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बीतते हुए युग के नायक

हबीब तनवीर आधुनिक भारतीय नाटक के महानतम व्यक्तित्वों में से थे। लेखक, निर्देशक, अभिनेता और संगीतकार की तरह उन्होंने आधुनिक भारतीय रंगमंच की दिशा निर्धारित करने में युगांतकारी योगदान दिया। तनवीर ने शुरुआती संस्कार इप्टा से पाए और उन संस्कारों को ज्यादा बड़े आयाम ‘आगरा बाजर’ में दिए जिसमें आधुनिक रंगमंच की कई रूढ़ियों को तोड़ा गया था।

दो साल से यूरोप प्रवास में उनकी लोकोन्मुख और प्रयोगशील प्रवृत्तियों को ज्यादा बल मिला और वहां से लौटकर उन्होंने छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों के साथ स्थानीय बोली में नाटक करना शुरू किया। वे भारतीय पारंपरिक रंगमच, लोक परंपरा, पाश्चात्य शास्त्रीय और प्रयोगशील आधुनिक रंगमंच सबमें रचे बसे थे और उनका बेहद रचनात्मक और कल्पनाशील स्वरूप उनके नाटकों में दिखता है।

लोकतत्व उनके यहां रूढ़ि या तकनीकी युक्ितयों की तरह ही नहीं था, उनके नाटक एकदम समकालीन और प्रासंगिक थे ओर लोक तत्व उस समकालीनता के अंग के रूप में ही आता था। इस मामले में उन्होंने आधुनिक रंगमंच की लगभग हर प्रचलित धारणा को तोड़ा और एक ज्यादा समावेशी आधुनिक सांस्कृतिक रूप तैयार किया। इसलिए ‘चरणदास चोर’ या ‘मिट्टी की गाड़ी’ जसे उनके नाटक सिर्फ भारतीय रंगमंच की नहीं, विश्व रंगमंच की बड़ी उपलब्धियों की तरह गिने गए।

और साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि वे दुनिया में कहीं भी खेले जते थे तो दर्शकों की भीड़ टूट पड़ती थी। इस मामले में वे विद्वानों आलोचकों और सामान्य दर्शकों के बीच की खाई को भी पाटते थे। हबीब तनवीर विचारधारा से वामपंथी थे, लेकिन उनका लोक परंपरा के प्रति विनम्रता और लचीलापन किसी किस्म की वचारिक संकीर्णता से दूर है।

आदिवासियों और गैर आदिवासियों के बीच सांस्कृतिक और सामाजिक संबंधों की जटिलताओं का अद्वितीय चित्रण उनके अपेक्षाकृत अल्पख्यात नाटक ‘हिरमा की अमर कहानी’ में जसे किया गया है, उससे उनकी दृष्टि की सूक्ष्मता और संवेदनशीलता का पता चलती है। हबीब तनवीर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और सांस्कृतिक नवजगरण के मूल्यों को अपने कृतित्व में धारण करने वाली अद्वितीय पीढ़ी के शायद आखरी नायक थे, उदार, धर्मनिरपेक्ष, समावेशी और साथ ही कल्पनाशील और बेहद सुसंस्कृत। उनके जने से एक विराट युग पर पर्दा गिर गया है।

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