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उत्कृष्ठ निर्देशन से दर्शको पर राज किया राज खोसला ने

उत्कृष्ठ निर्देशन से दर्शको पर राज किया राज खोसला ने

भारतीय सिनेमा जगत में राज खोसला को एक ऐसे फिल्मकार के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने अपने उत्कृष्ठ निर्देशन से लगभग चारदशक तक सिने प्रेमियो के दिलो पर राज किया। दोस्ताना, मैं तुलसी तेरे आंगन की, दो रास्ते, मेरा गांव मेरा देश और वह कौन थी जैसी दिलको छू लेने वाली कलात्मक फिल्में आज भी सिने प्रेमियों के दिल में अपनी अमिट छाप छोड़ी है।

13 मई 1925 को पंजाब के लुधियाना शहर मे जन्में राज खोसला का बचपन से ही रूझान गीत संगीत की ओर था। वह फिल्मी दुनिया मेंपार्श्वगायक बनना चाहते थे। आकाशवाणी में बतौर उद्घोषक और पार्श्वगायक का काम करने के बाद राजखोसला 19 वर्ष की उम्र में पार्श्वगायकी की तमन्ना लिए मुबई आ गए।

मुंबई आने के बाद राज खोसला ने रंजीत स्टूडियों में अपना स्वर परीक्षण कराया और इस कसौटी पर वह खरे भी उतरे लेकिन रंजीतस्टूडियों के मालिक सरदार चंदू लाल ने उन्हें बतौर पार्श्वगायक अपनी फिल्म में काम करने का मौका नहीं दिया। उनदिनों रंजीत स्टूडियो की स्थिती ठीक नही थी और सरदार चंदूलाल को नए पार्श्वगायक की अपेक्षा मुकेश पर ज्यादा भरोसा था अतः उन्होंने अपनी फिल्म में मुकेश कोही पार्श्वगायन करने का मौका देना उचित समझा।

इस बीच राजखोसला फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। उन्ही दिनों उनके पारिवारिक मित्र और अभिनेतादेवानंद ने राज खोसला को अपनी फिल्म (बाजी)में गुरूदत्त के सहायक निर्देशक के तौर पर नियुक्त कर लिया। वर्ष 1954 में राज खोसलाको स्वतंत्र निर्देशक के तौर पर फिल्म मिलाप को निर्देशित करने का मौका मिला। देवानंद और गीताबाली अभिनीत फिल्म मिलाप की सफलताके बाद बतौर निर्देशक राज खोसला फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गए।
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वर्ष 1956 में राजखोसला ने सी.आई.डी फिल्म निर्देशित की। जब फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अपनी सिल्वर जुबली पूरी की तब गुरूदत्तइससे काफी खुश हुए। उन्होंने राज खोसला को एक नई कार भेंट की और कहा कि यह कार आपकी है ,इसमें दिलचस्प बात यह है किगुरूदत्त ने कार के सारे कागजात भी राज खोसला के नाम से ही बनवाए थे।सी.आई.डी की सफलता के बाद गुरूदत्त ने राज खोसला को अपनी एक अन्य फिल्म के निर्देशन की भी जिम्मेवारी सौंपनी चाही लेकिन राजखोसला ने उन्हें यह कह कर इंकार कर दिया कि एक बड़े पेड़ के नीच भला दूसरा पेड़ कैसे पनप सकता है। इस पर गुरूदत्त ने राजखोसला से कहा कि गुरूदत्त फिल्मस पर जितना मेरा अधिकार है उतना तुम्हारा भी है।

वर्ष 1958 में राज खोसला ने नवकेतन बैनर तले निर्मित फिल्म सोलहवां साल निर्देशित की। देवानंद और वहीदा रहमान अभिनीत इस फिल्मको सेंसर का वयस्क प्रमाण पत्र मिलने के कारण फिल्म को देखने ज्यादा दर्शक नहीं आ सके और अच्छी पटकथा और निर्देशन के बावजूदफिल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई खास कमाल नही दिखा सकी।

इसके बाद राज खोसला को नवकेतन के बैनर तले ही निर्मित फिल्म काला पानी को निर्देशित करने का मौका मिला। यह बात कितनीदिलचस्प है कि जिस देवानंद की बदौलत राज खोसला को फिल्म इंडस्ट्री में काम करने का मौका मिला था उन्हीं की वजह से देवानंद कोअपने फिल्मी करियर का बतौर अभिनेता पहला फिल्म फेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ।

 वर्ष 1960 में राज खोसला ने निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रख दिया और ..बंबई का बाबू ..का निर्माण किया। फिल्म के जरिए राज खोसलाने अभिनेत्री सुचित्रा सेन को रूपहले पर्दे पर पेश किया। हांलाकि फिल्म दर्शको के बीच सराही गई लेकिन बॉक्स ऑफिस पर इसे अपेक्षितकामयाबी नही मिल पाई।फिल्म की असफलता से राज खोसला आर्थिक तंगी में फंस गए।

 इसके बाद राज खोसला को फिल्मालय की एस.मुखर्जी निर्मित एक मुसाफिर एक हसीना निर्देशित करने का मौका मिला। फिल्म की कहानीएक ऐसे फौजी अफसर की जिंदगी पर आधारित थी जिसकी याददाश्त चली जाती है। फिल्म के निर्माण के समय एस.मुखर्जी ने राज खोसलाको यह राय दी कि फिल्म की कहानी फ्लैशबैक से शुरू की जाए।

 एस. मुखर्जी की इस बात से राज खोसला सहमत नही थे। बाद में वर्ष 1962 में जब फिल्म प्रदर्शित हुई तो आरंभ में उसे दर्शको का अपेक्षितप्यार नही मिला और राज खोसला के कहने पर एस.मुखर्जी ने फिल्म का संपादन कराया और जब फिल्म को दुबारा प्रदर्शित किया तो फिल्मर बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई।वर्ष 1964 में राज खोसला की एक और सुपरहिट फिल्म प्रदर्शित हुई "वह कौन थी " फिल्म के निर्माण के समय मनोज कुमार औरअभिनेत्री के रूप में निम्मी का चयन किया गया था लेकिन राज खोसला ने निम्मी की जगह साधना का चयन किया। रहस्य और रोमांच से

भरपूर इस फिल्म में साधना की रहस्यमई मुस्कान के दर्शक दीवाने हो गए। साथ ही फिल्म की सफलता के बाद राज खोसला का निर्णयसही साबित हुआ।

वर्ष 1967 में राज खोसला ने फिल्म "अनिता" का निर्माण किया जो बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह नकार दी गई जिससे उन्हें गहरा सदमा

पहुंचा और उन्हें आर्थिक क्षति हुई कि इससे राज खोसला टूट से गए.। बाद में अपनी मां के कहने पर उन्होंने वर्ष 1969 में फिल्म "चिराग"का निर्माण किया जो सुपरहिट रही। वर्ष 1971 में राज खोसला की एक और सुपरहिट फिल्म प्रदर्शित हुई "मेरा गांव मेरा देश "इस फिल्म मेंविनोद खन्ना खलनायक की भूमिका में थे। फिल्म की कहानी उन दिनों एक अखबार में छपी कहानी पर आधारित थी।

वर्ष 1978 में राजखोसला ने लीक से हटकर फिल्में बनाने का काम करना शुरू कर दिया और नूतन और विजय आनंद को लेकर "मैं तुलसीतेरे आंगन की " का निर्माण किया। पारिवारिक पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म दर्शको के बीच काफी सराही गई।वर्ष 1980 में प्रदर्शित फिल्म"दोस्ताना " राज खोसला के सिने करियर की अंतिम सुपरहिट फिल्म थी। फिल्म में अमिताभ बच्चन शत्रुध्न सिंहा और जीनत अमान ने मुख्यभूमिका निभाई थी।

अस्सी के दशक में राजखोसला की फिल्में व्यावसायिक तौर पर सफल नहीं रही। इन फिल्मों में दासी (1981), तेरी मांग सितारों से भर दूं,मेरा दोस्त मेरा दुश्मन (1984) और माटी मांगे खून शामिल है। हांलाकि वर्ष 1984 में प्रदर्शित फिल्म ..सन्नी .. ने बॉक्स ऑफिस पर और व्यापार किया। वर्ष 1989 में प्रदर्शित फिल्म ..नकाब ..राज खोसला के सिने करियर की अंतिम फिल्म साबित हुई। अपने दमदार निर्देशन सेलगभग चार दशक तक सिने प्रेमियों का भरपूर मनोरंजन करने वाले महान निर्मातानिर्देशक राज खोसला 09 जून 1991 को इस दुनिया कोअलविदा कह गए।

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