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बदलते पिता, बदलते पति

बदलते पिता, बदलते पति

पहली क्लास के बच्चों की एक कविता है, ‘दादाजी का चश्मा गोल, मम्मी की रोटी गोल, पापा का पैसा गोल, सारी दुनिया गोल-गोल।’ पर क्या आज सिर्फ पापा का पैसा ही गोल है? गोल-गोल रोटियां बनाने का जिम्मा सिर्फ मम्मी का है? पापा भी अब गोल रोटियां बना रहे हैं। चूंकि मम्मी अब गोल-गोल पैसा कमाने के लिए बाहर निकल रही हैं। पापा बदल रहे हैं, और इसीलिए बच्चों की पढ़ाई भी बदलनी चाहिए।


पुरुषों ने सारे स्टीरियो टाइप्स बदल दिए हैं। वे अपनी पत्नियों के साथ पूरा सहयोग करते हैं ताकि वे भी अपना करियर बना सकें। परिवार को आर्थिक मदद दे सकें। इसके लिए पुरुषों ने अपनी परंपरागत छवि से बाहर निकलना भी स्वीकार किया है। वे खाना पकाते हैं, बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करते हैं, बाजार से राशन और सब्जी-भाजी खरीदते हैं, बच्चों को खाना खिलाते हैं और कई बार उन्हें सुलाते भी हैं। चूंकि उनकी पत्नियां ऐसी नौकरियों में हैं कि माँ की परंपरागत भूमिका नहीं निभा सकतीं।

बदलते पिता
‘मैं अपनी बच्ची के लिए सिर्फ इसलिए यह सब नहीं करता, क्योंकि मेरी पत्नी का वर्क शेड्यूल ऐसा है। बल्कि इसलिए करता हूं क्योंकि मैं उससे प्यार करता हूं।’ ‘न्यू एज डिस्ट्रीब्यूशंस’ के डायरेक्टर कमल भाटिया कहते हैं। उनकी बेटी अहाना अपने पापा पर ही ज्यादा निर्भर रहती है। सुबह स्कूल के लिए तैयार करना और फिर उसे बस स्टॉप तक छोड़ना। शाम को क्रेच से उसे लाने का जिम्मा भी राजीव का ही है। फिर शाम को स्कूल का होमवर्क और हल्की गपशप। रविवार को दोनों साथ में किसी स्पोर्ट्स एक्िटविटी में हिस्सा लेते हैं।
राजीव की पत्नी गौरी एक इंजीनियर हैं और अक्सर विदेशी दौरे पर रहती हैं। भले राजीव को उनकी कमी खले, पर अहाना तो पापा की बिटिया है। राजीव कहते हैं, ‘वह रात को मेरे बिना नहीं सो सकती। जब तक मैं उसे एक कहानी न सुना दूं- वह नहीं सोती। अगर स्टीरियो टाइप रोल में देखें, तो मैं उसकी मम्मी हूं- पापा नहीं।’

जमाना बदल रहा है
समाजशास्त्री हैनेल जक्सन के मुताबिक, ‘लोग जैसे-जैसे संयुक्त परिवारों से निकल रहे हैं, पति और पत्नी के लिए यह जरूरी हो रहा है कि वे एक-दूसरे पर निर्भर रहें। अगर वे एक दूसरे के काम में हाथ नहीं बंटाएंगे, तो घर-परिवार चलाना मुश्किल हो जाएगा।’

एक एनजीओ ‘साक्षी’ में निदेशक नंदू पदम की पत्नी शालिनी एक टीवी चैनल में प्रोड्यूसर हैं। वह बहुत सुबह घर से निकल जाती हैं। इसलिए उनके बेटे प्रभात की जिम्मेदारी नंदू की है। नंदू का ऑफिस घर से पास है। इसलिए दोपहर को स्कूल से लाने के बाद उसे खिलाने-पिलाने का दायित्व नंदू निभाते हैं। चार बजे तक शालिनी घर लौट आती है तो नंदू ऑफिस चले जाते हैं। वह कहते हैं, ‘घर को चलाने का दायित्व शालिनी का भी है। हम चाहते हैं कि प्रभात को भविष्य में सब कुछ अच्छा मिले। इसके लिए हम दोनों को खूब काम करना है। मैं मानता हूं कि मेरी पत्नी का भी अपना करियर है। उसमें वह खूब तरक्की करे। इसमें उसकी व्यक्तिगत संतुष्टि भी छुपी हुई है।’ नंदू अक्सर छुट्टियों में प्रभात को लेकर अपने गांव चले जाते हैं। शालिनी साथ आ सके, तो अच्छा, वरना बाप-बेटे को एक-दूसरे का साथ बहुत प्यारा है। पिछले महीने दोनों चार दिन सिंगापुर घूम कर आए। प्रभात ने जम कर शॉपिंग की- मम्मी के लिए भी। चूंकि मम्मी लोकसभा चुनावों के चलते बहुत बिजी थी।

पापा मेरे पापा
वरिष्ठ मनोविश्लेषक डॉ. अशोक आहूज कहते हैं, ‘पुरुषों की बदलती सोच ने औरतों की जिंदगी बहुत आसान की है। कुछ साल पहले तक वे घर के कामकाज और बच्चों के लालन-पालन के लिए अपनी सास या माँ पर निर्भर रहते थे। अब वे इस नजरिए को बदलना चाहते हैं कि वे पुरुष हैं इसलिए कुछ खास तरह के काम नहीं कर सकते। जैसे औरतें उन क्षेत्रों में जा रही हैं जो कभी पुरुषों के लिए खास माने जाते थे, उसी तरह पुरुष भी वे सभी काम कर रहे हैं जो कभी उनके लिए वजिर्त माने जाते थे।’

‘इंडिया एब्रॉड’ में ब्रांच मैनेजर सलमान हैदर ने अपनी जुड़वां बेटियों सना और सारा को अपने हाथों में ही पाला है। सलमान की पत्नी गीतिका कॉलेज में पढ़ाती हैं। जब सना-सारा का जन्म हुआ तो कॉलेज की वार्षिक परीक्षाएं शुरू हो गई थीं। गीतिका ने मैटरनिटी लीव भी तीन की बजाय दो महीने की ली और अपने काम में लग गईं। इसके बाद सना-सारा की जिम्मेदारी सलमान की थी। उन्होंने बच्चियों की नैपी बदलने से लेकर नहलाने तक का काम किया। हालांकि उनके पास एक फुलटाइम मेड भी थी। लेकिन सलमान अपनी बेटियों को अपने हाथों में रखना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने अपनी तीन महीने की अर्न लीव एक साथ ले ली।

अब सलमान ने अपना वर्किंग शेड्यूल कुछ इस तरह बनाया हुआ है कि जब गीतिका काम से लौटती हैं, तब सलमान घर से निकलते हैं- करीब एक बजे। हां, 9 बजे सुबह से वह ऑनलाइन रहते हैं और क्लाइंट्स को हैंडल करते हैं। बीच-बीच में बेटियों की मांगें पूरी करते रहते हैं। दोनों तीन साल की हैं। कभी बिस्कुट मांगती हैं, तो कभी ऊपर की शेल्फ पर रखी गुड़िया। सलमान मुस्करा कर कहते हैं, ‘मैं जनता हूं कि वे यह सब मेरा ध्यान खींचने के लिए करती हैं। मैं भी उन्हें पूरी तवज्जो देता हूं। आखिर वे मेरी प्यारी बेटियां हैं।’

मैं भी उन्हें पूरी तवज्जो देता हूं। आखिर वे मेरी प्यारी बेटियां हैं।’

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