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अथातो आम्र महिमा

अथातो आम्र महिमा

आम भारत का वह खास फल है, जिसकी महिमा हजारों बरसों से वेद-पुराणों तक में गाई जाती रही। ईसा से हजार बरस पहले के बृहदारण्यक उपनिषद् और फिर शतपथ ब्राह्मण में आम के पेड़, पत्तों और फलों की महिमा की चर्चा मिलती है। बौद्ध जातकों में बुद्ध द्वारा अपने एक प्रशंसक की अमराई में विश्राम करने का जिक्र है। कहते हैं कि बगिया में हाथ धोकर उन्होंने जहां जहां पानी छिड़का कालांतर में वहां एक पवित्र सफेद आम का पेड़ उग आया। भरहुत के स्तूप की एक पट्टिका पर यह वृक्ष चित्रित है।
 
बृहदारण्यक उपनिषद् जिसे आम्र कह कर पुकारता है, उसे संस्कृत में रसाल और सहकार भी कहा जाता है। काव्यरुढ़ि के अनुसार आम्र मंजरियाँ कामदेव के पांच बाणों में से उसका पहला और सबसे सम्मोहक तथा प्रिय बाण हैं, जिसका कालिदास ने शाकुन्तला और कुमारसंभवम् में बार-बार रसमय उल्लेख किया है।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह पेड़ मूलत: भारत बर्मा के सीमावर्ती उत्तर-पूर्वी क्षेत्र का है। इसे वहां से लाकर किसी फलप्रेमी द्वारा अन्यत्र रोपा गया होगा। आज भी सीमावर्ती क्षेत्र में आमट्रक नाम से आम की एक जंगली किस्म पाई जाती है, जिसका लातिन नाम है स्पौंडियास पिन्याटा। आम का अंग्रेजी नाम मैंगो तमिल से निकला है। तमिल में आम को ‘मंगा’ या मानकाई कहा जाता है। सन् 1510 में जब एक पुर्तगाली वारथेमा ने दक्षिणी भारत में यह फल चखा तो उसने इस सुरदुर्लभ फल के लिए स्थानीय शब्द उधार ले लिया और ‘मंगा’ अंग्रेजी में ‘मैंगो’ बन बैठा। अंग्रेज आम पर वैसे ही लट्टू हुए जैसे कि मुगल! 1673 में अन्य योरोपीय यात्री फ्रायर ने आम के स्वाद की तारीफ में कसीदे पढ़ते हुए कहा कि इसने उसे युरोप के आड़, खूबानी, आलूचों तथा नेक्टेरीन का स्वाद भी भुला दिया।

यूँ तो आम्रवृक्ष महोदय सिर्फ गुठली रोपने से भी कहीं भी प्रकट हो जाते हैं, पर इसके उत्तम प्रकार अमराई में कलम रोप कर उपजाए जाते रहे हैं। वृक्षप्रेमी मुगलों और पुर्तगालियों ने इस दिशा में खूब प्रयोग किए। कुछेक नवाबों, राजे-रजवाड़ों ने तो आम की नायाब किस्में विकसित करने पर अपने जगीरदारों-उमरावों के लिए लगान-माफी तक का प्रावधान कर रखा था। किराना के मुकर्रब खान एक ऐसे ही जगीरदार थे। मलीहाबाद के नवाब भी आम रसिया रहे। 1919 के आसपास उत्तर प्रदेश के मलीहाबाद में ही आमों की 1300 किस्में मौजूद बताई जाती हैं। लालकिले के भीतर खुद मुगल बादशाहों की अपनी एक अमराई थी। उत्तर प्रदेश में लखनऊ के पास काकोरी इलाका खाने-पीने के शौकीनों का इलाका रहा है। (प्रसिद्ध काकोरी कबाब यहीं के पोपले नवाब के लिए ईजाद किए गए) इसी इलाके में दशहरी गांव है, जहां प्रसिद्ध दशहरी आम पैदा हुआ। इसी तरह हरदोई जिले के चौसा गांव में पैदा किया गया चौसा आम इस गांव को ही अमर बना गया। पूर्वी उत्तर प्रदेश भी कम नहीं निकला। आम की अन्य लुभावनी किस्म ‘लंगड़ा’ काशी में विकसित हुई। कहते हैं कि एक लंगड़े पुजारी ने वहां इसकी कलम (जो किसी चमत्कारी साधु ने उसे दी) लगाई थी, सो नाम पड़ा- लंगड़ा। बाद को काशी-नरेश की आज्ञा से इस प्रजति का बागीचा आज के बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के परिसर के इलाके में लगाया गया, जो आज भी मौजूद है। बंगाल के मालदह इलाके से भी बढ़िया लंगड़ा आता है, जिसे उधर मालदह ही कहा जाता है।  बिहार का पश्चिम चंपारण जिला, बंगाल का दीघा, महाराष्ट्र का रत्नागिरि जिला भी आमों की विभिन्न प्रजातियों के जनक रहे हैं। दक्षिण भारत में तमिलनाडु का नीलम, आंध्र का बैंगनपल्ली, आंध्र का सुवर्णरेखा दक्षिण के आमप्रेमियों में मशहूर हैं। रत्नागिरी का अलफांसो इधर मध्य एशिया से लेकर अमरीका तक में निर्यात होने लगा है। ऊँची कीमत के बावजूद देसी आमप्रेमी इसे अभी भी खरीदते हैं।

अच्छे आम का पेड़ सदी से ऊपर फलायमान रहता देखा गया है। बताया जाता है कि चण्डीगढ़ के पास 1955 तक एक ऐसा ही डेढ़ सदी पुराना पेड़ था, जो बिजली गिरने से नष्ट होने से पहले साल में 16800 किलो फल देता रहा। आम की सिफ़त यह है, कि फल के बतौर तो यह खाया ही जाता है। साथ ही खाने के शौकीन और पाकशास्त्रियों ने कच्चे तथा पके आम के अनेक व्यंजन भी ईजाद किए हैं। गर्मियों की आँधी में असमय धराशायी हुए कच्चे आम के अचारों के नाना प्रकार पंजाब से बंगाल और उत्तराखंड से केरल तक महिलाओं ने रचे हैं, जो भारतीय थाली का अविच्छिन्न अंग बने। गुजरात-महाराष्ट्र में आम रस को पूरी के साथ दिव्य-भोज का दर्जा मिला है, तो कर्नाटक में दही में पके अमरस को। गोआ में इससे ‘मंगड़ा’ नाम से पनीर भी बनाया जाता है। और पश्चिम बंगाल का खट्टा-मीठा आमपापड़ तो चटोरी ललनाओं-बच्चों की पहली पसंद है ही। गुठलीदार कच्चे आम को सुखा कर खटाई बनती है, उसी का चूरा कहलाता है अमचूर। टिकोरे की खटाई ‘कली’ और गुठलीदार कच्चे आम की खटाई ‘खोइया’ कहलाती है। चरक ने ‘सहकार सुरा’ नामक एक मदिरा का भी जिक्र किया है जो आम के रस से बनती है।

देवताओं में शिव को आम खासतौर से पसंद है। चण्डीमंगल में उन्हें खट्टे आम का शौकीन बताया गया है। आम्रमंजरी और आम के पत्तों के तोरण सभी मांगलिक मौकों पर सजावट के लिए खोजे-लाए जाते हैं।

भारत की चिकित्सकीय पुस्तकों में भी आम तथा मंजरियों की महिमा का उल्लेख है। आयुव्रेद के अनुसार आम की तासीर गर्म होती है। इसे सुपाच्य बनाने के लिए आम खाने के बाद दूध पीने का निर्देश है। इसे बलवीर्यवर्धक, पित्तनाशक और कफ निस्सारक बताया गया है।


आम के आम गुठली के दाम, मुहावरा शायद अकाल के दिनों में बना होगा। अकाल के दिनों में कई बार गांवों के लोग आम की गुठली जो अमाठी भी कहलाती है और जिसमें स्टार्च की मात्रा काफी होती है, को पीस कर बनाई रोटी (अंटी की रोटी) पर जिंदा रहते हैं। इतिहासकार ग्रियर्सन ने इसका जिक्र किया है। और आज भी देश के आदिवासी इलाकों में पिछड़े गरीब इलाकों के कई परिवार यही खाकर जीवन निर्वाह करते हैं। कई बार बरसात के दौरान संक्रमित हो गई फफूंद लगी गुठली का आटा उनके जीवन की बलि भी ले बैठता है।

भारतीय कलाओं में आम्र पल्लवों के तोरण और अमिया के आकार को लेकर अनेक तरह के बेल-बूटे रचे गए हैं। बुनकरों ने, स्थापत्यकारों-शिल्पकारों ने और कसीदाकारी करने वालों ने इस ‘अम्बी’ बिंब को बार-बार इस्तेमाल किया है।
कालिदास से मिर्जा गालिब तक की फलों में पहली पसंद रहे आम्र फल की महिमा कहां तक गाई जाए? हरिकथा की ही तरह इसके भी अनंत रूप हैं, और अनंत गुण। और जनता को तो आम खाने से मतलब है, गुठली गिनने से नहीं।

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