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संवाद की राह

जमात-उद-दावा के सव्रेसर्वा हफीज सईद की रिहाई ने कई परेशानियां खड़ी कर दी हैं, वर्ना यह भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत शुरू करने का सबसे सही समय था। भारत में नई सरकार ने काम संभाल लिया है और पाकिस्तान में भी जनता की चुनी हुई सरकार है।

पाकिस्तान खुद तालिबान से जूझ रहा है, और कम से कम कुछ मोचरें पर तो उसके तेवर ढीले पड़े ही हैं। भले ही इसका कारण अमेरिका का दबाव क्यों न हो। लेकिन एक आतंकी की रिहाई ने इस सारे खेल को बिगाड़ दिया है, यह सवाल अब काफी बड़ा हो गया है कि भारत को इसके आगे क्या करना चाहिए। यह सच है कि मुंबई का आतंकवादी हमला हो या फिर सईद की रिहाई, इस सब को लेकर भारत के लोगों में खासा गुस्सा है।

इसलिए अक्सर पाकिस्तान से बातचीत न करने की मांग भी जहां-तहां से उठती रहती हैं। लेकिन विदेश नीति ऐसी चीज नहीं है, जिसकी सोच तत्काल आवेग की भावनाओं की नींव पर खड़ी की जए। विदेशनीति अंतरराष्ट्रीय संदर्भो में देश के दीर्घकालिक हित को साधने का एक संयम और समझदारी भरा रास्ता होती है। यह सिर्फ मौजूदा सरकार का मामला नहीं है।

पाकिस्तान के मामले में ऐसी समस्या तकरीबन हर सरकार को ङोलनी पड़ी है। बस यात्रा करके लाहौर गए अटल बिहारी वाजपेयी को कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान से सारे रिश्ते तोड़ लेने पड़े थे। लेकिन कुछ ही समय बाद यह अहसास हुआ कि ‘हम अपने दोस्त तो बदल सकते हैं, लेकिन अपने पड़ोसी नहीं बदल सकते’, और उन्होंने फिर से बातचीत शुरू कर दी थी।

यह ठीक है कि फिलहाल तो किसी भी तरह की बातचीत से भारत पाकिस्तान के रिश्ते एक हद से ज्यादा नहीं सुधर सकते। वह हद भी बहुत बड़ी नहीं है। और यह भी सच है कि कोई भी बातचीत पाकिस्तान के आतंकी तंत्र को अपनी हरकतें करने से नहीं रोक सकती। लेकिन बातचीत इसलिए जरूरी है कि वह न हो तो रिश्ते एक हद से ज्यादा भी बिगड़ सकते हैं।

बातचीत से हासिल भले ही ज्यादा न हो, लेकिन बिना बातचीत के बहुत कुछ खोने का खतरा बना रहेगा। पाकिस्तान जो कर रहा है उसके लिए उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव डालना एक तरीका हो सकता है। लेकिन इसके लिए भी जिस राजनय की जरूरत है उसका एक मूल सिद्धांत कहता है कि अपने दुश्मन से भी दोस्त की तरह पेश आओ। और विश्व समुदाय का सहयोग हम इस अड़ियलपन से नहीं हासिल कर सकते कि चाहे जो हो जए हम बात नहीं करेंगे।

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