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उर्दू मीडिया : ओबामा के भाषण से बंधी उम्मीद

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भाषण पर उर्दू अखबारों ने मिली-जुली प्रतिक्रिया व्यक्त की है। ‘नई शुरुआत का सकारात्मक विवेक’ के शीर्षक से ‘राष्ट्रीय सहारा’ ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि ओबामा इस्लाम और मुसलमानों के संदर्भ में फैलाई जने वाली गलतफहमियों को दूर करना चाहते हैं, निश्चय ही इससे दो सभ्यताओं के बीच टकराव की बात को गलत साबित करने में मदद मिलेगी।

लेकिन यह बात याद रखने की है कि इस्लाम और मुसलमानों के बारे में फैलाई जाने वाली गलतफहमियों में यूरोप और अमेरिका की ही बड़ी भूमिका रही है। ओबामा के इस बयान के बाद यह आशा की जा सकती है कि अमेरिका में मुसलमानों के साथ हो रहे भेदभाव में कमी आएगी और मुसलमानों को आतंकवादी मानकर उन्हें निशाना बनाने वाले अपने व्यवहार में तब्दीली जाएंगे।

ओबाम ने अपने भाषण में यह भी कहा है कि अमेरिका अपनी गलतियां सुधारना चाहता है, लेकिन वह कौन सी गलतियां सुधारना चाहते हैं इसको स्पष्ट नहीं किया है लेकिन आशा की जनी चाहि कि मुस्लिम जगत से संबंधत अमेरिका की विदेशनीति में जो आक्रामक रुख रहा है, ओबामा इसे निरस्त कर मुस्लिम देशों से नए संबंधों की ठोस शुरुआत करेंगे।

ओबामा यदि फलस्तीनियों को इनके जयज हक दिलाने में कामयाब हो जते हैं तो इससे अमेरिका के सारे गुनाह धुल सकते हैं, शर्त सिर्फ ईमानदारी से कोशिश करने की है। लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि क्या ओबामा अमेरिका की चली आ रही इस्लाम विरोधी नीति को बदलने में कामयाब हो पाएंगे और क्या अमेरिका की इस्लाम विरोधी लाबी उन्हें ऐसा करने देगी?

‘मुस्लिम वजीर? कितने वजीर? किसके वजीर?’ के तहत साप्ताहिक ‘नई दुनिया’ के सम्पादक शाहिद सिद्दीकी ने लिखा है। जी हां मंत्रिमंडल कोई भी हो, वजीर कितने भी हों। उनकी कामयाबी का राज यही है कि बाबरी मस्जिद शहीद हो, ईद के दिन मुरादाबाद में कत्लेआम हो, हाशिमपुरा (मेरठ) में मुसिलम युवाओं को निकाल कर गोली से उड़ा दिया जए, मुंबई में मुसलमानों का नरसंहार हो, गुजरात में मुसलमानों के खून से होली खेली जए।

लेकिन मुसकुराते रहो। मुंह खोलो तो पान खाने के लिए ओर पीक थूकने के लिए। मुसिलम वजीर 5 हों या 50, इससे आम मुसलमानों पर कोई फर्क नहीं पड़ता। सवाल है नीयत का। शासकों की नीयत क्या है? यदि वह ईमानदारी से मुसलमानों की आर्थिक एवं शक्षिक स्थिति को बेहतर बनाना चाहते हैं, तो इसके लिए मुस्लिम वजीरों की नहीं, साफ जहन की, ईमानदारी और काम करने की जरूरत है, वरना यही होगा, जो हर कांग्रेस की सरकार में मुसलमानों के साथ 60 वर्षो से हो रहा है।

‘बाबरी मस्जिद में जबरदस्ती मूर्तियां रखने के महत्वपूर्ण दस्तावेज गायब’ सरकारी रिकार्ड कहां गायब हो गए? विशेष अदालत का सवाल के तहत ‘उर्दू टाइम्स’ ने इसे स्पेशल स्टोरी बनाया है।

अखबार लिखता है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट की बाबरी मस्जिद के मुकदमे की सुनवाई करने वाली विशेष तीन सदस्यीय खंडपीठ के समक्ष चीफ सेक्रेटरी ने हाजिर होकर कहा कि वह पत्राचार का रिकार्ड जो बाबरी मस्जिद में 22-23 दिसम्बर 1994 को राम लला की जबरदस्ती मूर्तियां रखे जने और उन मूर्तियों को हटाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को टेलीग्राम ओर पत्र लिखे थे इसके असल दस्तावेज सचिवालय से कहीं गुम हो गए हैं।

उन्होंने अपनी पूरी कोशिश की कि यह रिकार्ड उपलब्ध हो जए लेकिन यह रिकार्ड नहीं मिल रहा है जबकि मुकदमे की फाइल में इन दस्तावेजों की नकल लगी हुई है। विशेष अदालत ने सचिव को हिदायत दी है कि उसको असल दस्तावेज हर हाल में चाहिए, सरकार चाहे जहां से भी लाए।

‘पाकिस्तान के हुड़दंग के पीछे तालिबान या अमेरिकी एजेंट’ के शीर्षक से ‘सियासत’ में सैयद अली ने अपने स्तंभ में लिखा है कि मुंबई पर आतंकवादी हमलों के संदर्भ में न्यूज चैनल पर एक अमेरिकी महिला का साक्षात्कार प्रसारित किया था। महिला पाकिस्तानी हैं और अमेरिका में रहती हैं वहां वह राजनैतिक मामलों की समीक्षा करती हैं।

साक्षात्कार में वह हिंदी बोल रही थी। इंडिया टीवी ने उन्हें ‘अमेरिकी जासूस’ के तौर पर पेश किया था। महिला ने इसकी शिकायत प्राइवेट चैनलों के मालिकों की एसोसिएशन से की। ऐसोसिएशन के अध्यक्ष जे एस वर्मा ने जंच में पाया कि साक्षात्कार पूरी तरह फर्जी और बनावटी था।

फरहाना नाम की इस महिला ने ना तो किसी को साक्षात्कार दिया और न किसी रिपोर्टर से बात की और न ही वह हिंदी बोल सकती है। सैयद अली लिखते हैं कि इंडियन चैनलों ने यह कारीगरी अमेरिकी चैनलों से सीखी है जो बिन लादेन, जवाहरी अथवा बैतुला मसहूद आदि की नकली आवाज का नकली टेप सुनाकर दुनिया को गुमराह करते रहते हैं।

लेखक स्तंभकार हैं।

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