हो, लेकिन अपने बारे में क्या जानते हो?

बस नौजवान ने स्वाभाविक अंदाज में अपना नाम, माता-पिता का नाम, गांव, घर, पढ़ाई, ऑफिस के बारे में बता दिया। इसके बाद क्या? इस सवाल पर वह सकते में आ गया। तब महाÞामण ने खुद के बारे में सोचने, जानने का सुझव दिया। कहा कि खुद के बारे में जाने बिना दुनिया को नहीं जाना जा सकता। जिसमें खुद के प्रति जिज्ञासा का भाव नहीं है, वह बहुत दूर तक कामयाब नहीं हो सकता।

ज्ञान का विस्तार, व्यक्तित्व का विकास और मानवीय गुण- खुद को जानने के बाद ही आते हैं। षि-मुनियों, समाज शास्यिों, वैज्ञानिकों ने ज्ञान का जो विकास किया, उसके पीछे है जिज्ञासा का भाव। शास् में एक सू है- अथातो ब्रrा जिज्ञासा। जिज्ञासा के बाद ही मनुष्य के अंदर प्रेरणा, संवेदना, करूणा, विनम्रता और सरसता आती है जो अहंकार, भेदभाव, शोषण और असांस्कृतिक सत्ता को पिघला देती है।

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