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नेपाल की राजनीति के खोटे सिक्के

नेपाल की जनता ‘गिरिजा-गच्छेदार’ सीरियल बड़ी दिलचस्पी से देख रही है। दोनों प्राइम टाइम वाले सीरियल हैं। सास-बहू सीरियल को भी मात देने वाले। एकदम मस्त सीरियल! एक के प्रोड्च्यूसर-डायरेक्टर हैं गिरिजा प्रसाद कोइराला, और दूसरे धारावाहिक के निर्माता हैं विजय कुमार गच्छेदार।

ये वही विजय कुमार गच्छेदार हैं, जो दो माह पहले दिल्ली के सियासी गलियारे में यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात कराने वाले ‘सूत्रधार’ की तलाश कर रहे थे। टीवी कैमरे पर कांग्रेस से लेकर क्रिकेट तक की बाइट देने वाले कनपुरिये ‘सूत्रधार’ ने गच्छेदार का ‘काम’ कितना किया, यह बाद की कहानी है।

ऐसा पहली बार हुआ कि उप प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद किसी नेता को उसकी पार्टी ने निकाल बाहर किया हो। गच्छेदार के साथ सात और लोग निकाले गये। ‘मधेसी जन अधिकार फोरम’ के नेता उपेंद्र यादव ने माधव सरकार से समर्थन वापसी और तराई बंद का ऐलान भी कर दिया।

उपेंद्र कहते हैं, ‘हमारी पार्टी में विभाजन के जि़म्मेदार गिरिजा बाबू और माधव नेपाल हैं। हमसे पूछे बिना इन्हें मंत्री बना दिया।’ इससे उलट गच्छेदार दावा करते हैं कि राजनीतिक समिति के 10 में से छह सदस्यों के पत्र प्रधानमंत्री को सौंपे गये थे।

वैसे भी गच्छेदार गुट की अलग पार्टी बनना तय जैसा ही है। उपेंद्र यादव को उकसाने में माओवादियों की बड़ी भूमिका रही है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। मधेस के एक दिग्गज नेता भाग्यनाथ प्रसाद गुप्ता कहते हैं, ‘इनके स्वार्थ की लड़ाई में मधेस के लोग क्यों साथ दें? तराई बंद का आहवान धोखा है ।’

उपेंद्र यादव को आखि़र दम तक भरोसा था कि माओवदियों की सरकार वे अपने 52 सांसदों के बूते दोबारा बनवा लेंगे। उपेंद्र ने पेइचिंग से मैत्री और विशेष व्यापार समझोते के लिए जो पहल की थी, उससे साउथ ब्लॉक भी वाकिफ था।

ऐसे में विजय गच्छेदार कब माओवादियों को मात देने वाले मोहरा बन गये, और कब 32 ‘कबूतरों’ को लेकर फुर्र हो गये, पता ही नहीं चला। शपथ समारोह के दूसरे दिन, काठमांडो पार्टी कार्यालय में दोनों गुटों में जमकर जूतम-पैजार हुआ और कपड़े फाड़े गये। सीरियल के दर्शकों को बस इसी सीन का इंतज़ार था।

जो लोग चमत्कार को नमस्कार नहीं करते, उन्हें नेपाल की राजनीति का जायज़ा ज़रुर लेना चाहिए। जंग बहादुर चमत्कारी रुप से राणा शासक हो गये थे। इस श्रंखला में शाह वंश, डॉ़ क़े आई़  सिंह, सूर्य बहादुर थापा और कोइराला कुनबा भी शामिल रहा है। पिछले साल 10 मार्च को संसदीय चुनाव में सुनसरी-5 से सुजाता कोइराला को हराने वाले उपेंद्र यादव नेपाल के विदेश मंत्री बने थे।

अब इसी पद पर सुजाता कोइराला विराज चुकी हैं। प्रधानमंत्री माधव नेपाल की तरह सुजाता भी दो जगहों से चुनाव हारी नेता हैं। यों माधव नेपाल अप्रत्यक्ष निर्वाचन से संसद सदस्य तो बन गये, पर सुजाता संविधान सभा की सदस्य भी नहीं हैं। ‘सानो बुआ’ का आदेश हुआ कि सुजाता विदेशमंत्री ही नहीं, नेपाली कांग्रेस संसदीय दल की नेता भी बनें।

नेपाली में ‘सानो बुआ’ का मतलब ‘छोटे पापा’ होता है। सुजाता अपने पिता गिरिजा बाबू को ‘सानो बुआ’ कहकर ही बुलाती हैं। इस निर्णय को लेकर पार्टी में ही नहीं, परिवार में भी घमासान मचा हुआ है। इसी परिवार के वरिष्ठ सदस्य सुशील कोइराला, जो नेपाली कांग्रेस के कार्यवाहक सभापति भी हैं, ने धमकी दी थी कि सुजाता संसद में हमारी नेता बनीं तो पार्टी छोड़ दूंगा।

कोइराला कुनबे के दूसरे सदस्य और पार्टी के सांसद डॉ़  शशांक कोइराला भी इस फै़सले से कुपित हैं। कोइराला परिवार के दामाद और पूर्व विदेशमंत्री चक्र प्रसाद वास्तोला कार्य समिति की बैठक में कह चुके हैं कि दो जगहों से हारी हुई महिला को संसद में नेता बनाना शर्मनाक है।

परिवार से बाहर नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गोपाल मान श्रेष्ठ, उप सभापति रामचन्द्र पौडेल, प्रकाशमान सिंह, महामंत्री विमलेंद्र निधि लगातार गिरिजा बाबू से पुनर्विचार की गुहार करते रहे। पर ‘सानो बुआ’ 87 साल की उम्र में पार्टी की विरासत अपनी बेटी को सौंपना तय कर चुके थे। देश भर में प्रतिक्रिया देखकर यह बात तो
साफ दिखती है कि अगले साल चुनाव हुआ तो नेपाली कांग्रेस नामक कुनबापरस्त पार्टी के बचे हुए पहिये भी पंचर हो जाएंगे लेकिन इससे पहले नेपाली कांग्रेस में एक बार फिर विभाजन के आसार बन रहे हैं।

मीडिया के लिए कोइराला ‘दुयरेधन’ के नेपाली अवतार हैं। कोइराला ‘माओ शासन’ से पहले जब प्रधानमंत्री थे, तो अपनी एकमात्र संतान सुजाता को बिना विभाग का मंत्री बना दिया। तब सुजाता शाही नेपाल एयरलाइंस कमीशन कांड के कारण सुखि़यों में थीं।

चुनाव में बुरी तरह हार के बाद सुजाता को पार्टी के विदेश विभाग का प्रमुख बना दिया गया। सुजाता ने सेना प्रमुख कटवाल के हटाये जाने के माओवादी फ़ैसले को सही ठहराया था। पार्टी लाइन के विपरीत इस बयान पर नेपाली कांग्रेस के नेता बगलें झंकने लगे थे। यह भी प्रहसन से कम नहीं कि शांतिनिकेतन से दसवीं पास और दिल्ली के किसी इंस्टीच्यूट से डिज़ाइनिंग का डिप्लोमा धारण करने वाली सुजाता नेपाल की विदेशमंत्री हैं।

जब तक अपने जर्मन पति नोर्बेट योस्ट से तलाक नहीं ले लिया, सुजाता के खिलाफ ‘विदेशी’ होने के सवाल उठते रहे। बेटा सिद्धार्थ जर्मनी में रहता है, और बेटी मेलानी लंदन में। सुजाता अपनी दिवंगत मां के नाम से ‘सुषमा कोइराला मेमोरियल ट्रस्ट’ चलाती हैं। इसमें आये धन को लेकर बबाल मचता रहा है। बीच में सुजाता के भारत में राजदूत बनाये जाने की चर्चा भी ज़ोर पकड़ी थी। अब करिश्मा देखिये कि सुजाता 22 से 25 जून को प्रधानमंत्री माधव नेपाल की भारत यात्रा की तैयारी के सिलसिले में नई दिल्ली आ रहीं हैं।

इस पूरे राजनीतिक सीरियल में ‘रायसीना हिल’ की क्या भूमिका रही है, या रहेगी, माओवादी इसकी टोह में लगे हुए हैं। आठ साल तक नेपाली माओवादी नेता दिल्ली-एनसीआर से जनयुद्ध का संचालन करते रहे। तब उनके लिए भारत विस्तारवादी नहीं था। सचाई यह है कि माओवादी नेता 10 साल के जनयुद्ध में दो साल ही जंगल में रहे।

अब फिर वो जंगल से दूसरा जनयुद्ध लड़ेंगे, और प्रचंड ‘प्रभाकरण’ जैसी परिणति चाहेंगे, ऐसा नहीं लगता। माओवादी चाहे जितनी कोशिश कर लें, सेना प्रमुख रुक्मांगद कटवाल 8 सितंबर 2009 को अवकाश लेने से पहले कुर्सी छोड़ने वाले नहीं लगते। उनसे पहले माओवादियों की पसंद और ओहदे में नंबर दो, कुल बहादुर खड़का की सेवा अवधि 20 जून को समाप्त हो रही है। लेकिन सवाल यह है कि इस उठा-पटक में देश की जनता की दुर्दशा क्यों हो रही है? 

pushpr1@ rediffmail. com

लेखक ईयू-एशिया न्यूज़ के नई दिल्ली स्थित संपादक हैं

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