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लोकतंत्रम् अभ्युत्थानम्

मतदाताओं ने अक्षम्य गलती कर दी। इस चुनाव से यह सिद्घ हो गया है कि लोग खुद ही अपना भला नहीं चाहते। सोचिये कि अगर कांग्रेस एवं उनके सहयोगी दलों को पूर्ण बहुमत मिलने के बजाय किसी भी पार्टी को दस से अधिक सीटें नहीं मिली होतीं तो लोकतंत्र कितना आगे बढ़ चुका होता।

वह कैसा लोकतांत्रिक क्षण होता जब दो-दो, चार-चार सीटें जीतने वाली पचास-पचास पार्टियों के नेता कई-कई सप्ताह तक रात-रात भर बैठकें करते, जिनमें लत्तम-जुत्तम से लेकर वे सब चीजें चलतीं, जो लोकतंत्र में जायज हैं। प्रधानमंत्री को लेकर महीनों तक सस्पेंस बना रहता। टेलीविजन चैनल कौन बनेगा प्रधानमंत्री, सात रेस कोर्स की रेस, और कुर्सी का विश्वयुद्घ जैसे कार्यक्रमों के जरिये अपनी टीआरपी और कमाई आसमान पर पहुंचा चुके होते।

अखबारों का सरक्युलेशन हिमालय की चोटी को भी मात देता। हलवाइयों से लेकर नाइयों की दुकानों में राजनीति और लोकतंत्र के भविष्य पर राष्ट्रीय बहसें चलतीं और लोकतांत्रिक चेतना का प्रसार होता। सबके दिमाग में यही सवाल होता- कौन बनेगा प्रधानमंत्री।

अचानक एक दिन रात को तीन बजे मारकाट से भरपूर बैठक के बीच से निकल कर कोई नेता बताता कि प्रधानमंत्री के लिये संसद भवन से 20 फलांर्ग की दूरी पर चाय बेचने वाले को चुना गया है, क्योंकि एक दूसरे के चेहरे से नफरत करने वाले नेता केवल उसी के नाम पर सहमत हो पाये हैं।

जब तमाम चैनलों के रिपोर्टर और कैमरामैन अपने कैमरे और घुटने तुड़वाते हुये चायवाले के घर पर पहुंचते, तब तक वहां नगदी से भरे ब्रीफकेस लिये सांसदों की लंबी लाइन लग चुकी होती। एकाध घंटे में जब वह चाय वाला अरबपति बन चुका होता तभी कोई बदहवास दौड़ता हुआ वहां पहुंचकर बताता कि एक दूसरे नेता ने बताया है कि दरअसल प्रधानमंत्री के लिये जिसके नाम पर सहमति बनी है, वह चायवाला नहीं बल्कि पानवाला है।

इसके बाद एक और मैराथन दौड़ होती और अगले एक घंटे के भीतर गरीब पानवाला अरबपतियों की सूची में शुमार हो जाता। इस बीच बैठक से निकलने वाले एक नेता बताते बैठक में पानवाले के नाम पर भी असहमति कायम हो गयी है और अब किसी चूना लगाने वाले के नाम पर चर्चा हो रही है।

देश में एक बार फिर संस्पेंस का माहौल कायम हो जाता। महीनों तक हंगामेदार और संस्पेंस से भरपूर बैठकों के बाद प्रधानमंत्री के लिये किसी अनजाने आदमी के नाम पर आखिरकार सहमति बनती। इसके बाद मंत्रियों के चयन के लिये सिर फुटौव्वल होता और मंत्रियों के लिये भी निर्वाचित सांसदों के नामों के बजाय किसी पनवाड़ी, किसी जुआड़ी और किसी अनाड़ी के नाम पर सहमति बनती। तब होती लोकतंत्र की जय।

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