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पहली पाठशाला

बच्चों को गीली मिट्टी के समान कहा गया है। जैसा चाहो, उसे ढाल लो। अब जिम्मेदारी हमारी है कि हम अपने संस्कारों की स्याही से उस पर गुण या अवगुण किसे अंकित करते हैं। बाल्यावस्था में एक बार जो प्रवृत्ति पड़ जाती है, वह जीवन भर उसका साथ नहीं छोड़ती।

परिवार को बच्चों की प्रथम शाला कहा गया है। अच्छे परिवार के बच्चे अच्छे व्यक्ितत्व के ही होते हैं। बच्चों को देखकर उनके परिवार के स्वरूप की सहज अनुभूति की जा सकती है। एक अंग्रेज लेखक का कहना है- ‘बालक पारिवारिक अनुकरण से ही अपने स्वभाव को निर्धारित और विकसित करता है’।

जिस परिवार के वरिष्ठ व्यक्ित अपने बड़ों का सम्मान नहीं करते, उस परिवार के बच्चे भी बड़ों के आदर में कोई रुचि नहीं लेंगे। बच्चे कैसे रहें? कैसे बोले? किससे कैसे मिलें? इसकी शिक्षा बच्चों को परिवार से ही मिलती है। बच्चों को सीधे तौर पर सिखाना कठिन है। उन्हें जैसा बनाना है, हम स्वयं वैसे बने। वैसा आचरण अपनाएं। बच्चा देखकर, अनुभव कर सीखता है।

हम अपने आचरण से बच्चों में नैतिकता का बीजांकुरण करें। उसे ऐसा योग्य बनाएं कि वह स्वयं सत्य को खोजें। हम बच्चों को केवल प्यार दे सकते हैं, विचार नहीं। विद्यालय का भी बच्चों को नैतिकता का गुण देने में बहुत बड़ी भूमिका है। अध्यापक बालक के लिए आदर्श होता है और जब अध्यापक चारित्रिक दृष्टि से बलष्ठि होगा तो बालक पर प्रभाव पड़ेगा।

सामाजिक परिवेश की नैतिक और अनैतिक कारणों का जनक है। हम समाज के अंग-प्रत्यंग हैं। समाज सुधार तभी हो सकता है जब हम स्वयं सुधार की नीति अपनाएं। नैतिकता के स्थापन में साहित्य का सर्वोच्च स्थान है। जन्म से लेकर मृत्यु तक व्यक्ित सीखता रहता है और इस सीखने में सर्वाधिक योगदान साहित्य का ही रहता है। जब बच्चा छोटा होता है तो माता, दादी-नानी की कथाओं से नैतिकता का वरण करता है। आगे चलकर पाठच्य पुस्तकों अथवा उपयोगी साहित्य से ही नैतिकता का पाठ और सकारात्मक जीवन यापन की विधि सीखता है।

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