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बैंड बाजे वालों का जीवन खतरे में

सहालग के मौके पर ढ़ोल, तंबूर, छैने, ट्रंपिंक की धुन में लोगों को थिरकाने वालों के फेफड़े बैठ रहे हैं। ब्रॉस पर जोर लगाकर हवां फूंकने वाला बैंडमास्टर मांसपेशियों के जरूरत से ज्यादा फूलने की जद में आ रहा है। इसका सीधा असर इनके स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। चिकित्सक इसकी वजह ध्रूमपान और शराब खोरी बता रहे हैं।


खुद की धुनों पर दूसरों को नचा देने वाले ये लोग इस पुस्तैनी काम को जिंदा रखे हुए हैं। गरीबी इन्हें इसे थामे रहने को मजबूर करती है।  अपने शहर के बैंड बाजार में हजारों लोग इस काम में लगे हैं। यहां पर कतार से दजर्नों बैंड की दुकानें हैं। जो दिहाड़ी में काम करते हैं। अधिकतर सहारनपुर से हैं। मालिक दूसरों की शादी में बैंड बजाने का बयाना लेता है। डिमांड और बजट के अनुरूप 21 और 17 लोगों की टीम सहालग में बैंड बजाती है। घर परिवार की जिम्मेदारियां और बढ़ती मंहगाई में दो जून की रोटी कमाने के लिए उन्हें फेफड़ों और मांसपेशियों की परवाह नहीं है।

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